राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० राजतरंगिणी तत्रैकस्मिन्किलोद्याने स्वच्छस्वादुजलाश्रितम् । आसीत्सुश्रवसो नाम्नो नागस्य वसतिः सरः ॥ २०३ ॥ २०३. वहाँ किसी एक उद्यान में स्वच्छ सुस्वादु जल मय सरोवर था। वहाँ सुश्रवा१ नामक नाग निवास करता था । पादटिप्पणियाँ : २०० (१) विहारदाह : कश्मीर में यह एक और उदाहरण मिलता है। जब राजा ने कुपित होकर धार्मिक स्थानों में आग लगवा दी थी । कश्मीर के अनेक राजाओं ने भविष्य में धार्मिक स्थानों को नष्ट करने का प्रयास किया है । राजा विषय वासना में लिप्त हो गया था । उसका प्रभाव अन्तःपुर में पड़ना अवश्यम्भावी था । राजा के कारण नैतिक पतन हो रहा था । इसका यह एक ज्वलन्त उदाहरण है कि एक श्रमण का यह साहस हुआ कि वह राजा की प्रिया को उठा ले गया । (२) मध्यमठ : इस स्थान का निश्चय नहीं किया जा सकता कि कहाँ था । कल्हण इस स्थान के विषय में कुछ संकेत भी नहीं करता । श्लोक संख्या २०१ तथा २०२ युग्म हैं । दोनों का अर्थ एक साथ किया गया है । २०१-२०२ (१) नगर किन्नर किंवा नर- पुर : राजा नर के पत्तन अर्थात् नगर का दो नाम दिया गया है । (रा० त० १ : २७४) उसे किन्नरपुर तथा (रा० त० १ : २४४) नरपुर कहा गया है । कल्हण ने चक्रधर का वर्णन (रा० त० १ : २६१, २७०, ८ १६१) करते हुए इस नगर का स्थान विजयेश्वर अथवा विजद्रोर के अत्यन्त समीप रखा है । यही बात स्थानीय जनश्रुति से भी प्रकट होती है । विजद्रोर से १ मील नीचे एक उदर है । जिसे आज भी तम्बरदर (चक्रधर) कहते हैं । यही पर चक्रधर का मन्दिर था । यहाँ वितस्ता एक प्रायद्वीप बनाती है । इन अधित्यका के दक्षिण-पूर्व कोने के समीप एक सूखी नीची भूमि है। वहाँ स्टीन को अपनी यात्रा (सन् १८८९ तथा १८९५) में स्थानीय लोगों से मालूम होता था कि इसी स्थान को सुश्रवा नाग का निवास स्थान कहा जाता था । कल्हण द्वारा वर्णित पुनरावृत्ति अभी तक स्था- नीय लोगों की परम्परा तथा स्मृति में जीवित है। तस्वरदर के टीले तथा विजद्रोर के मध्य के स्थान को लोग उस नगर की संज्ञा देते हैं जिसे नागों ने भस्म कर दिया था । प्राचीन यूनानी तथा भारतीय शककालीन मुद्राएँ बहुत संख्या में यहाँ मुख्यतया नदी पुलिन से प्राप्त हुई है । इन मुद्राओं की प्राप्ति द्वारा इस स्थान की प्राचीनता में किसी प्रकार का संदेह नहीं रह जाता । यहाँ बाढ़ के समय प्रति वर्ष जल आ जाता है । यदि उदर में खनन का कार्य किया जाय तो कुछ प्राचीन ऐतिहासिक सामग्रियाँ प्राप्त हो सकती हैं । कल्हण ( रा० त० १ : २७० ) के उल्लेख से प्रकट होता है कि उसके समय में भी यह स्थान अपना प्राचीन गौरव समाप्त कर ध्वंसावस्था में पड़ा था । पृष्ठ ८३ की टिप्पणियाँ द्रष्टव्य हैं । मैंने विजयेश्वर की यात्रा में इस स्थान को देखा है। श्री स्टीन ने जिस जनश्रुति का उल्लेख किया । उसे मैंने अतिवृद्धों से सुना है । आधुनिक काल से लोग - उसे भूल चुके हैं। भूल रहे हैं । वे इन संविधानों को कपोल कल्पना मानते हैं । अन्तरीप का दृश्य सुहावना है । स्थान के प्राचीन भूगोल तथा वर्णन में परिवर्तन हो गया है । बाढ़ के जल के कारण मूल रूप बदल गया है । कल्हण के समय निस्सन्देह बहुत कुछ प्राचीन अवशेष तथा रूप स्थायी रहे होंगे ।