राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः तरंग नीलमुद्दिश्य देशस्य रक्षितारमहीश्वरम् । काश्यपश्चन्द्रदेवाख्यस्तपस्तेपे ततो द्विजः ॥ १८२ ॥ १८२. काश्यप गोत्रीय चन्द्रदेव¹ नामका द्विज नीलनाग को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लगा जो काश्मीर के नागों का राजा तथा रक्षक था । तस्य प्रत्यक्षतां यातो नीलस्तुहिनविप्लवम् । न्यवारयज्जगादापि स्वपुराणविधिं पुनः ॥ १८३ ॥ १८३. चन्द्रदेव के सम्मुख नील प्रसन्न हुए। तुहिन विप्लव शान्त किया। नील ने स्व (नीलमत) पुराण की यज्ञादि विधियाँ¹ पुनः बतायीं । अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ ३:७० । करता है। प्राचीन संस्कार बौद्धों के नवीन शासन के कारण नष्ट प्राय हो गये थे अतएव उन्हें पुनः जारी करने के लिये उसने तपस्या की । (२) निधन : बौद्धों के राजनीतिक उत्पीड़न का श्लोक संख्या १८० तथा १८१ में एक मत से कवित्वपूर्ण वर्णन कल्हण ने किया है। बौद्धों को बाधा पहुँचाने के लिये हिम वर्षा तथा बलि एवं होम के कारण ब्राह्मणों पर संकट न आकर बौद्धों का निधन होने लगा यह पुरातन सनातन परम्परा- नुसार बलि तथा होम की शक्ति तथा महत्ता दिखाने के लिये यहाँ वर्णन किया गया है। १८३ (१) विधि : प्रतीत होता है कि बौद्धों के प्रभाव के कारण, बौद्धमतावलम्बी राजाओं के लम्बे काल एवं प्रश्रय के कारण नीलमत पुराण विहित संस्कार विधि कश्मीर में प्रायः लोग भूल गये थे अथवा भूलने लगे थे। नील ने चन्द्रदेव ब्राह्मण के सम्मुख प्रकट होकर नीलमत पुराण विहित विधियों, धार्मिक संस्कारों आदि को पुनः बतायी। सम्भव हो सकता है कि प्राचीन नीलमत पुराण लुप्त हो गया हो। उसके स्थान पर नवीन नीलमत पुराण का संस्करण चन्द्रदेव ब्राह्मण ने किया। अन्यथा यहाँ पुनः नीलमत वर्णित बातों को बताने की आवश्यकता न पड़ती। पाठभेद : श्लोक संख्या १८२ में 'तारमहीश्वरम्' का 'तारं महेश्वरम्', 'तपस्तेपे' का 'वतस्तेपे' तथा 'ततो द्विजः' का पाठभेद 'द्विजस्ततः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १८२ (१) चन्द्रदेव : इस तपस्वी के विषय में विस्तृत बातें अप्राप्त हैं। यह ब्राह्मण थे। तपस्वी थे। काश्मीर में हिम विप्लवादि समाप्त करने के लिये काश्मीर के नागराज नील को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लगे। कश्मीर में यह प्रचलित परम्परा है कि नील नाग कश्मीर का रक्षक है। वही सब नागों का नेता किंवा राजा है। नीलमत पुराण कश्मीर का पुराण तथा पूजा, उपासना, बलि एवं धार्मिक संस्कारों की विधि निर्धारित ३२ श्री रणजीत सीताराम पण्डित 'रिवर आफ किंग्स' पृष्ठ २६ पर श्री फाउचर के एक मन्तव्य का उल्लेख करते हैं। श्री फाउचर ने कश्मीर के ब्राह्मणों तथा मुसलमानों दोनों में नाग, पिशाच, योग नियोग आदि के विषय में अनेक कथायें तथा जनश्रुतियों का होना कहते हैं। जिनपर कश्मीर उपत्यका की साधारण जनता विश्वास करती है। उनका अभिप्राय है कि इस प्रकार की कथाओं, किवदन्तियों का संग्रह करना अच्छा होगा।