राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वीप निवासी प्रेत को 'वी' कहते है। 'वी' में चिन्तन शक्ति रहती है। परन्तु स्वरूप का अभाव रहता है। वे स्वरूप धारण कर सकते हैं। तथापि अदृश्य रहते हैं। केवल मृत व्यक्ति उन्हें देख सकता है। असुर अर्थात् असीरिया निवासी प्रेत को 'एडिमू' कहते है। अकाल मृत्यु के पश्चात् 'एडिमू' की स्थिति होती है। प्रेत तुल्य 'एडिमू' प्राणियों को भयभीत करते हैं। वहां सात प्रकार के प्रेतों की कल्पना भारत के सप्त प्रेतो तुल्य की गयी है। चीनी लोग प्रेत को 'क्री' कहते हैं। 'क्री' रात्रि में विचरण करते हैं। मिस्र में प्रेत को 'खू' कहते हैं। जापान में प्रेत को 'ओनो' कहते हैं। उनका विश्वास है कि 'ओनो' त्रिनेत्र होते हैं। उनकी जिह्वा बाहर लपलपाती निकलती रहती है। उनका दर्शन केवल अर्ध रात्रि में होता है। इस्लाम में प्रेत को 'जिन' कहा जाता है। उनको संज्ञा शैतान से भी दी गयी है। पारसी धर्मानुयायी प्रेतों को देव तथा प्रेत योनि को 'वूजेज' कहते है। अहरीयन प्रेतो का नायक है। तिब्बत में प्रेतों को 'इहा' कहते हैं। पुराणों में प्रेतो के रूप का वर्णन किया गया है । उनका वर्ण कृष्ण, स्वरूप विकराल तथा पद की उंगलियाँ पीछे की तरफ होती हैं। उनकी छाया मनुष्यों के समान नही पडती। वे नकिया कर बोलते हैं। मृत्यु के उपरान्त लिंग शरीर रह जाता है। पिण्डादि दिया जाता है तो प्रेत शरीर होता है। वह उनका भोग शरीर होता है। स्वर्ग किंवा नरक प्राप्ति के पूर्व तक प्राणी प्रेतयोनि में रहता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कतिपय निषिद्ध कार्यों के करने पर प्रेत योनि प्राप्त होती है। निषिद्ध कर्मों की लम्बी तालिका है। उनमें मुख्य द्विज निन्दा, माता-पिता का निरादर, कन्या विक्रय, कुरुक्षेत्र में दान ग्रहण करना, गोवध, चोरी, मदिरा, दूध, दही, मट्ठा का विक्रय मुख्य है। प्रेतों के सम्बन्ध में धारणा है कि वे अपवित्र स्थानों में रहते हैं। अपवित्र वस्तु ग्रहण करते हैं। उनका सूई के समान पतला शिर तथा पेट बहुत बड़ा होता है। अतएव वे सर्वदा तृष्णा एवं क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। प्रेत संस्कार की विधि विहित है। प्रेत संस्कारों के द्वारा अनेक उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। मृत्यु के उपरान्त पूरक पिंड संस्कार या दस पिंड संस्कार द्वारा प्रेत देह की उत्पत्ति होती है। प्रथम पिंड द्वारा प्रेत का मस्तक, दूसरे द्वारा कान, आँख तथा नाक, तीसरे के द्वारा कंठ, स्कन्ध तथा हृदयस्थल, चौथे के द्वारा मूत्रेन्द्रिय, नाभि तथा गुदा, पाँचवें के द्वारा जंघा; छठे के द्वारा चर्म; सातवें के द्वारा नाड़ियां, आठवें के द्वारा दांत और केश, नवें के द्वारा वीर्य तथा दसवें पिण्ड के द्वारा सभी अंगों की पूर्ति होती है। मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् सपिण्डीकरण संस्कार होता है । उक्त संस्कार द्वारा व्यक्ति प्रेत देह तथा प्रेतयोनि का परित्याग करता है। प्रेत संस्कार करने का अधिकार ज्येष्ठ किंवा कनिष्ठ पुत्र को होता है। उनके अभाव में पौत्र प्रेत श्राद्ध तथा संस्कार कर सकता है। कर्मविशेष से प्रेत श्राद्ध होने पर भी कुछ लोग प्रेतयोनि में रहते हैं । उन्हें भूत कहा जाता है। प्रेत श्राद्ध निमित्त कुछ समय निश्चित है। चैत्र, आश्विन कृष्ण पक्ष, पितृ पक्ष उत्तम समय कहा गया है। प्रेतत्व दूर करने की पुराणों में अनेक विधियो का उल्लेख किया गया है। उनमें वृषोत्सर्ग मुख्य है । इसे आद्यंकोद्दिष्ट श्राद्ध भी कहते हैं। एक वर्ष तक प्रेत निमित्त प्रतिदिन जल तथा अन्न दान दिया जाता है। इसे अंबुघट श्राद्ध कहते है। प्रेत बाधा समाप्त करने के लिये गया में प्रेतशिला पर पिण्डदान करने का विधान है। गया में एक प्रेत पर्वत है। वहाँ श्राद्ध करने पर प्रेतोद्धार होता है। काशी में पिशाचमोचन