भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 335

२४४ राजतरंगिणी तस्मिन्नवसरे बौद्धा देशे प्रबलतां ययुः । नागार्जुनेन सुधिया बोधिसत्त्वेन पालिताः ॥ १७७ ॥ १७७. सुधी बोधिसत्त्व नागार्जुन१ द्वारा पालित बौद्ध उस समय देश में प्रबल हो गये थे। कि जिस समय व्याकरण के विद्वान् संक्षेप रुचि तथा अल्पविद्यापरिग्रही हो गये तो 'संग्रह' ग्रन्थ का सन्ध्या काल आ गया। उस समय तीर्थदर्शी मुनि पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की। उसमें न्याय बीजों का भी निबन्धन है। इससे स्पष्ट होता है। 'संग्रह' ग्रन्थ में व्याकरण सम्बन्धी अत्यन्त विस्तृत विवेचन था। महाभाष्य की शैली पाण्डित्यपूर्ण है। व्याख्या शैली सरल है। गद्य अत्यन्त सरल है। अकृत्रिम है। स्पष्ट है। धारा प्रवाहिक है। भर्तृहरि की टीका का अधिकांश अबतक अनुपलब्ध है। विवादास्पद विषयों का योग्यतापूर्वक निर्वाह किया है। पहले पूर्व पक्ष को उपस्थित कर उसके पश्चात् उत्तर पक्ष को उपस्थित किया है। अनन्तर उसने अपना मत प्रकट किया है। यह शैली कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में भी अपनायी है। महाभाष्य में दार्शनिक दृष्टि के साथ ही सांख्य शब्दनित्यवाद किंवा शब्द ब्रह्मवाद का निर्देश किया गया है। 'वाक्यपदीय' में भर्तृहरि ने इस पर विस्तृत व्याख्या की है। कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय उपयुक्त तथा विज्ञ अध्यापकों तथा शुद्ध पाठ के अभाव में उसका व्यवहार कम हो गया था । शनैः शनैः उसे लोग भूल गये थे । (तरंग ४ : ४८८) राजा जयापीड के समय में कल्हण पुनः वर्णन करता है कि महाभाष्य का प्रायः लोप हो गया था । राजा ने कश्मीर मण्डल के बाहर से विद्वानों को बुलाकर उन्हें कश्मीर में रखा। महाभाष्य का पठन-पाठन पुनः आरम्भ हुआ था। (३) चान्द्र व्याकरण के (१:२:२६) के 'अजयत् जर्त्तो हूणान्' को परिवर्तित कर कुछ विद्वानों ने 'जर्त्तो' के स्थान पर 'गुप्तो' कर दिया इसमें अभिमन्यु का काल गुप्त सम्राटों के पश्चात् सिद्ध करते हैं। किन्तु 'जर्त' शब्द का उल्लेख महाभारत में प्राप्त है। यह शब्द राजा के लिये भी प्रयुक्त किया गया है। उससे प्रकट होता है कि जर्त ने हूणों को पराजित किया था। अतएव अभिमन्यु का काल प्राचीन प्रतीत होता है। राजतरंगिणी में कल्हण ने जो समय दिया है वह चन्द्राचार्य के वास्तविक समय के बहुत निकट है। १७७ (१) बोधिसत्त्व नागार्जुन : कल्हण ने यहाँ पर नागार्जुन के लिये पुनः बोधिसत्त्व शब्द का प्रयोग किया है। बौद्ध गण नागार्जुन द्वारा पालित अर्थात् कश्मीर मण्डल में रक्षित थे। उनका किसी प्रकार अनिष्ट नहीं हो सकता था। बोधिसत्त्व स्वतः प्रबोधि प्राप्त के पश्चात् बुद्ध हो जाते हैं। नागार्जुन के आध्यात्मिक शक्ति का उल्लेख यहाँ पर कल्हण करता है। नागार्जुन यद्यपि कश्मीर मण्डल के राजा नहीं थे परन्तु श्लोक संख्या १७७ में उसे भूमीश्वर कहा है। राजा यद्यपि शिव उपासक था परन्तु वह मालूम पड़ता है, बौद्धों का विरोध करने में असमर्थ था। भगवान् बुद्ध की पूजा कल्हण के समय तक प्रचलित थी। बुद्ध जन्मोत्सव मनाने का कल्हण उल्लेख करता है। बारहवी शताब्दी सन् ११११ ई० की हादोग्राम में एक शिलालेख मिलता है। वह बुद्ध अवलोकितेश्वर की स्तुति से आरम्भ होता है। परि- हासपुर में बोधिसत्त्व तथा एक बुद्ध की मूर्ति मिली थी। हुएनसांग १०० तथा ओकुक (सन् ७५९ ई०) ८०० विहारों के होने का उल्लेख करता है। प्रताप सिंह संग्रहालय श्रीनगर में बोधिसत्त्व पद्मपाणि की एक मूर्ति रखी है।

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