भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

२८० राजतरंगिणी घोरं जनक्षयं कृत्वा प्रातः सानुशयोऽप्यहिः । लोकापवादान्निर्विण्णः स्थानमुत्सृज्य तद्ययौ ॥ २६६ ॥ २६६. घोर जन क्षय करके भी पश्चात्तापयुक्त नागराज लोकापवाद से खिन्न होकर, प्रातः काल उस स्थान का त्याग कर चला गया । दुग्धाब्धिधवलं तेन सरो दूरगिरौ कृतम् । अमरेश्वरयात्रायां जनैरद्यापि दृश्यते ॥ २६७ ॥ २६७. उसने दूर पर्वत पर दुग्ध सागर तुल्य धवल एक सर१ का निर्माण कराया। अमरेश्वर२ यात्रा में जनता उसे आज भी देखती है। अल्बेरूनी लिखता है—हिन्दुओ में दूरी नापने का जाती है। नदी का पाट प्रायः वर्ष मे सूखा रहता माप है। उसे योजन कहते हैं। योजन ८ मील है। केवल बाढ़ के समय जल से पाट भर जाता है। का होता है। अर्थात् २३,००० गज होता है। श्मूरन के समीप इसका पाट दो मील का हो जाता इस नाप के अनुसार अल फज़ारी ने अपनी गणित है परन्तु लितर गाँव के ऊपर से यह पाट संकुचित ज्योतिष पुस्तिका में पृथ्वी की परिधि का नाप होने लगता है। प्रवाह एक ही धारा बनकर मूली दिया है। योजन को उसने 'जुन' कहा है। जुन बलुई भूमि से बहने लगती है। लित्तर ग्राम के ऊपर का बहुवचन अजवान होगा। पथरीली भूमि मे वह स्थान मिलता है जहाँ कहा पाठभेद : जाता है कि रमण्या ने पत्थरों की वर्षा की थी। श्लोक संख्या २६५ में 'खिला' का 'शिला' चक्रधर और इस स्थान के मध्य ८ मील की दूरी 'रमण्याटवी' का 'रमण्यटवी' तथा 'व्यस्तित' का होगी। कल्हण के वर्णन से बिल्कुल मिलता है। वह पाठभेद 'व्यस्थि' मिलता है। कहता है चक्रधर से एक योजन से कुछ ऊपर अर्थात् पादटिप्पणियां : ८ मील की दूरी पर रमण्या ने पत्थर फेंक दिया था। २६५. (१) रमण्याटवी : नागराज सुश्रवा की कल्हण ने लिखा है। शिला वृष्टि द्वारा ५ योजन बहन का पुरावृत्त यहाँ दिया गया है। उसे राम- की सीमित भूमि बेकार कर दी गयी। स्टीन के ब्यार नदी के सन्दर्भ में कहा गया है। रामब्यार नदी मत के अनुसार माप मे कुछ स्थान कम उतरता का शुद्ध संस्कृत शब्द रमण्याटवी है। है। हुरपुर से लितर की आबादी के मध्य की रामब्यार नदी पीर पंजाल पर्वत माला तथा भूमि की दूरी लगभग २२ मील होगी। यह पाँच रूपरी दरों के मध्य बहने वाली जल धाराओं को योजन अर्थात् बीस मील से कम स्थान होगा। अपने में मिलाती है। हुरपुर के समीप से बहती हुई वर्तमान काश्मीरी कोस डेढ़ मील का होता है। मुड़यान होती उत्तर-पूर्व बहने लगती है। यह कल्हण तरंग (७:३९३) तथा विक्रमांकदेव चरित्र वितस्ता में गम्भीर संगम के समीप आकर मिलती में विल्हण के दिए गए माप (१८:७०) अर्थात् है। यह संगम चक्रधर से तीन मील अधोभाग मे पुराना काश्मीरी कोस इससे कम न होगा। है। हुरपुर अथवा हरिपुर से यह अनेक छोटी-छोटी २६७ (१) सुश्रवा सरोवर : यह सरोवर धाराओं में पत्थरों के टोको और कंकड़ों से ठोकर जिसके साथ सुश्रवा नाग के निवास का पुरावृत्त जुड़ा खाती बहने लगती है। आगे बढ़ने पर थोड़ी होती है, लिद्दर नदी के एक उद्गम स्थान के पास है। यह

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास) · पृष्ठ 383, कुल 984 में से · BharatKosha