राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २५१
शीत ऋतु प्रारम्भ होते ही पर्वतों पर रहने वाली घूमन्तू जातियां मैदान में अपनी भेड़ों तथा पशुओं के साथ शरण लेती हैं। सितम्बर मास में मैंने इस प्रकार ऊँचे पर्वतों पर से आने वाले लोगों का समूह कश्मीर की सड़को पर बहुत देखा है। कल्हण ने यहाँ पुरानी गाथा की पुनरावृत्ति की है। उक्त वर्णन से प्रकट होता है। पुरातन नीलमत वर्णित संस्कारादि जो बौद्धो के कारण बन्द हो गये थे पुनः आरम्भ किये गये। नाग पूजा पुनः कश्मीर में प्रचलित हुई। कुछ विद्वानों का मत है। नीलमत पुराण इसी समय की रचना है। नीलमत सिद्धान्त लोग त्याग दिये थे। इससे यह भी प्रकट होता है कि नीलमत पुराण का महत्व घट गया था। बौद्ध सिद्धान्तों ने जोर पकड़ लिया था। बौद्ध धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रिया का काल था। कुछ लोगो का मत है कि नीलमत ६ठी अथवा ७वीं शताब्दी के पूर्व का ग्रन्थ नही है। हसन चन्द्रदेव के विषय में लिखता है : एक दफा का जिक्र है कि एक बूढ़ा खूसट ब्राह्मण चन्द्रदेव नाम जो इल्म व अमल में मुमताज था कश्मीर के एक गार में छुपकर याद खुदा में मसरूफ हो गया। जरूरियात जिन्दगी की तमाम चीजें इस शख्स ने अपने पास जमा कर लीं। जाड़े का मौसम था। बर्फ व बारिश से तंग आकर देव फौज दर फौज इसके पास जमा हो गये और उस बूढ़े खूसट ब्राह्मण को अपनी खुफिया जगह से निकाल बाहर किया। बाद अजा दो खतरनाक कवो हैंकल देव नील नाग के चश्मा पर जो कोहस्तान नाघिम की तलहटी में वाका हैं खड़े हो गये और वरहमन मजकूर को यह दोनों एक दूसरे की बगल में डालकर हँसी ठट्ठा करने लगे। इत्तफाक से गरीब ब्राह्मण का पाँव फिसल गया। और चश्मे के अन्दर जा पड़ा। देखता है क्या कि एक बड़ी वसीय व खराज दुनिया है जिसमे एक आलीशान महल है और महल मे एक जर निगार तख्त जिसपर एक बादशाह बड़ी शान व तमकुनत के साथ जलसह्गर हैं। ब्राह्मण हाथ जोड़कर उसके
सामने खड़ा हो गया और बड़ी आाजिजी के साथ देवों के मुजालिम और बर्फ की तकालीफ उससे बयान करने लगा। यह बादशाह खुद नील नाग था। उसे ब्राह्मण की हालत जार पर सख्त रहम आया और अपने पास बुलाकर अपनी खुद तसनीफ करदा किताब नीलमत पुरान उसको बख्श दी। साथ ही वसीयत की कि किताब मजकूर को मुतर्वाक मुकामात पर पढ़कर देवों और राक्षसों को खैरात व शदकान दिये जाया करें। वह अमल और बज़ायक जो इस किताब में दर्ज है बाजा़ब्तगी से हमेशा पढ़े जावें। अकसर ओकात खुदाताला की इवादत व अताअत में मस- रूफ रहा जाये। इस सूरत में लोग देवों और राक्षसों की इज़ ज तकालीफ से महफूज रह सकेंगे। यह कह कर बरहमन मजकूर को चशमा नील नाग के किनारे पहुँचा दिया। इबनदार बहार थी। लोग सरजमोन हिन्दु- स्तान में खेती बाड़ी की गरज से फिर कश्मीर आने लगे। यह देखकर उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ कि एक बूढ़ा व नातवान ब्राह्मण सही हव मालम मौजूद है। लोगों ने इसका सबब दरयाफ किया जिसको उसने मन व अन से कह डाला। यह सुन कर लोग बहुत खुश हुए। चुनाचः उसे और उसकी किताब फाले नेक जानकर अपने अफसर दरया देव नामी के पास ले गये। लोगो ने दरया देव के हुक्म पर सरमबामत रखकर देवों और शिद्दत वरफ वारा के आसोव से नजात हासिल कर ली। उसी वक्त से कश्मीर मे विला इम्त- याज मौसम मुस्तकिल तौर पर आबादी शुरू हो गयी। नस्ले इन्सानी की दिन व दिन कसरत के वापस दिहात व कस्बात वजूद में आ गये। इब्दा में हर एक गावो का अलग हाकिम होता था। फिर सरकशी और हिर्स के बढ़ जाने को वजह से एक शख्स कई-कई दिहात दवा बैठा। वाहमी मुदाफत और एक दूसरे के शर से बचने के लिये इन लोगों ने छोटे-छोटे किलों की बुनियाद डाल दी। जिन्हें कोट के नाम से पुकारा