भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

प्रथम तरंग २६७ द्रक्ष्यस्यावामपि तदा तदभ्यर्णकृतस्थिती । इत्युक्त्या फणिकन्ये ते क्षणादास्तां तिरोहिते ॥ २२१ ॥ २२१. 'उस समय हम दोनों को भी उनके समीप स्थित देखेंगे' यह कहकर वे फणि- कन्याएं तत्क्षण तिरोहित हो गयीं । क्रमात्प्रववृते सोऽथ नटचारणसंकुलः । प्रेक्षिलोकसमाकीर्णस्तत्र यात्रामहोत्सवः ॥ २२२ ॥ २२२. वहाँ नट चारण संकुल प्रेक्षक समाकीर्ण नाग यात्रा महोत्सव क्रम से आरम्भ हुआ । द्विजोऽपि कौतुकाकृष्टः पर्यटन् रङ्गमञ्जसा । कन्योक्तचिह्नज्ञातस्य नागस्याऽन्तिकमाययौ ॥ २२३ ॥ २२३. कौतुकाकृष्ट वह द्विज भी शीघ्रता पूर्वक मेले में पर्यटन करता हुआ, कन्या द्वारा बताए, चिन्ह से ज्ञात नाग के समीप आ गया । पार्श्वस्थिताभ्यां कन्याभ्यां पूर्वमावेदितोऽथ सः । द्विजन्मने व्याजहार स्वागतं नागनायकः ॥ २२४ ॥ २२४. पार्श्व स्थित दोनों कन्याओं ने उसके विषय में पिता को जना दिया था । अतएव नागनायक ने ब्राह्मण के लिये कहा--'स्वागत' । ततः कथान्तरे क्वाऽपि पृष्टः कारणमापदाम् । जगाद तं द्विजन्मानं निःश्वस्य श्वसनाशनः ॥ २२५ ॥ २२५. तदनन्तर कथा प्रसंग में आपदाओं का कारण पूछने पर उस द्विजन्मा से निःश्वास लेकर श्वसनाशन१ (नाग) बोला : विवर खोदा । पाताल पहुंचा । नागों की स्तुति की । (म० भा० ३:१५४-१५८ दे० भा० २:१०) । तक्षक को नष्ट करने की कामना से, ऋषि उत्तंक ने जनमेजय को सर्प यज्ञ करने के लिये, प्रेरित किया । सर्पसत्र राजा ने आयोजित किया । उसमें अट्ठारह सर्पकुल जलकर मर गये थे पिच्छाडक, मंडलक, पिंडसिक्त, रमेणक, उच्छिक, शरभ, भंग, विल्वतेजस, विरोहण, शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेचन, मुद्गर, शिशुरोमन, सुरोमान तथा महाहनु थे । तक्षक नाग ऋषि आस्तीक की कृपा से नागयज्ञ में हवि होने से बच गया । (म० भा० ४८:१८) महाभारत वर्णित कश्मीर के इस तीर्थ का महत्त्व आज भी है। भेवन ग्राम के समीप एक बड़े निर्मल सरोवर में तक्षक नाग की पूजा की जाती है । (रा० त० ७:६०७) पाठभेद : श्लोक संख्या २२१ में 'तद' का 'पाठभेद 'तदा' मिलता है । श्लोक संख्या २२४ में 'वेदितोऽथ' का पाठभेद 'वेदिताय' मिलता है । २२५ (१) श्वसनाशन : इसका अर्थ यहाँ नाग किंवा सर्प है । 'श्वसनः स्पर्शनो वायुः इत्यमरः'