भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग २...

[बायाँ स्तम्भ] इनका कहाँ जन्म हुआ था अनिश्चित है। कुछ विद्वानों का मत है कि 'व तथा ब' में इन्होंने भेद नहीं किया है। अन्तस्थ 'व'कारान्त पदों को भी पवर्गोय 'ब'कारान्त प्रकरण में पढ़ा है। अतएव कहा जाता है कि वे वंग (बंगाल) निवासी थे। कारण यह दिया जाता है कि 'वंग' प्रदेशीय लोगों में यह उच्चारण दोष पाया जाता है। इनके वंश का विशेष परिचय नहीं मिलता है। (२) महाभाष्य : यहाँ पतंजलि के महा- भाष्य से अभिप्राय है। वह दूसरी शताब्दी ईसापूर्व में हुआ था। पाणिनि पर उसने महाभाष्य लिखा है। राजा जयापीड के समय (रा० त० ४४८८) में इसी प्रकार का प्रयास किया गया था। राजा अभि- मन्यु ने व्याकरण शास्त्र के लुप्त हो जाने के कारण साहित्य को नवजीवन तथा एकरूपता देने के लिये चन्द्राचार्य जिन्हें चन्द्रगोभिन भी कहा जाता है। तथा अन्य विद्वानों को नियुक्त किया था। मालूम होता है। उस समय काश्मीर में व्याकरणाचार्यों की कमी हो गयी थी। शिक्षको के अभाव में उसने चन्द्रा- चार्यादि की सहायता द्वारा लुप्तप्राय ज्ञान के पुनः जीवन निमित्त प्रयास किया था। जयापीड के समय में भी पतंजलि के महाभाष्य के प्रचार निमित्त पुनः प्रयास होता दिखायी पड़ता है। हिन्दू राजाओं के अतिरिक्त कश्मीर का सुलतान बडशाह जैनुल आबदीन जो स्वयं संस्कृत का ज्ञाता था। उसके निर्देश पर रामानन्द ने महाभाष्य पर टीका लिखी थी। युद्धभट्ट स्वयं महाराष्ट्र में अथ- र्ववेद के ज्ञानार्जन निमित्त गया था। वह बादशाह के पास न्यायाधीश शिवाभट्ट की प्रेरणा पर भेजा गया था। लुप्तप्राय वेद का ज्ञान प्राप्त कर, उसका प्रचार कश्मीर में आकर करें। लगभग ५०० वर्ष पश्चात् स्वर्गीय रणजीत सीताराम पण्डित के भाई स्वर्गीय श्री एस. पी. पंडित को जब अथर्ववेद की पाण्डुलिपि दक्षिण में प्राप्त नहीं हो सकी, तो कश्मीरी पाण्डु- लिपियों को उन्होंने अपना आधार माना था।

[दायाँ स्तम्भ] कल्हण ने पतंजलि का नाम महाभाष्य के साथ नहीं लिखा है। परन्तु राजतरंगिणी के गवेषक विद्वानो का मत है कि यहाँ कल्हण का तात्पर्य पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य से ही है। उन्हें योग सूत्र, चरक संहिता तथा व्याकरण महाभाष्य का रचनाकार माना जाता है। परन्तु प्रथम दोनों ग्रन्थ उपलब्ध है। तृतीय का लेखक भिन्न व्यक्ति है इस प्रकार का मत कुछ विद्वानों ने प्रकट किया है। परन्तु सत्रहवीं शताब्दी के वैयाकरण नागोजी किंवा नागेश भट्ट ने अपने व्याकरण ग्रन्थ मंजूषायां 'इति चरके पतंजलि:' शब्द का प्रयोग किया है तथापि आधुनिक विद्वान् चरक संहिता का संग्रह योग सूत्रकार पतंजलि को नहीं मानते। महाभाष्यकार पतंजलि का काल नितान्त निश्चयात्मक रूप से निश्चित नहीं हो सका है। शुङ्ग वंशीय राजा पुष्यमित्र के श्रौतयज्ञ में, कहा जाता है, पतंजलि पुरोहित थे। 'इह पुष्यमित्रं याजयामः' महाभाष्य से सिद्ध होता है। यवनों ने साकेत और माध्यमिका पर आक्रमण किया था। पतंजलि उस समय वर्तमान थे। इस प्रकार महाभाष्य तथा पतंजलि दोनो का समय ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी ठहरता है। इस आधार पर विद्वानो का मत है कि ईसा पूर्व २०० वर्ष से १४० वर्ष के मध्य महाभाष्य की रचना हुई थी। महाभाष्य में 'मुनित्रय' को विशेष महत्त्व दिया गया है। वह मुनित्रय अष्टाध्यायीकार पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन, तथा महाभाष्यकार पतंजलि है। अष्टाध्यायी पर कात्यायन ने वार्तिकों की रचना कर व्याकरण को अधिक व्यापक, पूर्ण, सुगम एवं स्पष्ट किया है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य द्वारा वातिको की व्याख्या को और आगे बढ़ाया है तथा उसमें उन सूत्रों को भी विवेचना की गयी है जिन पर कात्यायन ने लेखनी नहीं उठायी थी। 'वाक्यपदीय' कार भर्तृहरि ने महाभाष्य की रचना का हेतु उपस्थित किया है। उनका मत है