राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २५९ विहारे निवसन्नेकः किन्नरग्रामवर्तिनि । तस्य योगबलात्कोऽपि श्रमणोऽपाहरत्प्रियाम् ॥ १९९ ॥ १९९. किन्नरग्राम¹ स्थित एक 'विहार में रहने वाले श्रमण² ने योग बल द्वारा उसकी प्रिया का हरण कर लिया। विहाराणां सहस्राणि तत्कोपान्निर्ददाह सः । अजिग्रहच्च तद्ग्रामान्द्विजैर्मध्यमठाश्रयैः ॥ २०० ॥ २००. इस कारण कुपित होकर राजा ने सहस्रों विहारों¹ को जलवा दिया और उन विहारों पर चढ़े ग्रामों को मध्यमठ² निवासी ब्राह्मणों को दे दिया। ऋद्धापणं राजपथैर्नौयानोज्ज्वलनिम्नगम् । स्फीतपुष्पफलोद्यानं स्वर्गस्येवाभिधान्तरम् ॥ २०१ ॥ दिग्जयोपार्जितैर्वित्तैर्जितवित्तेशपत्तनम् । वितस्तापुलिने तेन नगरं निरमीयत ॥ २०२ ॥ २०१-२०२. दिग्विजय द्वारा उपार्जित धन से वितस्ता पुलिन में राजा ने एक नगर¹ निर्माण कराया था। वहाँ आने वाले राजपथों द्वारा बाजार सामानों से लदा था। नौकाओं के आवागमन से नदी की गरिमा बढ़ गयी थी। प्रभूत पुष्प एवं फलोद्यानों से पूर्ण नगर दूसरे स्वर्ग सदृश लगता था। वह नगर कुबेर की भी पुरी को मात करने वाला था। प्रजा को बुरे राजा की प्राप्ति होती है। यहाँ पर लोकतान्त्रिक सिद्धान्त की गौण रूप से पुष्टि की गयी है। प्रजा को जागरूक होना चाहिए। वह उसका भी कर्तव्य है कि सच्चरित्र राजा को दुश्चरित्र होने से बचाये। कल्हण ने यहाँ पर यह भी संकेत किया है कि सच्चरित्र राजा भी विषय दोष में लिप्त हो सकता है। यदि मन्त्रिगण, प्रजागण राजा को निरंकुश कर देते हैं तो निश्चय ही दोषों की ओर प्रवाहित हो जाता है। राजा चाटुकार, स्वार्थी, कुटिल पार्षदों से भी घिरा रहता है। वे अपने स्वार्थ सिद्धि किंवा राजा को प्रसन्न करने के लिए सन्मार्ग से कुमार्ग में बदल देते हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या १९९ में 'विहारे' का 'विकारे', 'विकारो', पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १९९ (१) किन्नर ग्राम : कश्मीर के मागिम परगना में कानिर ग्राम हो सकता है। एक किन्नौर क्षेत्र है जो किन्नर जाति का मूल स्थान माना जाता है। हिमाचल प्रदेश में है। मैं यहाँ गया हूँ। यहाँ के लोगों का मुख सुन्दर होता है। आकृति आर्यों तुल्य है। कहीं-कहीं पर्वतीय तथा मंगोल मिश्रण मालूम होता है। सम्भव है। पूर्व काल में इस स्थान पर लद्दाखी ढंग के आदमी अधिक रहते रहे हों। जिनका मुख लम्बा होता है। मैं लद्दाख में गया। वहाँ के लोगों की मुखाकृति देखकर पहली प्रतिक्रिया मेरी यही हुई कि वे आर्यवंशीय नहीं हैं। उनका मुख गोल होने की अपेक्षा लम्बा तथा चपटा अधिक होता है,। यहाँ अश्व की तरह मुख यदि शाब्दिक अर्थ में मान लिया जाय तो उन्हें हयग्रीव मनुष्य कहना होगा जो गलत होगा। (२) श्रमण : बौद्ध भिक्षु । पाठभेद : श्लोक संख्या २०० में 'अजिग्रहच्च' का पाठ भेद 'अजिग्रहश्च' मिलता है।