राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ राजतरङ्गिणी अभिमानवतां ब्रह्मन्नुक्तायुक्तविवेकिनाम् । युज्यतेऽवश्यभोग्यानां दुःखानामप्रकाशनम् ॥ २२६ ॥ २२६. 'ब्रह्मन्' ! स्वाभिमानी युक्तायुक्तविवेकी जन अवश्यमेव भोग्य दुःखों को प्रकाशित करना ठीक नहीं समझते । परदुःखं समाकर्ण्य स्वभावसुजनो जनः । उपकारसमर्थत्वादप्राप्नोति हृदयव्यथाम् ॥२२७ ॥ २२७. 'स्वभावतः सज्जन जन, पर दुःख सुनकर उपकार करने में असमर्थ होने के कारण हार्दिक व्यथा का अनुभव करते हैं । वृत्तिं स्वां बहु मन्यते हृदि शुचं धत्तेऽनुकम्पोक्तिभि- र्व्यक्तं निन्दति योग्यतां मितमतिः कुर्वन्स्तुतोगत्मनः । गर्ह्योपायनिषेवणं कथयति स्थास्नुं यदन्यापदं श्रुत्वा दुःखमरंतुदां वितनुते पीडां जनः प्राकृतः ॥ २२८ ॥ २२८. मितमति साधारण जन दुखियों के दुःख को सुनकर, आत्मश्लाघा करता हुआ, उनकी अपेक्षा अपनी वृत्ति श्रेष्ठ समझता है । तथापि हृदय में शोक धारण करता हुआ, सहानुभूति पूर्ण वचनों से उनकी योग्यता की स्पष्ट निन्दा करता है । दुःख निवृत्ति निमित्त कुत्सित उपायों के आश्रय की मन्त्रणा देता है । अत एव विवेक्तॄणां यावदायूः स्वमानसे । जीर्णानि सुखदुःखानि दहन्त्यन्ते चिताऽनलः ॥ २२९ ॥ २२९. अतएव विवेकियों के मन में आजीवन जीर्ण हुए सुख-दुःख अन्त में चितानल ही जलाते हैं । अर्थात् वायु जिसका भोजन है उसे नाग कहते हैं । श्लोक संख्या २२८ में 'मति.' का 'मतेः'; सर्प हवा पीकर रहते हैं यह आम कहावत है । 'स्तुतोरा' का 'स्तुतेरा'; 'निषेवण' का 'निषेवन' तथा 'जनः' का 'पुनः' पाठभेद मिलता है । २२६ (१) दुःखः कल्हण का यह श्लोक अत्यन्त मार्मिक है । उसने स्वाभिमानी और विवेकी लोगों पादटिप्पणियाँ : के चरित्र का चित्रण किया है । वे भाग्य विपर्यय के कारण आये हुए दुःखों को चुपचाप सह लेते हैं । उसे २२८ (१) यह शार्दूल विक्रीडित छन्द है । प्रकट करने का किंचित् मात्र प्रयास नहीं करते । इसका लक्षण निम्न प्रकार से है । इसी भाव को कवि रहीम व्यक्त करता है । सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् । रहिमन निज मन को व्यथा मन ही राखो गोय । सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहै कोय ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २२९ में 'विवेक्तॄणां' का 'विव- श्लोक संख्या २२७ में 'समाकर्ण्य' का 'यदा क्तृणां', 'जीर्णानि' का 'दीर्घानि' तथा 'दीर्घाणि' कर्ण्य' तथा 'स्वभाव' का 'सुभाव' पाठभेद मिलता है । और 'चितानलः' का 'चितानिलः' पाठभेद मिलता है ।