राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २४५ ते वादिनः पराजित्य वादेन निखिलान्बुधान् । क्रियां नीलपुराणोक्तामच्छिन्दन्नागमद्विषः ॥ १७८ ॥ १७८. आगम द्वेषी१ उन बौद्धों ने अपने विरोधी निखिल विद्वानों को वाद में परास्तकर२ नीलमत पुराणोक्त धार्मिक क्रियाओं को उच्छिन्न३ कर दिया । १७८ (१) आगम : शब्द का अर्थ लिखित प्रमाण ज्ञान, परम्परा गत सिद्धान्त, शास्त्र किंवा विधि, वेद तथा न्याय के चार प्रकार के प्रमाणों में अन्तिम प्रमाण है । आगम शास्त्र साधारणतया तन्त्र शास्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं । निगमागम शब्द का प्रयोग बहुत होता है । निगम जिस प्रकार वेद है उसी प्रकार आगम तन्त्र भी है । निगम कर्म, ज्ञान तथा उपासना का स्वरूप बनाता है। आगम उनके उपायभूत साधनों का वर्णन करता है। वाराही तन्त्र के अनुसार आगम का सात लक्षण यथा-सृष्टि, प्रलय देवार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट् कर्म तथा साधन और ध्यान योग है। षट्कर्म,-शान्ति, वशी- करण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण हैं। महानिर्वाण तन्त्र के अनुसार प्राणी पवित्रतया अपवित्र अर्थात् मेध्य तथा अमेध्य है । विचारों से प्राय. हीन होते हैं । प्राणियों के कल्याणार्थ शंकर ने पार्वती को आगमों का उपदेश स्वयं दिया था 'कलि आगम सम्मत' अर्थात् कलियुग में आगम की पूजा पद्धति उपयोगी एवं लाभप्रद कही गयी है। वेद में बहुदेववाद का बहुल है। उनकी भिन्नता के कारण उनके तीन प्रकार हो गये हैं । वैष्णव आगम अर्थात् पांचरात्र और वैखानस आगम एवं शैव आगम में पाशुपत, शैव सिद्धान्ती तथा त्रिक । तीसरा शाक्त आगम है। द्वैत द्वैता- द्वैत एवं अद्वैत दृष्टियों से भी तीन भेद माने गये है। अनेक आगम वेद मूलक हैं। अनेक तन्त्रों पर आगम का बाह्य प्रभाव भी लक्षित होता है। बौद्ध धर्म ने वैदिक सिद्धान्त के विरुद्ध आवाज उठायी थी । वेद एवं ब्राह्मणों की समालोचना से बौद्ध- साहित्य भरा पड़ा है। बौद्धों की इसी मनोवृत्ति की ओर संकेत करते हुए कल्हण ने बौद्धों को आगम द्वेषी रूप में यहाँ चित्रित किया है। शिव तथा त्रिक सूत्र के पूर्व भी कश्मीर में आगम तन्त्र शास्त्र का अस्तित्व मिलता है । मालिनी, विजय, स्वच्छन्द, विज्ञान भैरव, आनन्द- भैरव, उच्छुस्म भैरव, मृगेन्द्र, मातंग, नेत्र, नव स्वास, स्वयंभू एवं रुद्रयामल रूप मिलते है । (२) वाद : वाद का अर्थ वाणी, शब्द, वचन, कथन, वर्णन, निरूपण, वाद-विवाद, शास्त्रार्थ, तथा खण्डन मण्डन होता है । वाद प्रतिवाद का अर्थ झगड़ा-बहस आज कल होता है। कल्हण ने यहाँ वाद शब्द शास्त्रार्थ के अर्थ में प्रयुक्त किया है। पराजित शब्द के 'वादेन' के पूर्व रखने से स्पष्ट हो जाता है कि बौद्धों ने शास्त्रार्थ में तत्कालीन विद्वानों को परास्त किया था। बौद्धों ने आगमों का खण्डन कर अपने मत का मण्डन किया था । (३) उच्छिन्न : कल्हण बौद्धों की प्रबल बुद्धिप्रबलता का यहाँ उल्लेख करता है। सभी कश्मीर मण्डल के विद्वानों को बौद्धों ने शास्त्रार्थ में पाण्डित्य, अकाट्य तर्क, एवं विद्वत्ता के कारण परास्त कर दिया था। उनके धर्म प्रचार का इतना गम्भीर प्रभाव पड़ा कि कश्मीर में नील मत विहित धार्मिक संस्कार आदि समूल नष्ट हो गये। यह एक सामाजिक क्रान्ति थी। उसने समाज के ढाँचे को बदल दिया । लोग प्राचीन सनातनधर्मी परम्पराओं को स्वतः त्याग दिये । राजा इस सामाजिक एवं धार्मिक क्रान्ति में सम्मिलित नहीं था परन्तु बौद्धों के अनुशासन, विचार तथा प्रचार के कारण धार्मिक कृत्य स्वतः उच्छिन्न हो गये थे ।