भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

२६२ राजतरंगिणी तान्याणौ गृहीतैवाथ तेन तीरविहारिभिः । पूर्वमाकणितो हंसैः शुश्रुवे नूपुरध्वनिः ॥ २०६ ॥ २०६. उसने ग्रास हाथ में लिया ही था कि नूपुरध्वनि सुना। उस ध्वनि को तटपर विहार करने वाले हंसों द्वारा पूर्व ही सुन चुका था। निर्गते मञ्जरीकुञ्जादपश्यत्पुरतस्ततः । कन्ये नीलनिचोलिन्यौ स केचिच्चारुलोचने ॥ २०७ ॥ २०७. नील निचोल¹ धारिणी चारुलोचना दो कन्याओं को उसने मंजरी कुञ्ज से निकलती सम्मुख देखा। कर्णिकापद्मरागाब्जनाललीलायितस्पृशा । मनोज्ञधवलापाङ्गे तनीयोऽञ्जनरेखया ॥ २०८ ॥ २०८. मनोज्ञ धवल अपांग की पतली अंजन रेखा, उसके कर्ण कुण्डल में लगे पद्मराग मणि के कमल नाल तुल्य लग रही थी। हारिनेत्राञ्चलैर्मन्दमारुतान्दोलनाकुलैः । सनाथांसयुगे रूपपताकापल्लवैरिव ॥ २०६ ॥ २०६. उनके दोनों स्कन्धों¹ पर मन्द मन्द मरुत के आन्दोलन से आकुल मंजुल नेत्रांचल, सौन्दर्य के पताका पल्लव सदृश लग रहे थे। लिया गया है। इस दिन ब्राह्मणों को सत्तू, एक झंझर भरा जल तथा दक्षिणा देने की परम्परा प्रचलित है। वैदिक साहित्य में इन्द्र के प्रसंग मे वर्णन मिलता है। उनका स्वागत सत्तू तथा सोमरस से किया जाता था। पाठभेद : श्लोक संख्या २०७ में 'निर्गते' का पाठभेद 'निर्गतो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २०७ (१) निचोल : चोल का शाब्दिक अर्थ चोली अथवा अंगिया है। चोले अथवा निचोल संस्कृत शब्द का अर्थ चादर, ओढनी, घूंघट, बुरका, पलंग- पोश तथा पालकी का परदा होता है। सचोलक का अर्थ चोली तथा सदरी होता है। शाल शब्द निचोल से निकला है सरल भाषा में कह सकते है शाल शब्द चोल का अपभ्रंश है। सुदूर पुरा काल से कश्मीर का शाल प्रसिद्ध रहा है। यह कहना भ्रामक है। कश्मीर में शाल का बनना मुस्लिम काल में प्रारम्भ हुआ था। यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट ने शाल को विख्यात किया था। राज्यमुकुट धारण करते समय उसने शाल को मान्यता दी थी। उस समय पेरिस मे उन्हें 'शाले दिकश्मीर' कहा जाता था। २०९ (१) स्कन्ध : कालिदास के समान कल्हण नारी रूप का प्रशंसक रहा है। वह जहाँ भी कही नारी का वर्णन करता है उसका वर्णन अत्यन्त परिष्कृत, सौन्दर्यमय उसकी कवित्व प्रतिभा को प्रकट करता है। कालिदास ने नारी के स्कन्धों का सुन्दर वर्णन किया है। कल्हण ने भी वहाँ स्कन्धो की सुन्दरता का अति उत्तम वर्णन किया है। इस प्रकार कल्हण उँगलियो का वर्णन श्लोक संख्या २५३ में करता है।