भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

२७० राजतरंगिणी क्षेत्राणि रक्षत्येतस्मिन्दृष्ट्वाऽपि फलसम्पदम् । भोक्तुं नैव समर्थाः स्मः प्रेता इव सरिज्जलम् ॥ २३५ ॥ २३५. इसके खेतों के रक्षक रहते हुए, हम प्रेतों के समान सरिता के जल तुल्य फल सम्पत्ति देखकर भी ग्रहण करने में असमर्थ हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २३४ में 'रत्ने' का 'रत्नेः' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २३४ (१) मात्रिक : कल्हण ने यहाँ नागों मे प्रचलित किसी पुरानी प्रथा की ओर संकेत किया है। नाग जाति नया अन्न मान्त्रिक के ग्रहण कर लेने पर ही खाते थे। यह संकेत यहाँ मिलता है। यह प्रथा किसी रूप में आज भी प्रचलित है। ग्रामों में पुरोहित तथा ब्राह्मणों को नवीन अन्न दान देने के पश्चात् ग्रहण करने की प्रथा भारत के अनेक अंचलों मे प्रचलित है। भगवान् की पूजा सूर्य प्रथम नवान्न तथा उससे बने सामान से की जाती है । तत्पश्चात् उसे ग्रहण किया जाता है । मान्त्रिको ने नवान्न नहीं ग्रहण किया था। अतएव तक्षक नाग की कन्याएँ नवान्न उपलब्ध होने पर भी ग्रहण नही कर रही थी। पाठभेद : श्लोक संख्या २३५ में 'रक्षत्ये' का 'रक्षत्वे' तथा 'दृष्ट्वा' का 'स्पृष्ट्वा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २३५ (१) प्रेतः मृत व्यक्तियों की संज्ञा सात नामों से दी जाती है। परामु, प्रातपंचत्व, परेत, प्रेत, मशियत, मृत तथा प्रभोत । मृत आत्मा की प्रेत एक अवस्था है । वह और्ध्वदैहिक कृत्य किये जाने के पूर्व रहती है। प्र+इत दो शब्दो के संयोग से प्रेत बना है। इसका अर्थ है-वह जो चला गया है। पापियो की आत्मा प्रेतस्वरूप चिर तृष्णा से तृषित रहती है। वे अपनी तृष्णा जल से तृप्त नही कर सकते। जल के समीप रहते जल पान से वंचित रहते हैं। मानव शरीर त्याग देने पर दिवंगत भूत हो जाता है। भूत का अर्थ शरीरहीन आत्मा । भूत तथा प्रेत में अन्तर है। पापी प्रेत होते हैं। भूत मरने पर सभी होते हैं। वैदिक काल में प्रेत दिवगत आत्मा के लिए व्यवहृत होता था । प्रेतो को जल नहीं प्राप्त होता । पश्चिम तथा पूर्वीय प्राचीन विश्वास के अनुसार वे जल की सीमा पार नही कर सकते । प्रेत का अर्थ भूत पिशाच बहुत बाद में होने लगा है। वैदिक साहित्य मे दिवंगत मानव के लिए प्रेत शब्द का प्रयोग किया है। ( शतपथ ब्राह्मण १०:५:२:१३ बृहदारण्यकोपनिषद् ५:११:१) दग्ध के पश्चात् पीपल वृक्ष से मृत्तिका पात्र मे 'घण्ट' लटका दिया जाता है। उस हँडिया मे छेद कर देते है । छेद मे कुशा डाल दिया जाता है । कुशाग्र से बूँद-मूँद जल गिरता है। शुद्ध होने तक दग्ध देने वाला व्यक्ति प्रातः तथा सायं उस पात्र में जल भर देता है । कथा है। यह टपकता बूँद प्रेत ग्रहण कर सकता है। प्रेत की कल्पना विश्व के समस्त साहित्य, धर्म तथा देशों में किसी न किसी रूप मे प्रचलित है। विश्वास किया जाता है। शरीर से आत्मा निकल कर इधर उधर भटकती रहती है। ब्राह्मण प्रेत को ब्रह्म कहा जाता है। स्त्री प्रेत को चुड़ैल कहते हैं। हत्याकारी तथा पापी प्रेत का पिशाच प्रचलित नाम है। प्रेत कल्पना का आधार जीव वाद है। प्रेत का स्वभाव प्रतिशोधात्मक माना गया है। बँक