राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २६१ कदाचित्तस्य दूराध्वक्लान्तो मध्यन्दिने युवा । छायार्थी तत्सरःकच्छं विशाखाख्योऽविशद्द्विजः ॥ २०४ ॥ २०४. किसी समय मध्याह्नकाल में एक युवक विशाख नामक ब्राह्मण दूर मार्ग से थका हुआ उस सरोवर तट पर छाया निमित्त आया । सच्छायपादपतले समीरैः शमितक्लमः । शनैर्जलमुपस्पृश्य भोक्तुं सक्तूनप्रचक्रमे ॥ २०५ ॥ २०५. उस पादप तल की सुछाया मे समीर के कारण उसकी क्लान्ति का शमन हो गया । हाथ-मुँह धोकर धीरे धीरे सत्तू ¹ खाने लगा । पाठभेद : श्लोक संख्या २०२ में 'द्विचतम्' का 'द्विचतः' तथा 'सरः' का 'सारः' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०३ (१) सुश्रवा नाग : हरचरित चिन्ता- मणि (१०:२४८) में तथा नीलमत पुराण मे सुश्रवा नाग का उल्लेख मिलता है । सुश्रवा नाग का स्थान विजयेश्वर तीर्थ के समीप था । आधुकालो फलाफश्च नागः कानसरस्तथा । सुश्रवो देवपालश्च नागेन्द्रोऽथ वलाहकः ॥ नी० ८६२:1062 (२) चन्द्रलेखा : श्लोक संख्या २०३ से २७९ तक चन्द्रलेखा उपाख्यान कल्हण ने वर्णन किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २०४ में 'मध्यं' का पाठभेद 'मध्या', 'मध्ये' तथा 'मध्य' मिलता है । श्लोक संख्या २०५ में 'शनैर्जल' का पाठभेद 'सरोजल' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०५ (१) सत्तू : प्रचलित शब्द सत्तू है। पूर्वीय उत्तर प्रदेश तथा विहार मे मध्याह्न काल में गरीबो का एक मात्र भोजन है। पर्वतीय क्षेत्रों में सत्तू का प्रयोग किया जाता है। प्रायः भारतवर्ष मात्र में सत्तू का किसी न किसी रूप में प्रचलन है। यह बना बनाया भोजन है। मक्का, ज्वार, बाजरा, यव-चना का मुख्यतया सत्तू बनता है । यव-चना का मिश्रित सत्तू अत्यन्त स्वादिष्ट होता है । वह रोटी और दाल दोनों पोषक गुणो का मिश्रण है । मै ग्रीष्म ऋतु में प्रायः सत्तू खाता हूँ । सत्तू मध्याह्न काल के पूर्व खाना चाहिए । सत्तू खाने के कई प्रकार हैं। पहला प्रकार नमक मिर्च, तथा आम की चटनी अथवा अचार से, तथा दूसरा प्रकार मीठा सत्तू खाने का है । इसमें दूध, चीनी अथवा घी चीनी मिलाते हैं । नमकीन सत्तू में भी सम्पन्न लोग घी मिलाकर प्रयोग करते हैं । सत्तू के होटल भी चलते है । उन्हे तुरन्त होटल कहा जाता है। जहाँ तुरन्त भोजन मिल जाता है । सत्तू का वेदोक्त नाम सक्तू है । परवर्ती संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थो में सक्तू शब्द विशेषतः यव के सक्तू का वाचक है । (तै० सं० ६:४:१०: ६, वा० सं० १९:२१, श० ब्रा० १:६:३१६,- ९:१:१:८) ऋग्वेद में केवल एक बार (१०:७१:२) इसका उल्लेख तितउ (चलनी) से चालने के प्रसंग में आया है । शतपथ ब्राह्मण (१३:२:१३) में 'देवानां वा एतद् रूपं यत्सक्तवः' में सक्तु का उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार 'प्रजापतेर्वा एतद् रूपं यत्सक्तवः' का उल्लेख, तैत्तिरीय ब्राह्मण (३:८:१४:५) में किया गया है । सत्तू का इतना महत्त्व दिया गया है कि सत्तू संक्रान्ति पर्व के दिन सत्तू खाना धार्मिक कृत्य मान