राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २७७ अथ निर्भर्त्सनां तस्मादपि प्राप्तवताऽसकृत् । हठेन हर्तुं तां राज्ञा समादिश्यन्त सैनिकाः ॥ २५६ ॥ २५६. उस द्विज से निरन्तर तिरस्कृत होने पर भी उस राजा ने सैनिकों को बलात् उसको हरने का आदेश दिया। तैर्गृहाग्रे कृतास्कन्दो निर्गत्याऽन्येन वर्त्मना । त्राणार्थी नागभवनं सजानिः प्राविशद् द्विजः ॥ २५७ ॥ २५७. गृहाग्र उन सैनिकों से घिरा देख सपत्नीक त्राणार्थी उस द्विज ने अन्य मार्ग से निकल कर नागभवन में प्रवेश किया। ताभ्यामभ्येत्य वृत्तान्ते ततस्तस्मिन्निवेदितॆ । क्रोधाऽन्धः सरसस्तस्मादुज्जगाम फणीश्वरः ॥ २५८ ॥ २५८. समीप पहुँचकर उन दोनों के वृत्तान्त निवेदित करने पर क्रोधान्ध फणीश्वर उस सरोवर से बाहर निकला। उद्गर्जज्झिञ्झिजीमूतजनितध्वान्तसंततिः । स घोराशनिवर्षेण ददाह सपुरं नृपम् ॥ २५९ ॥ २५९. उस नाग ने काले बादलों से अन्धकार उत्पन्न कर भयंकर गर्जना की और घोर अशनि वृष्टि द्वारा नगर सहित राजा को भस्म कर दिया। दग्धप्राण्यङ्गविगलद्वसासृक्स्नेहवाहिनी । मयूरचन्द्रकाङ्केव धितस्ता समपद्यत ॥ २६० ॥ २६०. दग्ध प्राणियों के अंगों से विगलित वसा, रक्त एवं अन्य तरल शरीर तत्त्वों के बहने के कारण वितस्ता नदी विचित्र मयूर पंख तुल्य¹ हो गयी थी। २५५ (१) लज्जा : महाकवि कालिदास ने के मेद, मज्जा, रक्त तथा जले हुए शव नदी में वह कुमार संभव में उसी भाव को प्रदर्शित किया है। गये थे। कल्हण यहाँ अपनी कवित्व शक्ति का 'यमानयन्त्यात्मसुतोऽपि...... परिचय देता मज्जा, मेद, रक्त तथा जले हुए शव के वर्णन की तुलना मयूर पंख से करता है। नदी के न कामवृत्तिर्वचनीयमीक्षेत ५:८२ उज्ज्वल एवं निर्मल जलस्तर पर यदि जली हुई पाठभेद : श्मशान की लकड़ी, कोयला अथवा जला या अधजला श्लोक संख्या २५७ में 'वर्त्मना' का 'वर्म्मणा' शव तैरने लगे तो वह सचमुच कृष्ण मयूर पुच्छ तुल्य तथा 'सजानिः' का 'सजामिः' मिलता है। आकार बना देता है। मैने स्वयं एक समय काशी में पादटिप्पणियाँ : मणिकर्णिका घाट पर यह दृश्य बनते देखा है। २६० (१) मयूरपंख तुल्य : कल्हण के इस चिता शव दाह के पश्चात् ठण्डी की जाती है। वर्णन से सिद्ध होता है कि किन्नरपुर किंवा नरपुर चिता पर पानी डाला जाता है। जली लकड़ी, वितस्ता पुलिन में था। इतने समीप था कि लोगो कोयला, शव का शेषांश आदि गंगा में बहा दिये जाते