राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २६३ ते शशाङ्कानने दृष्ट्वा शनैरभ्यर्णमागते । विरगमाशनादारम्भान्मुहुर्व्रीडाजडीकृतः ॥ २१० ॥ २१०. उन शशांक आनन कन्याओं को समीप आयी देखकर वह लज्जा विमूढ़ हो भोजन आरम्भ करना बन्द कर दिया। भुञ्जाने कच्छगुच्छानां शिम्बोम्बुजलोचने । ते पुनर्दृष्टवानग्रे किंचिद्व्यापारितेक्षणः ॥ २११ ॥ २११. उसने किंचित् नेत्रघुमाकर देखा। कमलोचना वे दोनों कन्याएँ कच्छ गुच्छ१ की फलियाँ खा रही थीं। आकृतेर्हा धिगिदृश्या भोज्यमेतदिति द्विजः । ध्यायन्कृपार्द्रः संमान्य स ते सक्तूनभाजयत् ॥ २१२ ॥ २१२. 'धिक्कार है ! इस रूप का यह भोजन ? सम्मान्य तथा दयार्द्र उस ब्राह्मण ने उन दोनों कन्याओं को सत्तू खिलाया। उपनिन्ये च संगृह्य पुटकैश्चटसीकृतैः । तयोः पानाय पानीयं सरसः स्वच्छशीतलम् ॥ २१३ ॥ २१३. तत्पश्चात् पीने के लिये पत्रपुटक१ में स्वच्छ एवं शीतल सरोवर जल लाकर दिया। (२) तिलकम् : कल्हण ने युग्मम् तिलकम् तथा कुलकम्, तीनों श्लोक रचना शैली को किसी विषयों घटनाओं एवं श्रृंगार वर्णन के लिए अपनाया है। दो श्लोक में जहाँ भाव किंवा घटना प्रकट की जाती है उसे युग्मम्, तीन श्लोकों में प्रकट की जाती है उसे तिलकम् तथा पाँच से पन्द्रह श्लोक में जहाँ प्रकट किया जाता है उसे कुलकम् कहा जाता है। कल्हण ने श्लोक संख्या २०८, २०९, २१० तिलकम् में कन्याओं के सौन्दर्य का वर्णन किया है। प्रायः सभी अनुवादकर्ताओं ने तीनों श्लोक का अनुवाद एक ही मे किया है। मैंने उन्हें श्लोक के क्रम से दिया है। इन श्लोकों का रूप वर्णन अनुवाद में नहीं लाया जा सकता। तीनों श्लोक कल्हण की उत्तम कवित्व प्रतिभा प्रकट करते हैं। उनका रस उनके मूल में ही है। उनका अनुवाद कठिन है। प्रायः सभी अनुवादकारों ने भिन्न-भिन्न शैली तथा शब्दों का विभिन्न अर्थ करते हुए अनुवाद किया है। मैं स्वयं नही कह सकता कि इनका अनुवाद करने में मैं सफल हो सका हूं। पाठभेद : श्लोकसंख्या २१० में 'व्रीडा' का 'व्रीड' पाठ- भेद मिलता है। श्लोक संख्या २११ में 'दृष्ट्वा' का पाठभेद 'धृंष्ट्वा' 'सृष्ट्वा' तथा 'पृष्ट्वा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २११ (१) कच्छ गुच्छ : कश्मीर में इसे 'कचदन' कहते हैं। एक प्रकार की घास है। उपत्यका के घर तथा सुनिश्चित नदी के समीप बहुत होता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २१२ में 'कृपार्द्र' का पाठभेद 'कृपाद्री' मिलता है। श्लोक संख्या २१३ में 'शीतलम्' का 'शीत्कृतम्' पाठभेद मिलता है।