भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

प्रथम तरंग २६१ कदाचित्तस्य दूराध्वक्लान्तो मध्यन्दिने युवा । छायार्थी तत्सरःकच्छं विशाखाख्योऽविशद्विजः ॥ २०४ ॥ २०४. किसी समय मध्याह्नकाल में एक युवक विशाख नामक ब्राह्मण दूर मार्ग से थका हुआ उस सरोवर तट पर छाया निमित्त आया । सच्छायपादपतले समीरैः शमितक्लमः । शनैर्जलमुपस्पृश्य भोक्तुं सक्तून्प्रचक्रमे ॥ २०५ ॥ २०५. उस पादप तल की सुच्छाया में समीर के कारण उसकी क्लान्ति का शमन हो गया । हाथ-मुँह धोकर धीरे धीरे सत्तू¹ खाने लगा । पाठभेद : श्लोक संख्या २०३ में 'स्थितम्' का 'स्थितः' तथा 'सरः' का 'सारः' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०३ (१) सुश्रवा नाग : हरचरित चिन्ता- मणि (१०:२४८) में तथा नीलमत पुराण में सुश्रवा नाग का उल्लेख मिलता है । सुश्रवा नाग का स्थान विजयेश्वर तीर्थ के समीप था । आखुफालौ फलाफञ्च नागः कानसरस्तथा । सुश्रवो देवपालश्च नागेन्द्रोऽथ बलाहकः ॥ नी० ८९२:1062 (२) चन्द्रलेखा : श्लोक संख्या २०१ से २७९ तक चन्द्रलेखा उपाख्यान कल्हण ने वर्णन किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २०४ में 'मध्यं' वा पाठभेद 'मध्या', 'मध्ये' तथा 'मध्य' मिलता है । श्लोक संख्या २०५ में 'शर्मर्जलं' का पाठभेद 'सरोजलं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०५ (१) सत्तू : प्रचलित शब्द सत्तू है । पूर्वीय उत्तर प्रदेश तथा बिहार में मध्याह्न काल में गरीबों का एक मात्र भोजन है । पर्वतीय क्षेत्रों में सत्तू का प्रयोग किया जाता है । प्रायः भारतवर्ष मात्र में सत्तू का किसी न किसी रूप में प्रचलन है । यह बना बनाया भोजन है । मक्का, ज्वार, बाजरा, यव-चना का मुख्यतया सत्तू बनता है । यव-चना का मिश्रित सत्तू अत्यन्त स्वादिष्ट होता है । वह रोटी और दाल दोनों पोषक गुणों का मिश्रण है । मैं ग्रीष्म ऋतु में प्रायः सत्तू खाता हूँ । सत्तू मध्याह्न काल के पूर्व खाना चाहिए । सत्तू खाने के कई प्रकार हैं । पहला प्रकार नमक मिर्च, तथा आम की चटनी अथवा अचार से, तथा दूसरा प्रकार मीठा सत्तू खाने का है । इसमें दूध, चीनी अथवा घी चीनी मिलाते हैं । नमकीन सत्तू में भी सम्पन्न लोग घी मिलाकर प्रयोग करते हैं । सत्तू के होटल भी चलते हैं । उन्हें तुरन्त होटल कहा जाता है । जहाँ तुरन्त भोजन मिल जाता है । सत्तू का वेदोक्त नाम सक्तू है । परवर्ती संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में सक्तू शब्द विशेषतः यव के सक्तू का वाचक है । (सं० सं० ६:४:१०: ६, वा० सं० १९ २१, श० ब्रा० १:६:३१६,- ९:१:१:८) ऋग्वेद में केवल एक बार (१०:७१:२) इसका उल्लेख तितउ (चलनी) से चालने के प्रसंग में आया है । शतपथ ब्राह्मण (१३:२:१३) में 'देवानां वा एतद् रूपं यत्सक्तवः' में सक्तु का उल्लेख किया गया है । इसी प्रकार 'प्रजापतेर्वा एतद् रूपं यत्सक्तव .' का उल्लेख, तैत्तिरीय ब्राह्मण (३:८:१४:५) में किया गया है । सत्तू का इतना महत्त्व दिया गया है कि सत्तू संक्रान्ति पर्व के दिन सत्तू खाना धार्मिक कृत्य मान