राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ] हैं। यहाँ स्वच्छ जल पूर्ण एक सरोवर है। तक्षक का वह पवित्र स्थान है। तक्षक नागों का राजा है। धर्म नष्ट करने वाले कलि का मस्तक चक्रतुल्य नाग ने यहाँ उड़ा दिया था। पुरावृत्त है। तक्षक नाग ने इस क्षेत्र में केसर की खेती सर्वप्रथम करना आरम्भ किया था। आइने अकबरी में वर्णन आता है। ज्येष्ठमास में जब केसर की खेती आरम्भ की जाती है तो इस जलाशय की तीर्थ यात्रा की जाती है। (२:३५८ तथा रा० त० ४:१३१) माहात्म्य से प्रकट होता है कि हर्षेश्वर तीर्थ में तक्षक नाग का स्थान है। (श्लोक ८०) ज्येष्ठ की पूर्णिमा को हर्षेश्वर की तीर्थ यात्रा के समय तक्षक नाग के स्थान पर भी जाना चाहिए। तक्षक नाग का उल्लेख कल्हण ने पुनः रा० त० ४:२१६ में किया है। नीलमत पुराण में उल्लेख है : द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालौ द्वौ च कच्छपौ । द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गजौ द्वौ च तक्षकौ ॥ ४४५ नरपुर के प्रसंग में तक्षक नाग की यात्रा का वर्णन कल्हण ने किया है। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में इस तीर्थ का महत्त्व था। महाभारत में प्राप्य तीर्थों की तालिका में कश्मीर के केवल इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है। काश्मीरेष्वेव नागस्य भवनं तक्षकस्य च। वितस्ताख्यमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥ (म० व० ८२:९०) कश्मीर में नाग, विष्णु, शिव एवं सूर्य की पूजा अन्य देवताओं की अपेक्षा विशेष प्रचलित थी। अबुल फजल कश्मीर के देव स्थानों की निम्न- लिखित तालिका देता है—शिव = ४५, विष्णु = ६४, सूर्य = ३, दुर्गा = २२ और नाग = ७०० ।
[दायाँ स्तम्भ] आठवीं शताब्दी तक वराह तथा नरसिंह की पूजा प्रचलित हो गयी थी। अबुल फजल की उक्त तालिका से स्पष्ट है कि नाग पूजा तथा देवस्थान कश्मीर में सर्वाधिक लोकप्रिय थे। तक्षक नाग कश्यप एवं कद्रू का पुत्र था। (विष्णु १:१५; मत्स्य ६:७, म० पा० ५९:४०, ह० वं० १:३:१२१) उसके दो पुत्र अश्वसेन तथा श्रुतसेन थे। (म० आ० १:१४५–१४६) अर्जुन ने खाण्डव वन अग्नि को दिया। उस समय यहाँ तक्षक, उसकी पत्नी तथा अश्वसेन उप- स्थित थे। अश्वसेन की माता ने पुत्र को मुख में ले लिया। यह आकाशमार्ग द्वारा भागने लगी। अर्जुन ने बाणों द्वारा उसका शिरश्छेद कर दिया। तक्षक के मित्र इन्द्र थे। इन्द्र ने अश्वसेन की रक्षा का विचार किया। उसने अश्वसेन की रक्षा की (म० आ० २१८:६) इस घटना के समय तक्षक कुरुक्षेत्र में था। (म० आ० २१९: १३) तत्पश्चात् ऋषि शमीक के पुत्र शृंगी की प्रेरणा पर अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को डँस कर उसकी मृत्यु का कारण हुआ। जनमेजय तथा तक्षक में शत्रुता वेद ऋषि के शिष्य उतंक के कारण हुई थी। पौष्य राजा की रानी का गुरु उत्तंक था। पौष्य पत्नी ने अपना कुण्डल गुरुदक्षिणा स्वरूप उतंक को दिया। (म० आ० ३.२५) तक्षक नाग उस कुण्डल को हस्तगत करना चाहता था। उसने एक क्षपणक का वेष धारण किया। वह कभी दृश्य होता था। कभी अदृश्य हो जाता था। उतंक मार्ग में कुण्डल रखकर लघुशंका करने लगे। क्षपणक रूपधारी तक्षक ने कुण्डल चुरा लिया। उतंक आचमन कर लौटे। उन्होंने देखा। क्षपणक कुण्डल सहित भागा जा रहा था। उतंक ने पीछा किया। क्षपणक ने अपना मूल स्वरूप धारण किया। एक विवर में तक्षक नाग रूप प्रवेश किया। पाताल में पहुँचा। उतंकने बिल किया