भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग २७९ स्वसा सुश्रवसो नागी रमण्याख्याऽद्रिगह्वरात् । साहायकायाऽश्मराशीन्समादाय तदाऽऽययौ ॥ २६३ ॥ २६३. उसी समय सुश्रवा की बहन रमणी (रमण्या१) नाम्नी नागी गिरि गह्वर से सहायता निमित्त अश्म राशि लेकर आयी । सा योजनाधिके शेषे मार्गस्यारात्सहोदरम् । कृतकार्यं निशम्याश्मवर्षं ग्रामेषु तज्जहौ ॥ २६४ ॥ २६४. एक योजन१ से कुछ अधिक मार्ग शेष रह गया, तो उसने अपने सहोदर भाई की सफलता सुनकर, अश्म राशि की वहीं ग्रामों पर वृष्टि कर दी । योजनानि ततः पञ्च जाता ग्रामधरा खिला । सा रमण्याटवीत्याद्याऽप्यस्ति स्थूलशिलाविला ॥ २६५ ॥ २६५. पाँच योजन तक ग्रामों की समस्त भूमि स्थूल शिला मय हो गयी और वह 'रमण्याटवी'१ आज भी है।

रहा। इन्हें मरता न देखकर भगवान् ने इन्हें मोहित किया । तत्पश्चात् उन्हें पलथी अर्थात् ऊरुओं पर रख कर मारा । (पद्म क्रि० २, मार्क० : ७८ ह. व ० ३ : १३) इनकी मेद से पृथ्वी बनी । अतएव पृथ्वी का नाम मेदिनी पड़ा । ब्रह्मा के निवेदन पर विष्णु ने उन्हें मारा था । अतएव विष्णु का नाम मधु- सूदन हो गया । (म० शा० २००:१४-१६) पद्म पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में वे हिरण्याक्ष के पक्ष से युद्ध में भाग लिये थे । देवों से वे मायायुद्ध करते थे । (पद्म० सू० : ७०) मधु-कैटभ असुरों के पूर्वज थे । तमोगुण प्रवृत्ति के कारण, उग्र प्रवृत्ति के हो गये थे । भयंकर एवं क्रूरकर्मा थे । कल्हण ने राजा नर तथा सुश्रवा नाग के संहार की तुलना मधु कैटभ की हत्या से की है । भगवान् विष्णु ने उन्हें ऊरु पर रख कर मारा था । भगवान् चक्रधर का केवल ऊरु प्रदेश तक असुरों के मेद, मज्जा एवं रक्त से भर गया था । परन्तु सुश्रवा नाग का नर सहार इतना क्रूरकर्मा एवं भयंकर था कि भगवान् चक्रधर का समस्त शरीर मानव मेद, मज्जा एवं रक्त से भर गया था ।

पाठभेद . श्लोक संख्या २६३ में 'राशीन्' का पाठभेद 'राशी' मिलता है । २६३ (१) रमण्या—यहाँ का "रमण्याख्याद्रि" पाठ बहुत भ्रामक है । इससे बहिन के नाम का और पर्वत के नाम का भी भ्रम होता है। रमणी शब्द स्त्रीवाचक भी है । रमण्या पर्वत है या बहन है ? श्री रणजीत नारायण पण्डित ने यहां पर रमण्या का पर्वत अर्थ लगाया है । श्री स्टीन ने 'रमण्या' नागी का नाम दिया है । रमणी अर्थ भी लगाया जा सकता है । रमणी+आख्या से रमण्याख्या बन जाता है । और श्लोक संख्या २६५ में भी यह बैठता है। वहाँ पर रमणी+अटवी 'रमण्यटवी' बन जाता है । रमण्या+अटवी यदि मान कर सन्धि की जाय तो रमण्याटवी बन जाता है। जो अभीष्ट नहीं है । क्योंकि पाठ रमण्य टवी है। पाठभेद : श्लोक संख्या २६४ में 'सा यो' का 'स यो' तथा 'रात्सहोदरम् का 'रात्महोदरम्' पाठभेद मिलता है । २६४ (१) योजन : एक योजन चार कोस का होता है। एक कोस २ मील का होता है।