भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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६९४ राजतरंगिणी मिलता है। कश्मीर के दक्षिण पश्चिम में दार्वा- भिसार का स्थान है। इस मत से पश्चिमोय- उत्तरीय पंजाब में इनका निवास प्रकट होता है। पुराणों में एक स्थान पर हूणों का और उल्लेख आता है। मा (म) रुका माल्वाश्चैव पारियात्रनिवासिनः । सौवीराः सैन्धवा हूणा शाल्वाः शाकलवासिनः ॥ विष्णु पुराण तथा कूर्म पुराण में 'सौवीरा सैन्धवा हूणाः' का उल्लेख आया है। यह भी इस बात की ओर संकेत करता है। पश्चिमी उत्तरी भारत में हूण रहते थे। उनका स्थान सिन्धु नदी से पश्चिम था। क्षोभा तन्त्र ५६ देशों की एक तालिका देता है। उसमें हूणों का उल्लेख है। उन्हें पुलिन्द, कौरव तथा गान्धार के साथ रखा है। संकेत मिलता है। वे पश्चिमोय उत्तरी भारत की तरफ रहते थे । मलाईचैव पामाराः पाषायान्यक (१) पुलिन्द (काः) । हु(हू)ण कौरवगान्धारविदर्भाः सविदेहकाः ॥४४।२ः४ शक्ति संगम तन्त्र ३।७।४३ में हूणों के देश का उल्लेख है। कामगिरिं समारभ्य द्वारकान्तं महेश्वरि । श्रीकुन्तलाभिधो देशो हूणो भृगु महेश्वरि ॥४३॥ यहाँ पर हूण देश कामगिरि के दक्षिण में तथा मरुदेश के उत्तर में रखा गया है। श्रो कुन्तल नाम के कई क्षेत्रों का वर्णन मिलता है। अतएव इस कुन्तल का निर्धारित करना कठिन है। यह कौन कुन्तल है। कामगिरि मरुस्थल के उत्तर में था। सिन्ध राजस्थान तथा पंजाब का दक्षिणी भाग मरुस्थल है। अतएव यहाँ कुन्तल से तात्पर्य उत्तर पश्चिमो भारत में लगाना चाहिए। काम देश का नाम सन् ११७६ ई० के एक अभिलेख में मिला है। जिसमें वहाँ के राजा को सपादलक्ष (सेवालिक) पर्वत के राजा के अन्तर्गत कहा गया है। हूणों को एक जाति के रूप में महाभारत ने चित्रित किया है। उनकी उत्पत्ति नन्दिनी गौ के फेन से हुई थी । गाथा का वर्णन महाभारत आदि पर्व (६५ : ५१) तथा वन पर्व (४३:१४) में किया गया है। हूणों के देश को हूण देश कहा गया है। उनका स्थान पश्चिम दिशा निर्धारित किया गया है। उन पर नकुल ने विजय प्राप्त की थी ! (सभा पर्व ३२ : १३) । हूण देश तथा जाति के राजागण युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भेंट लेकर आए थे ! (सभा पर्व ५१:३४) (२) मिहिरकुल : आइने अकबरी में नाम 'मेरह कुल' तथा राज्यकाल ७० वर्ष दिया गया है। राज्यकाल लौकिक वर्ष ३१७२ से आरम्भ माना जाता है। कुछ ऐतिहासिक इसका सन् ५१५- ५५० ई० मानते हैं। मिहिरकुल इफवेलाइट अथवा श्वेत हूण था। हूणों ने बौद्धों के विरुद्ध जिहाद बोला था। उनके विहारों तथा चैत्यों को नष्ट किया था। भिक्षुओं को तलवार की घाट उतारा था। ह्वेनसांग लिखता है- मिहिरकुल अपने अजेय साहस तथा प्रलोभनीय प्रकृति के कारण धूर्त्त व्यक्ति था। पड़ोसी राजाओं में ऐसा कोई नहीं था। जो सकम्पित उसके आदेशों का पालन न करता रहा हो।' आमू दरया से चलकर हूणों ने हिन्दूकुश पर्वत पार किया। गान्धार लिया। आगे बढ़ना चाहते थे। सन् ४६० ई० में स्कन्दगुप्त ने उनकी बाढ़ रोक ली । ईरान में हूण सफल हुए। ईरान ने हथियार रख दिया। सन् ४८४ ई० में ईरान के राजा को मारकर राज्य पर अधिकार कर लिया। पांचवीं शताब्दी के अन्त तक उनका राज्य बल्ख तक फैल गया । पाँचवीं शताब्दी में तोरमाण ने पंजाब पर अधिकार कर लिया। एक मत है। मालवा के राजा यशोवर्मा ने सन् ५३०-५४५ ई० के बीच हूणों पर विजय प्राप्त की थी। यह भी एक मत है। वे बालादित्य नरसिंह गुप्त से पराजित हो गये थे। इस पराजय के पश्चात् मिहिरकुल ने भारत कश्मीर विजय किया। वहाँ से उसने गान्धार पर आक्रमण किया। वहाँ के राजवंश