भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग २८१

शेष नाग नाम से प्रसिद्ध है। अमरेश्वर तीर्थ यात्रा का यह एक प्रमुख स्थान है। अमरेश्वर माहात्म्य के अध्याय ६ में जो पुरावृत्त कहा गया है। उससे यह सरोवर शेष नाग के सरोवर से मिलता है। उसी अध्याय में सरोवर की संज्ञा सुध्र- मस नाग से दी गयी है। सुश्रमस शब्द सुश्रवा का अपभ्रंश मालूम होता है। अमरेश्वर के पुराने पुरो- हित इसे अभी भी सुश्रम नाग सरोवर कहते हैं। इस सरोवर का जल उज्ज्वल है। यह विशेष ध्यान देने की बात है। चारो तरफ के चूने के पत्थरो के चट्टानों के प्रतिबिम्ब के कारण इसका उज्ज्वल रंग प्रतीत होता हो। एक संकीर्ण जल स्रोत इस सरोवर में जल लाता है। दक्षिण दिशा में कोहेन हर शिखर की ओर है। इसे जामातुर नाग कहा है। जामातुर का अर्थ जामाता होता है। सुश्रवा नाग का जामाता अर्थात् जामातृ विशाख था। अमरेश्वर यात्रा मार्ग में सुध्रम नाग के साथ इसका भी उल्लेख किया गया है। तीर्थ में इसका वर्णन मिलता है। (२) अमरनाथ यात्रा : अमरेश्वर यात्रा से यहाँ तात्पर्य अमरनाथ की यात्रा से है। शिव अमरे- श्वर उन देवताओं के सम्मुख प्रकट हुए थे जिन्होने उनकी स्तुति मृत्यु से रक्षा निमित्त की थी। यहां हिम शिव लिंग की पूजा होती है। कश्मीर की यह यात्रा अत्यधिक सर्वप्रिय है। यहाँ भारतवर्ष के सभी भागों से यात्री आते हैं। नीलमत पुराण में इस तीर्थ का बहुत कम उल्लेख है। इसी प्रकार राजतरंगिणी में भी अमरनाथ का बहुत कम उद्धरण दिया गया है। प्रतीत होता है कि प्राचीन काल मे इसका उतना महत्त्व नही था। जितना आजकल है। नीलमत पुराण ने कश्मीर के तीर्थों में अमरे- श्वर को भी एक तीर्थ तथा पर्वत माना है। यथा : अमरेशे नरः स्नात्वा गोशतस्य फलं लभेत् । मालिन्यां तु नर स्नात्वा दत्तगोदफलं लभेत् ॥ 1321 : १५३५ ३६

जोजिला पास के पूर्व और दक्षिण-पूर्व पर्वतमाला कश्मीर की पूर्वीय सीमा बनाती अपने मुख्य पर्वतमाला से फूटकर कई शाखाओं में हो जाती है। वह पर्वतशाखा प्रायः दक्षिण की तरफ जाती है। वितस्ता के धुर दक्षिणीय उद्गम स्थान तक चली आती है। वहा से वह उत्तर- पश्चिम घूमती है। बनिहाल पास के समीप आकर पीर पंजाल पर्वतमाला से मिल जाती है। इस पर्वत से चलकर मार्ग कश्मीर तथा याद्रवन उपत्यका को पूर्व में जोड़ता है। इस उपत्यका का जल चन्द्रभागा अर्थात् चनाब नदी में बहकर जाता है। यह मार्ग किस्तवार अर्थात् प्राचीन काष्ठाट उपत्यका से मिलाता है। काष्ठाट चन्द्रभागा नदी पर है। इस छत्र मे आबादी कम है। मार्ग दुर्गम है। भारतीय स्वाधीनता के पश्चात् सड़कें इस क्षेत्र मे बन गयी हैं। मार्ग सुगम हो गया है। दोनो उपत्यकाओ ने कश्मीर के इतिहास में अपने दुर्गम आवागमन के साधनों के कारण कोई महत्त्वपूर्ण भाग नही लिया है। वैदेशिक तथा व्यापारिक क्षेत्र में भी विशेष भाग नही लिया है। इसके उत्तरी छोर पर तुषार मण्डित पर्वतमाला है। समाप्त अमरेश्वर किंवा कल्हण कालीन अमरनाथ का तीर्थ है। हरमुकुट पर्वत के गंगा सरोवर के पश्चात् कश्मीर का सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान रहा है। कश्मीर के अगणित तीर्थों में हिन्दू तीर्थ यात्रियों को अमरनाथ की यात्रा आकर्षित करती है। बद्रीनाथ की यात्रा के पश्चात् अमरनाथ की यात्रा आधुनिक काल के तीर्थयात्रियों की दृष्टि में महत्त्व पूर्ण पर्वतीय तीर्थ यात्रा हो गयी है। यात्रा श्रावण मास में होती है। भगवान् अमरनाथ का हिमलिंग समुद्र तल से १२७२६ फुट ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ पर पारदर्शी हिमलिंग बनता है। शशि कला जिस प्रकार घटती-बढ़ती रहती है, उसी प्रकार