राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ राजतरंगिणी इन्द्रजिद्रावणावास्तां पितापुत्रौ नृपौ क्रमात् । पञ्चत्रिंशत्सहाद्धैश्च वर्षांस्त्रिंशद्ययोर्ययुः ॥ १५३ ॥ १५३. पिता तथा पुत्र इन्द्रजीत१ तथा रावण२ राजाओं ने क्रमशः ३५ वर्ष ६ मास तथा तीस वर्ष राज्य किये। बिन्दुरेखाच्छविर्यस्य दृष्टा भाव्यर्थशंमिनी । स रावणस्य पूजार्थं लिङ्गं भाति वटेश्वरः ॥ १५४ ॥ १५४. वटेश्वर नामक लिंग की रावण पूजा निमित्त उपयोग करता था। वह लिंग आज भी चमकता है। लिंग के चमकते बिन्दु एवं रेखाएँ भविष्य की सूचना देती हैं। ( ) काश्यपी : कल्हण कश्मीर को यहाँ काश्यपी अर्थात् कश्यप के देश के नाम से सम्बोधित करता है । (३) काल उल्लेख : कल्हण गोनन्द तृतीय के समय से क्रमबद्ध संवत् तथा राज्यकाल अपने इतिहास राजतरंगिणी में देना आरम्भ करता है। वह राजाओ का विधिवत् नाम देता है। उसने कश्मीर मण्डल की क्रमानुसार वंशावली तथा राज्य का वर्णन किया है। जीत नाम तथा उसका राज्यकाल ३५ वर्ष ६ मास दिया है । हसन के अनुसार राजा इन्द्रजीत क० १९५१ में बाप की जगह तख्त नशीन होकर कश्मीर और हिन्दुस्तान के आसपास के इलाकों पर काबिज हुआ। बाप की सल्तनत को अदल व इन्साफ से आबाद किया । ३५ वरस और ६ माह हकूमत की सतरंज खेलकर जिन्दगी का बिस्तरा लपेट लिया । पृष्ठ ४५. पाठभेद : श्लोक संख्या १९२ में 'गोनन्द' का 'गोनर्द' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९२ (१) आइने अकबरी में नाम विशन तथा राज्यकाल ५३ वर्ष दिया गया है । विभीषण का राज्यकाल लौकिक वर्ष १९२६ होना चाहिए । कल्हण ने राज्याभिषेक का कोई संवत् तथा काल नहीं दिया है । हसन के अनुसार—राजा बवीशान क ० १८९७ संवत् में बाप का जानशीन ताजशाही सर पर रखा और रियाया की आसाइश और खुशहाली में तिरपन साल बसर करके इस जहान से रुखसत हुआ। पृष्ठ ४५। १९३ (१) इन्द्रजीत : आइने अकबरी ने इन्दर- (२) रावण : आइने अकबरी ने रावेन नाम तथा उसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया है । गणना से लौकिक वर्ष २०१७ आता है । हसन के अनुसार राजा रावन बाप के मरने के बाद क० १९८६ में ताजशाही सर पर रख कर हिन्दुस्तान की सरज़मीन के बहुत से शहर फतह किये । तीस साल तक हुक्मरा था। पूजा-पाठ के लिये बटेश्वर का मन्दिर तामीर किया । मुमग्रफ गुलतस्तए काश्मीर ने उसे बादशाह का मन्दिर ख्याल किया है । हालांकि यह बिल्कुल गलत है । मतरजुम रत्नाकर ने बड़शाह के मन्दिर का नाम सोकथी बताया है । पृष्ठ ४५. पाठभेद : श्लोकसंख्या १५४ में 'पूजार्थं' का पाठभेद 'पूजार्ह' मिलता है ।