भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

२९८ राजतरंगिणी जो उसके पश्चात् कश्मीर का राजा हुआ था। बक के पश्चात् सीधी वंश परम्परा का लोप होता है। उसी के एक वंश का क्षितिनन्द राजा होना कल्हण लिखता है। एक ओर कल्हण स्पष्ट वर्णन करता है तथा दूसरी तरफ तोरमाण तथा मिहिरकुल के शिलालेखो में कश्मीर का उल्लेख नहीं मिलता। 'गोपाद्ध्य' शब्द से उसका सम्बन्ध खींच तानकर जोड़ा जाता है। अशोक के समान मिहिरकुल के कश्मीर सम्बन्ध पर सन्देह किया जा सकता है। अशोक के सम्बन्ध में यही बात राजतरंगिणी में पाई जाती है जिसमे उसके दादा का नाम शकुनी दिया गया है। अशोक की वंशावली दी गयी है। उसमें गोधर, उसके पश्चात् उसका पुत्र सुवर्ण, उसके पश्चात् उसका पुत्र जनक तथा उसके पश्चात् शचीनर और उसके पश्चात् राजा शकुनी का प्रपौत्र अशोक राजा हुआ। जिस प्रकार कल्हण को दी गयी अशोक की वंशावली भारतीय इतिहास से मेल नही खाती उसी प्रकार मिहिरकुल की दी गयी कल्हण की वंशावली भारतीय इतिहास से मेल नहीं खाती। ग्वालियर का शिलालेख इस विषय में स्पष्ट है: श्री तोर (माण इ) ति पः प्रथितो (भू चक्र) यः प्रभूत-गुणः । सत्य प्रदान शौय्यांधेन मही न्याय तः शास्ता ॥ ३ तस्योदित कुल कीर्तेः पुत्रो ( ) तुल विक्रमः पतिः पृथ्व्याः । मिहिर कुले तिख्यातो ( ) भटगो यः पशुपतिम ॥ ४ यह मिहिरकुल या तो भारतीय राजा मिहिरकुल या अथवा वह कश्मीर का भिन्न राजा था। हसन ने रत्नाकर पुराण का उल्लेख बहुत किया है किन्तु उसने वही वंशावली दी है जो कल्हण की है। नीलमत पुराण हूण राजाओं, हूण जाति, तथा मिहिरकुल आदि किसी का उल्लेख नाममात्र के लिए नहीं करता। चीनी लेखकों ने मिहिरकुल के पिता का नाम नहीं दिया है। भारतीय इतिहास लेखको ने कल्हण तथा चीन पर्यटकों द्वारा कश्मीर राजा मिहिरकुल को एक मे मिलाने का प्रयास किया है। इन नामों की समता विशेष रूप से आधार मानी गयी है। इस विषय पर अभी घोर अनुसंधान तथा गवेषणा की आवश्यकता है। ग्वालियर का शिलालेख मिहिरकुल को वसुकुल का पुत्र बताता है। यह एक विचित्र पहेली है। ग्वालियर के शिलालेख तथा कल्हण के काल में ६०० वर्षों का अन्तर है। अतएव 'ग्वालियर का शिलालेख मिथ्या नहीं हो सकता। सम्भव है कि मिहिरकुल को कश्मीर राज्य की परम्परा में जोड़ने का प्रयास किया गया है। उसे ५ पीढ़ी से 'कुल' पदीयराजाओ के साथ कर दिया गया हो। तोरमाण और मिहिरकुल नाम में साम्य नही है परन्तु वसुकुल तथा .मिहिरकुल के नामो में साम्य है और वे एक- वंशीय मालूम होते हैं। यशोधर्मन के मन्दसोर प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है: आ लोहित्योपकण्ठा त्तलवन गह(नो) पत्यकादा महेन्द्रादा गंगाश्लिष्टसानोस्तुहिनशिखरणि पश्चिमादापयो धेः । सामन्तैर्यस्य बाहु द्रविण-हृत-म (दै): पादयोराननमद्भि श्चूडा-रत्नां शु-राजि व्यतिकर शवला भूमि भागा क्रियन्ते ॥५॥ स्थाणो रन्यत्रेण ऽणति कृपणतां प्रापितं नोत्तमाङ्गं यस्याश्लिष्टो भुजाभ्यां वहति हिमगिरि र्दुगि-शब्दाभिमान (म्) । नीचैस्तेनापि यस्य प्रणति भुजबला- वर्ज्जन क्लिष्ट मूर्ध्ना (चू) डा पुष्पोपहारेर्मिहिरकुल नृपे णार्चिचता (.) पादयुग्मं ॥६॥ ३