भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

प्रथम तरंग २५५ गोनन्दान्वयिनामाद्यः स रघूणां रघुर्यथा । नृपतिः काश्यपीं वर्षान्पञ्चत्रिंशतिमन्वशात् ॥ १६१ ॥ १६१. यह राजा जो गोनन्द वंश में प्रथम राजा रघुवंशियों¹ में रघु तुल्य हुआ था । इस काश्यपी² का पैंतीस वर्ष³ तक शासन किया । वर्षषष्टिं सषण्मासैः षड्भिर्वर्षैर्विवर्जिताम् । विभीषणाभिधोऽरक्षत्क्षितिं गोनन्दनन्दनः ॥ १९२ ॥ १९२. तत्पश्चात् गोनन्द नन्दन विभीषण नामक राजा ने तत्पश्चात् साठ वर्ष में ६ वर्ष ६ माह कम अर्थात् तिरपन वर्ष छह मास क्षिति की रक्षा की ।

करते हैं । यही उनके भाग्य का निर्णय करेगा । विद्वान् इनसे शिक्षा लेकर राजाओं को चेतावनी देते रहे, जनता तथा राजा का मार्ग दर्शन करते रहे यही अभिप्राय यहाँ कल्हण का है । पाठभेद : श्लोक संख्या १९० में 'वन्द्यं' का 'वंशं' तथा 'सुकर्म' का पाठभेद 'स्वकर्म' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९० (१) नवीकृत : कल्हण का तात्पर्य यहाँ सुधारने से है। गोनन्द वंशीय राजाओं ने कश्मीर में सुधार किया था । शासन तथा शान्ति स्थापित की थी । आध्यात्मिक विचारधारा, प्राचीन नील- मत द्वारा विहित धर्म तथा संस्कारों की ओर मोड़कर उनका देश में प्रचार किया था । हिमपात तथा बौद्धो दोनों के प्रबल दोषों से कश्मीर मंडल का उद्धार किया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १६१ में 'गोनन्दा' का 'गोनर्दा' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९१ (१) रघुवंश : रघु इक्ष्वाकु वंश में एक अतिश्रेष्ठ राजा हुए हैं । यह भगवान् राम के पूर्व पुरुष थे । राम का एक नाम रघुनाथ इसी रघु के कारण पड़ा है । महाभारत में वर्णित प्राचीन राजाओं की नामावली में रघु का नाम लिया गया है । (म० आ० १ : १७२) भागवत, विष्णु एवं वायु पुराणों के अनुसार रघु राजा दीर्घबाहु का पुत्र था । राजा दिलीप खट्वांग के पौत्र थे । किन्तु मत्स्य तथा पद्म पुराणों में रघु को निघ्न राजा का पुत्र कहा गया है । (पद्म० सृ० . ८) कालिदास ने रघुवंश में रघु को राजा दिलीप का पुत्र कहा है । नन्दिनी धेनु के प्रसाद स्वरूप रघु पुत्र राजा दिलीप को प्राप्त हुआ था । इक्ष्वाकु वंश में सर्व श्रेष्ठ होने के कारण हरिवंश पुराण (१ : १५) ने इसे अयोध्या का प्रथम राजा माना है । इस कालान्तर में इक्ष्वाकु वंश रघुवंश नाम से विख्यात हुआ है । रघुवंश (५) तथा स्कन्द (२ : ८२) पुराण में रघु के दान एवं गौरव का वर्णन किया गया है । रघु को अपने पूर्वज युवनाश्व राजा द्वारा दिव्य खड्ग प्राप्त हुआ था । इस खड्ग को उसने अपने वंशज हरिश्चाश्व को दे दिया था । रघु के पुत्र अज थे । अज के पुत्र दशरथ थे । दशरथ के पुत्र भगवान् रामचन्द्र थे । कल्हण ने रघुवंश में जैसे रघु श्रेष्ठ थे । उनके नाम पर वंश चला था । उसी प्रकार गोनन्द वंश में यह गोनन्द राजा सर्व श्रेष्ठ हुआ था । उसी के नाम पर इस वंश की ख्याति गोनन्द वंश से हुई । यहाँ कल्हण रघु वंश की गोनन्द वंश तथा रघु की गोनन्द से तुलना करता है।