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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

प्रथम तरंग २९५

को समाप्त किया। स्तूप, चैत्य तथा विहारों को नष्ट किया। देश को लूटा। अपनी लूट तथा युद्धबन्दियों के साथ कश्मीर लौट पड़ा। मार्ग में उसने बन्दियों को सिन्धु तट पर मार डाला। अन्ततोगत्वा भारत से हूण लोग थानेश्वर के हर्षवंशीय राजाओं द्वारा निकाल बाहर किये गये। हूण बौद्धों के विरोधी थे। वे शिव के उपासक थे। उन्होंने शिव मन्दिर निर्माण कराया था। वे शैव मत के समर्थक थे।

मिहिरकुल तोरमाण का पुत्र था। तोरमाण की मुद्राओं से पता चलता है कि उसने मध्य प्रदेश से इरन सागर तक अधिकार कर लिया था। उससे यह भी पता चलता है कि वह उत्तर प्रदेश, पंजाब और कश्मीर तक पहुँच गया था। तोरमाण ने जैन धर्म जैन श्रुति के अनुसार स्वीकार कर लिया था। पव्वैया में रहने लगा था। यह स्थान चन्द्रभागा अर्थात् चनाब नदी के तट पर पंजाब में है। तोरमाण का उत्तराधिकारी मिहिर- कुल सन् ५१५ ई० में राज्यसिंहासन पर बैठा।

यशोवर्मा तथा बालादित्य से हार कर वह कश्मीर राजा के आश्रय में आया। राजा ने उसे कश्मीर में एक जागीर दी। किन्तु वह कश्मीर के राजा को हटा कर स्वयं राजा बन गया। उसने कन्धार पर आक्रमण कर विजय किया। अनेक लोगों को सिन्धु में डुबाकर मार डाला।

गया है। मिहिरकुल ने नरसिंहगुप्त बाला- दित्य (सन् ४८५-५३० ई०) को पराजित करने का निश्चय किया। परन्तु अपने साथियों के साथ बन्दी बना लिया गया। बालादित्य उसका वध करना चाहता था। परन्तु उसकी मां ने उसे मुक्त कर देने के लिए कहा। बालादित्य ने एक राज- कन्या से उसका विवाह कर दिया।

कश्मीरी इतिहासकारों तथा भारतीय इतिहास- कारों के पाठ में मेल नहीं खाता। मन्दसौर के

शिलालेख से पता चलता है। शैव यशोधर्मन के सम्मुख मिहिरकुल का मस्तक झुक गया था।

कोसमस ने इंडिको प्लुस्तस में मिहिर- कुल (कोसमस : इण्डिको प्लुतस) को गोला नाम से सम्बोधित किया है। चीनी पर्यटक सुंग- युन ने इसे गान्धार का शासक 'येथा' कहा है। मिहिरकुल की राज्य सभा में सन् ५२० ई० में अपना जाना वर्णन करता है।

ह्वेनसांग ने मिहिरकुल को मोह-हिस लो-बुलो लिखा है। उसे महान् साहसी लिखा है। कोई भी ऐसा पड़ोसी राजा नहीं था जो उसका आदेश नहीं मानता था। उसने मिहिरकुल को बौद्धों के एक बड़े भारी पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया है। गाया है कि मिहिरकुल ने बौद्धों से एक उपदेशक मांगा। भिक्षुगण उसके भय किंवा स्वल्प ज्ञानी होने के कारण कुछ निश्चय न कर सके। अन्त में उन्होंने राजा के राजभवन के एक भृत्य बौद्ध को धर्मज्ञानी के रूप में चुना। राजा ने अपना अपमान समझा। क्रुद्ध होकर उसने बौद्ध संघ के नाश का आदेश दिया। इससे प्रकट होता है। उस समय बौद्ध संघ निष्क्रिय, प्राणहीन एवं अश्र हो गया था।

राजतरंगिणी का वर्णन तोरमान तथा मिहिर- कुल के भारतीय ऐतिहासिक वर्णन से मेल नहीं खाता। राजतरंगिणी के अनुसार तोरमाण तथा मिहिरकुल के समयों में अन्तर पड़ता है।

चीनी राजदूत सुंगयुन ने सन् ५२० ई० में गान्धार की सीमा के शिविर में राजा मिहिरकुल से भेंट की थी। उसने उस समय के इतिहास पर प्रकाश डाला है। वह अपने समय से दो पीढ़ी पूर्व का इतिहास देकर तत्कालीन समय का वर्णन करता है। वह मिहिरकुल से उसके राज्य के प्रारम्भिक काल में सम्भवतः मिला था। वह लिखता है—उत्तर भारत में श्वेत हूण रहते

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