राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै। उनमें एक नाम गोला (मिहिरकुल) है। वह युद्ध के समय २ हजार हाथी तथा विशाल अश्वा- रोही सेना के साथ चलता है। यह भारत का राजा है। वह लोगों को नष्ट करता है। लोगों को सम्पत्ति भेंट करने के लिए बाध्य करता है। फितन नदी (सिन्धु) हूणों के देश को भारत से अलग करती है। यह उल्लेख सन् ५२५- ५३५ ई० का है। इससे दो बात सिद्ध होती हैं। तोरमाण भानुगुप्त से पराजित हो गया था। हूणों का राज्य सिन्धु नदी के पश्चिमी क्षेत्र तक सीमित रह गया था। तोरमाण के पश्चात् मिहिरकुल ने राज्य विस्तार का विचार किया। उसने उत्तरी भारत पर आक्रमण किया। सन् ५३० ई० के शिलालेख से प्रकट होता है वह उसके राज्य का १५वां वर्ष था। उस समय उसका राज्य ग्वालियर तक विस्तृत था। मिहिरकुल के यशोधर्मन तथा नरसिंह गुप्त के कारण उत्तरी भारत का त्याग करना पड़ा। उसने सन् ५४४-५५० ई० के बीच सिन्धु नदी के अधो- भाग स्थित राज्य प्राप्त करने का पुनः प्रयास किया, जिसे खो चुका था। यशोधर्मन महाप्रतापी राजा था। उसके चरणों पर अपमानित राजा मिहिरकुल का मस्तक झुका था। मिहिरकुल शिव के अतिरिक्त और किसी के सम्मुख मस्तक झुकाने में सर्वथा अशक्य था। जिसकी भुजाएं तुषार पर्वत का आलिंगन करती थीं। उसे अपने राज्य के दुर्दम्य होने का दम्भ उत्पन्न हो गया था। यहां तुषार पर्वत से अर्थ हूणों का उस समय हिमालय के पर्वतीय खण्ड में रहना सिद्ध करता है। सुंग-युन ने स्पष्ट कहा है कि हूण राज का कश्मीर के राजा से संघर्ष हुआ था। तुषारपात कश्मीर के अतिरिक्त पश्चिम दिशा में और कहीं नहीं होता अतएव कश्मीर में हूणों का रहना लक्ष्य करता है। मिहिरकुल जब भारत के भीतरी भागों में घुसने का प्रयास कर रहा था। तो मालवा के राजा यशोधर्मन ने उसका सामना किया था। यशोधर्मन के पश्चात् मिहिरकुल का पुनः शक्तिशाली हो जाना मालूम होता है। मिहिरकुल अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का था। पर्यटक ह्वेनसांग के अनुसार उसने स्यालकोट तथा समीपवर्ती भूभागों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। किसी समय बौद्ध भिक्षुक से रुष्ट हो गया था। उसने अपने अधिकारियों को आज्ञा दी। हिन्दुस्तान के बौद्धों का नाश कर दिया जाय। बुद्ध अनुशासन समाप्त कर दिया जाय। बुद्ध सङ्घ से सम्बन्धित कोई चीज शेष न रह जाय। इसने कश्मीर पर अधिकार करने के पश्चात् वहां बौद्ध विहारों तथा स्तूपों को नष्ट करा दिया। सम्पत्तियां जप्त कर लीं। हूण बौद्ध नहीं थे। वे पिशाचों की पूजा करते थे। हूण राज्य के साथ किपिन अर्थात् कश्मीर का सीमावर्ती विवाद हुआ था। कश्मीर तथा हूण राज में ३ वर्ष तक युद्ध चलता रहा। स्कन्दरिया निवासी एक यूनानी ने हूणों के समय के गुप्तवंशीय राजा का नाम नरसिंह बाला- दित्य दिया है। वह यशोधर्मन तथा हूणों के आक्रमणों से त्रस्त हो गया था। गुप्त साम्राज्य की शक्ति क्षीण होती देखकर हूणों ने अपनी शक्ति बढ़ा ली। वह मिहिरकुल को भेंट भी देने लगा। बालादित्य के साथ हुए युद्ध का वर्णन ह्वेन- सांग करता है—बालादित्य भगवान् बुद्ध के प्रति श्रद्धा-भक्ति रखता था। मिहिरकुल के अत्याचार की बात सुनी तो उसने भेंट भेजना बन्द कर दिया। मिहिरकुल ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। बालादित्य ने एक द्वीप पर शरण ली। सूचना प्राप्त होने पर नाव द्वारा मिहिर- कुल ने द्वीप पर आक्रमण किया। द्वीप पर उसकी