भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

२७२ राजतरंगिणी तथा कुरु यथा भ्रश्येत्समयादेष नैष्ठिकः । योग्यां प्रतिक्रिया विद्मो वयमप्युपकर्तृषु ॥ २३६ ॥ २३६. 'आप ऐसा कीजिये कि यह नैष्ठिक १, जिसने प्रतिज्ञा कर ली है कि नवान्न नहीं ग्रहण करेगा, प्रतिज्ञा भ्रष्ट हो जाय । हम भी उपकारियों का योग्य प्रत्युपकार करना जानते हैं।' स तथेति ततो नागमुक्त्वा यत्नपरो द्विजः । अचिन्तयद्दिवारात्रं सस्यपालस्य वञ्चनाम् ॥ २३७ ॥ २३७. 'ऐसा ही करूंगा।' यत्न तत्पर उस द्विज ने नाग से कहकर, रातदिन उस सस्यपाल १ को व्रतभ्रष्ट करने की चिन्ता करने लगा । गूढं तस्य बहिःक्षेत्रकुटीगर्भकृतस्थितेः । पच्यमानान्नभाण्डान्तर्नवान्नं न्यक्षिपत्ततः ॥ २३८ ॥ २३८. जब मान्त्रिक खेत के बाहर कुटी में बैठा था, उस विप्र ने नैष्ठिक के पकते भोजन पात्र में छिपकर नवान्न डाल दिया । भुञ्जान एवं तत्तस्मिन्क्षणादेव जहार सः । अहीन्द्रः करकासारवर्षी स्फीतां फलश्रियम् ॥ २३६ ॥ २३६. मान्त्रिक के तत्क्षण भोजन ग्रहण करते ही अहीन्द्र १ ने उपल तथा घनघोर २ वृष्टि द्वारा खेतों की अत्यधिक उपज हरण कर ली । पर प्रेत बाधा प्रतिकार निमित्त श्राद्ध किया पाठभेद : जाता है । श्लोक २३७ में 'दिवारात्रम्' का 'दिवारात्रो'; २३६ (१) नैष्ठिक : नैष्ठिक शब्द निष्ठा से 'सस्य' का 'शस्य' तथा 'वञ्चनाम्' का 'वञ्चनं' बना है । किसी बात का व्रत लेना, प्रतिज्ञा करना, पाठभेद मिलता है । किसी बात का निर्णय लेकर उसपर दृढ़ रहने वाले पादटिप्पणियाँ : व्रती को नैष्ठिक कहते हैं । यह विशेषण है । उप- २३७ (१) सस्यपाल : पाल का अर्थ रक्षक, नयन से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक गुरुकुल में रहकर राजा, ग्वाल तथा सस्य का अर्थ अन्न होता है । ब्रह्मचर्य पालन करने वाले को भी नैष्ठिक कहा शाब्दिक अर्थ खेत की फसल तथा अन्न का रक्षक जाता है । किसी व्रत के अनुष्ठान में संलग्न व्यक्ति है। यहाँ पर अर्थ खेत की फसल की रखवाली के हेतु भी इस विशेषण का प्रयोग किया जाता है । करने वाला करना अच्छा होगा । कल्हण ने इस अर्थ में इस शब्द का यहाँ प्रयोग २३९ (१) अहीन्द्र : अहि का अर्थ सर्प, नाग, किया है। मान्त्रिक ने नवान्न न ग्रहण करने का व्रत वृत्रासुर, मेघ, जल, नक्षत्र, पृथ्वी तथा नाभि होता लिया था । उसका यह दृढ़ निश्चय था । एतदर्थ उसे हैं । अहीन्द्र का अर्थ सर्पों, नागों किंवा अहियों का नैष्ठिक कहा गया है। श्लोक संख्या २३८ में कुटी राजा है । यहाँ पर सुश्रवा नाग के लिए यह शब्द में इस मान्त्रिक का रहना कल्हण ने वर्णन किया आया है। है। इससे भी प्रतीत होता है। मान्त्रिक निष्ठावान, (२) उपल वृष्टि तथा तूफान : नागलोग गृह त्यागी और कुटी निवासी था । उपल वृष्टि तथा तूफान का रूप धारण करते हैं ।