भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

२५४ राजतरंगिणी ये प्रजापीडनपग्ने विनश्यन्ति सान्वयाः । नष्टं तु ये योजयेयुस्तेषां वंशानुगाः श्रियः॥ १८८ ॥ १८८. जो प्रजापीड़क राजा होते हैं वे कुलसहित नष्ट हो जाते हैं और जो नष्ट गत को सुव्यवस्थित करते हैं, उनके वंश का अनुगामिनी श्री होती है। इत्येतत्प्रतिवृत्तान्तं देशेऽस्मिन्वीक्ष्य लक्षणम् । भाविनां भूमिपालानां प्राज्ञैर्ज्ञेयं शुभाशुभम् ॥ १८६ ॥ १८९। विज्ञ जन राजाओं न इन प्रतिवृत्तान्तों को देखकर भावी भूपालों के शुभाशुभ कर्म को समझ लेते हैं। नवीकृतवतो देश तस्य वंश्यैरियं मही। सिद्धैः प्रवरसेनार्थेद्धिरं भुक्ता सुकर्मभिः ॥ १८० ॥ १८०. देश को नवीकृत करने वाले उस राजा (गोनन्द) के वंशज, प्रवरसेन आदि सिद्ध थे तथा अपने सुकर्मों द्वारा पृथिवी का चिरकाल तक भोग किये। कल्हण इसी ओर संकेत करता है। हम चाहते उनके द्वारा उसके यश, कुल तथा राज्य की भी- कुछ हैं। होता कुछ है। यह क्या होता है ? इसे वृद्धि होती है। अन्यथा सब कुछ नष्ट हो जाता है। कर्म का फल कहा जाता है। कल्हण जनता को व्यास ने १८ पुराणों को लिखने के पश्चात् अपना सचेत करता है। यदि यह पुण्यशाला होगी तो अच्छा निष्कर्ष निकाला है। आदर्श नृपों का राज्यसूत्र परिपालन सम्भव है अष्टादश पुराणेषु ... सारमुक्तम् । अन्यथा क्रूर होने पर पापी क्रिया दूषित होने पर परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ उसे उसके कर्मानुसार उसी प्रकार के अवांछित राजाओं की प्राप्ति होगी। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १८८ में 'विनश्यन्ति सान्वयाः' श्लोक संख्या १८९ में 'देशे' का 'दैवे' तथा का पाठभेद 'नश्येयुः सहानुया' मिलता है। 'दैवी' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : १८८ (१) श्री : कल्हण ने सूत्रवत् यहाँ १८९ (१) शुभाशुभ कर्म : कल्हण राजा के राजाओं के भाग्य तथा उनके भविष्य की तरफ जीवन चरित्र तथा उनके शुभाशुभ कर्मों पर लक्ष्य कर इस श्लोक से चेतावनी दी है। पाप पूरा प्रकाश डालता उन्हें चेतावनी देता है। पूर्व- का परिणाम सर्वनाश है। पुण्य का परिणाम श्री वर्ती राजाओं का इतिहास एवं वृत्तान्त उनके कर्मों की प्राप्ति करना है। राजा को पुण्याश्रयी होना पर आधारित रहता है। राज्य के घटना चक्र कर्मों चाहिए। राज्य को सुव्यवस्थित करना, जनता का के कारण घटित होते हैं। यह घटना चक्र उनका सन्तानवत् पालन करना, जनता के सुख-दुख को यह प्रतिवृत्तान्त भविष्य के भूपालों के लिए उदाहरण अपना सुख-दुःख समझना, उनके निमित्त बड़ा से है। उनका भविष्य किसी अलौकिक शक्ति द्वारा बड़ा त्याग करना यह राजा का पुण्य कार्य है। परिचालित नहीं होगा। अपितु वह नियन्त्रित होगा। जीवन में मोड़ लेगा उनके कर्मों के द्वारा। वही उनके भविष्य के शुभ तथा अशुभ का निर्णय