राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २७३ तं च व्युत्क्रान्तदारिद्र्यः सरसोऽभ्यर्णमागतम् । कृतोपकारमन्येद्युर्निजोर्वमिनयद् द्विजम् ॥ २४० ॥ २४०. दारिद्र्य मुक्त नागराज ने उस उपकारी द्विज को, जो दूसरे दिन सरोवर पर आया था, अपने^१ स्थान पर ले गया । स तत्र पितुरादेशात्कन्याभ्यां विहितार्हणः । अमर्त्यसुलभैर्भोगैरतोप्यत दिने दिने ॥ २४१ ॥ २४१. वहाँ पिता के आदेश पर दोनों कन्यायें द्विज की शुश्रूषा करने लगीं । वह दिनोंदिन अमर्त्यों के सुलभ भोगों से तुष्ट होने लगा । कालेन सर्वनामन्त्र्य स्वां भुवं गन्तुमुद्यतः । प्रतिश्रुतवरं नागं चन्द्रलेखामयाचत ॥ २४२ ॥ २४२. कालान्तर में सबसे विदा लेकर, अपने घर जाने के लिये उद्यत हुआ । वर देने की प्रतिज्ञा करने वाले नाग से द्विज ने चन्द्रलेखा मांगी । यह जनश्रुति सत्य मानी जाती है। तूफानों द्वारा कृषि नष्ट कर भोजन प्राप्त करते हैं। यही बात तरंग ३:१६ में कही गयी है। उनकी तूफान पैदा करने वाली शक्ति का वर्णन तरंग १:२५९ में किया गया है। सियू-की (१:६५ तथा १२२) इसी प्रकार का वर्णन करता है। उपल वृष्टि, तूफान, हैंजा, जलप्लावन कश्मीर के लिये साधारण बातें हैं। हैंजा पर अब नियन्त्रण कर लिया गया है। जल प्लावन अर्थात् बाढ़ जब भी बारहमूला के पास बालू अथवा पत्थर नदी तल में एकत्रित हो जाते हैं, तो घोर वृष्टि होने पर जलस्तर उठ जाता है। उपत्यका में जल प्लावन का दृश्य उपस्थित हो जाता है। कश्मीर सरकार ने दो ड्रेजर खरीद लिया है। वे वितस्ता का बालू साफ करते हैं। अतएव जलप्लावन की सम्भावना कम हो गयी है। सन् १४६६, १५७६, १६८२, १७२३, १७३२, १७४५, १७९३ के जलप्लावन अत्यन्त उग्र थे। सन् १६८२ की बाढ़ एक मास तक कश्मीर में रही। सन् १८९३ में श्रीनगर के ७ पुलों में ६ वितस्ता के धारा प्रवाह में बह गये थे। पुरातन कागजों के देखने ३५ पर पता चलता है कि प्रत्येक १२ वर्षों में एक बार बाढ़ आने का क्रम रहा है। २४० (१) नाग स्थान : नीलमत के अनुसार नागाओं का निवास स्थान भोगवती नगरी है। यह नगर पाताल का एक खण्ड माना जाता है। बौद्ध ग्रन्थों में नगरों की तालिका में भोगवती नगरी का उल्लेख है। नागानामाह्वयं नागनाम्ना भोगवतीं पुरीम् । २२३:२९८ योगी भूत्वा स नागेन्द्र तत्रेहापि कृतालयः ॥ नीलमत पुराण में नये वर्ष के प्रथम दिवस पर महाशान्ति वर्णन में नाग द्वीप का उल्लेख किया गया है। इन्द्रद्युम्नः कशेरुस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् । नागद्वीपस्तथा सौम्य गान्धर्वो चारणस्तथा ॥ 591:७१२ ग्रहो नागस्तथा मासो यः स्यात्संवत्सरः प्रभुः । ग्रहो भविष्यद्वर्षस्य तथा मासस्य वारकः ॥ 625-७२५