राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० राजतरंगिणी आद्येन चन्द्रदेवेन शमितो यक्षविप्लवः । द्वितीयेन तु देशेऽस्मिन्दुस्सहो भिक्षुविप्लवः ॥ १८४ ॥ १८४. आद्य चन्द्रदेव' ने यक्ष विप्लव का शमन किया था और द्वितीय चन्द्रदेव ने इस देश में दुःसह भिक्षु विप्लव शान्त किया । पाठभेद : श्लोकसंख्या १८४ में 'यक्ष' का 'पक्ष', 'यज्ञ' तथा 'भिक्षु' का 'धोक्ष' 'निद्य' तथा 'भिक्ष' ये पाठ भेद मिलते हैं । पादटिप्पणियाँ : १८४ (१) आद्य चन्द्रदेव : पिशाचोंसे आदि चन्द्रदेव ने कश्मीर मण्डल की रक्षा की थी। नीलमत पुराण में चन्द्रदेव ब्राह्मण नील समागम वर्णन है । उसमें आद्य चन्द्रदेव काश्यप वंशीय वृद्ध ब्राह्मण थे । शीत ऋतु एवं तुहिन पात के कारण लोग आमुज मास में पुरानी परम्परा के अनुसार कश्मीर उप- त्यका का त्याग करते थे । वृद्धावस्था के कारण चन्द्रदेव काश्मीर का त्याग न कर सके । पिशाच उसके साथ क्रीड़ा करने लगे । उसे सर्व प्रथम रज्जु से बाँधकर रखा । अनन्तर उसे मुक्त कर दिया । उसे कुछ समझ में नही आ रहा था । कहाँ शरण ग्रहण करें । वह घूमने लगा । घूमते-घूमते वह नील के निवास पर पहुँचा । नील को उसकी दशा पर करुणा आयी । उसका आतिथ्य सत्कार किया । उसने पिशाचों तथा शीत रक्षा निमित्त अनेक क्रियाएँ बतायी । चैत्र मास मे हिमपात बन्द हो जाता है । भूमि हिम विहीन हो जाती है । लोग पुनः कश्मीर उप- त्यका मे लौट आते है । वृद्ध-चन्द्रदेव को प्रसन्न तथा स्वस्थ देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ । उसे राजा वीर्योदय के सम्मुख उपस्थित किया । चन्द्रदेव ने पिशाच तथा नील के साथ हुई वार्तालाप तथा घट- नाओं का वर्णन किया । नील द्वारा विहित पूजा विधि बतायी । राजा तथा प्रजा उन्हें प्रसन्नतापूर्वक करने के लिए तैयार हो गये । परिणाम स्वरूप कश्मीर उपत्यका पिशाच-भय एवं उपद्रव विहीन हो गयी । अवश्युञ्ज्यामतीतायां निर्मानुषनिवा बहिः । काश्यपश्चन्द्रदेवाख्यो वृद्धो ब्राह्मणपुंगवः ॥ निजंगाम निर्वेदाद्योधितोऽर्थेन मायिना । क्रीड़ानिमित्तं च भयान्निक्षुभ्रमस्य न यातिनः ॥ प्राप्रवेन पिशाचांस्तुश्चिक्रीडुस्तेन वै तदा । रज्ज्वाबद्धेन तु यथा यक्षिणा नृपदारकाः ॥ कल्पमानाः (१) पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ । हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः शमीप्यमानो द्विजवृद्धवर्यः। वभ्राम तत्रैव विमूढ़चेता भ्रमन्वयौ यत्र स नागराजः ॥ ४२५-४२९ यहाँ कल्हण ने पिशाच के स्थान पर यक्ष शब्द का प्रयोग किया है। दोनों शब्द को प्रायः समानार्थक कुछ ऐतिहासिकों ने माना है । परन्तु यक्ष तथा पिशाच दो भिन्न जातियां हैं। उनका उल्लेख यथा स्थान किया गया है । मुझे नीलमत का मत कल्हण की अपेक्षा अधिक तर्कसम्मत मालूम होता है । कश्मीर में यक्ष, गुह्यक तथा पिशाच तीनो जातियां थी । यक्षों को कही धर्मविरोधी कार्य करते नही दिखाया गया है । पिशाच धर्म विरोधी कार्य करते थे । अतएव यहाँ पिशाच नाम यक्ष के स्थान पर होना चाहिये । यक्षों को शिल्पी के रूप मे चित्रित कल्हण ने किया है । वे निर्माण कार्य मे लगे दिखाई देते हैं । चन्द्रदेव आख्यान से प्रतीत होता है । कश्मीर उपत्यका मे लोग ६ मास निवास करते थे । तुषारपात आरम्भ होने के पूर्व उपत्यका छोड़कर गर्म स्थान मे चले जाते थे । इसी प्रकार तुषारपात बन्द होने पर पुनः उपत्यका में लौट आते थे । अब भी