भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

[Page Header] प्रथम तरंग २६३

[Column 1] के साथ मुखातिब होकर कहा राजा साहब अपने पहले ही दिन औरतों को इस मुश्किल काम करने की तलकीन न फरमाई ताकि पाक दामनी के जोर से वह इस पत्थर को फना कर देती ओर फिर इतने बेगुनाहों का खून जनाह न होता । अगर औरतों के हाथ लगाने से इस पत्थर ने अपनी जगह से हरकत नहीं की तो हम देखेंगे कि यह सवासन जो अपने लोगों पर की है क्या आप अपने ऊपर कर सकते हैं ? यह कहा और अपना हकपरस्त हाथ पत्थर पर रखा और अपनी जगह से उठाकर एक तरफ फेंक दिया । एक दिन वही राजा अपने महल में दाखिल हुआ और अपनी रानी को देखा कि एक सुनहरी नकशा व निगार का कपड़ा अजीब तन किये हुए है उस पर राजा सिंगल द्वीप की तसबीर है। यह देखते ही राजा के गुस्सा की हाड़ी जोश में आ गयी । कसम खाई जब तक राजा सिंगल- द्वीप को सजा न दूंगा किसी काम पर हाथ न डालूंगा । उसी दिन से लड़ाई का साज़ व सामान जमा करके बहुत भारी फौज के हमराह सिंगल- द्वीप की तरफ रवाना हो गया । रास्ता में लाल चोल और कर्नाट के राजो को अपना मतिअ किया । और वहाँ से जहाजों और किश्तियों के जरिए सिंगल द्वीप में जा पहुँचा । बड़ी खूनरेजी और जंग व जदाल के बाद वहां के राजा को फौज की एक बड़ी तादाद के समेत कत्ल कर डाला । उसकी जगह दूसरा राजा बैठाकर हुक्म नाफ़िद कर दिया कि इसके बाद कपड़ों पर लोगों के तस्वीरों में सूरज की तसवीरें बनायें । वापसी के वक्त जुल्म जुल्म व तअदी से नाम लेकर बहुत-सा माल गनीमत इकट्ठा कर लिया । जिस वक्त पीर पंजाब के पहाड़ पर पहुँचा अचानक एक हाथी एक टीला से फिसल गया और फिसलते वक्त हाथी ने जोर जोर से दहाड़ें मारी । राजा को हाथी का दहाड़ना बहुत पसन्द आया । चुनांचे हुक्म दिया कि एक सौ हाथी इसी तरह टीला से नीचे गिराये जांय । इस वक़्त से उस जगह

[Column 2] को 'हस्तबज' कहते है । काश्मीर में पहुँचकर होल लाड़ के मुकाम पर मिहिरपुर नामका एक शहर आबाद किया । कन्दहार के बरहमनों को बड़ी बड़ी जागीरें अता कीं । मुख़्तसर यह कि किस्म किस्म के जुल्मों में वह जालिम इस मरतबा का था कि अहाता तहरीर में नही लाया जा सकता । सत्तर साल हुक्मरानी के बाद एक निहायत ही पचीदह और ख़तरनाक मर्ज उस पर तारी हो गया । एक दिन हवन के लिए आग जलाई थी उसमें अपने आप को आहुति की जगह जलती हुई आग में डालकर जला दिया ।' हूण—पुराणो में एक जाति के रूप मे हूणो का चित्रण किया है । राजा भरत ने अपने दिग्विजय काल मे हूणो का संहार किया था । (भागवत पुराण ६ : २० : ३०) मत्स्य पुराण (२७२ : १९) में १९ हूणों का वर्णन मिलता है । वैदिक साहित्य में हूणो का नाम नहीं मिलता । रघुवंश महाकाव्य में दिग्विजय के समय राजा रघु ने वक्षु के तट पर हूणो को पराजित किया था । (४:८५) । कालान्तर मे हूणों के लिए किसी किसी लेखक ने तुषार तथा तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया है । यद्यपि तुरुष्क, तथा तुषार वास्तव में तुर्कों के लिए व्यवहृत किया गया है । पुराणो में उल्लेख मिलता है— गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः । शतद्रुजा कुणिन्दाश्च पारदा हारहूणकाः ॥ ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदा हारहूणका' मार्कण्डेय पुराण में 'पारदा हारभूषिका' 'हारहूण' शब्दों का उल्लेख किया गया है । सम्भव है वे हूणों की एक शाखा रहे हों । हूणों ने मध्य एशिया से मध्यभारत तक की भूमि पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विजयकर, राज्य स्थापित किया था । कुछ लोगों का मत है । हार हूणो का स्थान हेरात क्षेत्र था । वे वही के निवासी थे । किन्तु यह विवादास्पद है । हर्षचरित मे हूणों का स्थान उत्तरापथ में रखा गया है । 'हूणदार्व्वास्तथैव च' का उल्लेख