भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

२७८ राजतरंगिणी शरण्याय प्रविष्ठानां भयाच्चक्रधरान्तिकम् । मुहूर्त्तान्निर्दहन्त सहस्राणि शरीरिणाम् ॥ २६१ ॥ २६१. भयग्रस्त सहस्रों प्राणी जो शरण हेतु, चक्रधर१ मन्दिर में प्रविष्ट हुए थे, वे मुहूर्त मात्र में जल गये। मधुकैटभयोर्मेदः प्रागूर्वोरिव चक्रिणम् । दग्धानां प्राणिनां तत्तत्तदा सर्वाङ्गमस्पृशत् ॥ २६२ ॥ २६२. प्राचीन काल में मधु-कैटभ१ के मेद से चक्रधर के दोनों ऊरु स्पर्श हुए थे। परन्तु इस समय उनका सर्वांग शरीर दग्ध प्राणियों के मेद से लिप्त हो गया था। हैं। उस समय गंगा के उज्ज्वल जल स्तर पर मयूर- पंख के 'आंख' पुच्छ तुल्य चित्र बन जाता है। २६१ (१) चक्रधर : टिप्पणी श्लोक ३८ (१) तथा श्लोक २०१ द्रष्टव्य है। कल्हण इस प्रकार का वर्णन पुनः तरंग ८.१९० में करता है। कल्हण का यह वर्णन नरपुर स्थान के निश्चय में सहायक होता है। चक्रधर के समीप नरपुर था। इस भयंकर अग्नि दाह के समय लोग त्रस्त हो कर चक्रधर मन्दिर में रक्षा निमित्त शरण लिये थे। परन्तु मन्दिर भी अग्निदाह से नही बच सका। वहाँ भी लोग जल मरे। मन्दिर नरपुर में, या उसके इतने पास था, कि लोग दौड़कर उसमे पहुँच गये थे। पाठभेद : श्लोक संख्या २६२ में 'मेदः' का 'मैतः' तथा 'तत्तत्' का पाठभेद 'तं तं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६२ (१) मधु कैटभ : मधु एवं कैटभ का वध पुरावृत्त के अनुसार भगवान् चक्रधर ने अपनी जंघा पर रख कर किया था। उनके वध के कारण मेद अर्थात् चर्बी उनके जांघ ही तक सीमित थी। इस समय संहार के कारण भगवान् का समस्त शरीर मज्जा पूर्ण हो गया था। मधु कैटभ असुर द्वय हैं। सुविख्यात है। मधु तथा कैटभ दोनों असुरों का जन्म ब्रह्मा के स्वेद से हुआ था। (विष्णु धर्म : १ : १५) पद्म पुराण सृ० ४० के अनुसार ब्रह्मा के तमोगुण द्वारा इनकी उत्पत्ति हुई थी। देवी भागवत (१ : ४) के अनुसार इनकी उत्पत्ति विष्णु भगवान् के कान की मैल अर्थात् खूँठ से हुई थी। महाभारत भी इस कथा का समर्थन करता है। भगवान् ने मृत्तिका से इनकी आकृति का निर्माण किया था। उन मूर्तियों में वायु का प्रवेश हो गया। अस्तु वे सप्राण हो गयीं। इन दोनों असुरों में मधु की त्वचा कोमल थी। अतएव उसका नाम मधु पड़ा। महाभारत में उनके जन्म की एक और कथा दी गयी है। भगवान् विष्णु के नाभिकमल पर जल के दो बिन्दु गिर गये थे। वे तमोगुण तथा रजोगुण के प्रतीक थे। भगवान् ने उन बूंदों पर दृष्टि- पात किया। उनमें एक मधु तथा दूसरा कैटभ हो गया। (म० शा० ३५५ : २२ ।२३) कठिन तपस्या द्वारा ये अजेयत्व प्राप्त कर लिये थे। कालान्तर में असुर स्वभावानुकूल प्राणियों को त्रस्त करने लगे। अतएव भगवान् विष्णु ने इनका वध किया। (दे० भा० १ : ४) महाभारत वन पर्व (१३ : ५०) में इनकी एक और कथा दी गयी है। जन्म के साथ ही दोनो ने ब्राह्मणों का वध करना आरम्भ कर दिया। ब्रह्मा की हत्या पर भी तत्पर हो गये। ब्रह्मा ने विष्णु की स्तुति की। भगवान् विष्णु का इन दोनों असुरों के साथ सहस्र वर्ष तक संघर्ष होता