भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

प्रथम तरंग ३६० दक्षिणां सान्तक्रामाशां स्पर्धया जेतुमुद्यता । यन्निषादुत्तरहरिद्विभारान्यमिवान्तकम् ॥ २६० ॥ २९०. उत्तर १ दिशा ने, दक्षिण दिशा २ पर विजय प्राप्त करने के लिए दक्षिण के देवता काल की स्पर्धा में मिहिरकुल को यमराज तुल्य उपस्थित किया । सान्निध्यं यस्य सैन्यान्तर्हन्यमानाशनोत्सुकान् । अजानन्गृध्रकाकादीन्दृष्ट्वाऽग्रे धावतो जनाः ॥ २९१ ॥ २९१. राजा के समीप आने की सूचना लोग उसकी सेना द्वारा मारे जाने वालों के मांस उत्सुक गृध्र, काकादि पक्षियों को उसके आगमन के पूर्व मँडराते हुए देखकर पा जाते थे । दिवारात्र हतप्राणिसहस्रपरिवारितः । योऽभूद् भूपालवेतालो विलासभवनेष्वपि ॥ २९२ ॥ २९२. रात दिन सहस्रों हत प्राणियों से परावृत वह भूपाल अपने विलासभवन में भी वेताल १ था । बालेषु करुणा स्त्रीषु घृणा वृद्धेषु गौरवम् । न बभूव नृशंसस्य यस्य घोराकृतेर्ध्नतः ॥ २९३ ॥ २९३. घोर आकृति, नृशंस और मानव द्रोही इस राजा में बालकों के प्रति करुणा, स्त्रियों के प्रति घृणा तथा वृद्धों के प्रति गौरव भाव नहीं था । ( १ ) उत्तर दिशा : चारों दिशाओं के चार दिक्पाल किंवा देवता है । इन्द्र पूर्व दिशा, वरुण पश्चिम दिशा, कुबेर उत्तर दिशा तथा यम दक्षिण दिशा के देवता हैं। कुबेर धन के स्वामी हैं। उनके कारण लक्ष्मी प्राप्त होती है । वे पालक हैं । सम्पत्ति प्रदायक है । नाशक नहीं है । विष्णु भी रक्षक हैं । विष्णु मन्दिर का मुख इस लिये उत्तर तथा पूर्व दिशा रखा जाता है । उत्तर जिस प्रकार दक्षिण दिशा के ठीक विरोधी दिशा में है । उसी प्रकार दोनों दिशाओं के देवता तथा कर्म भी परस्पर विरोधी हैं । कल्हण इसी ओर संकेत करता है । उत्तर दिशा ने दक्षिण दिशा पर विजय प्राप्ति निमित्त दक्षिण दिशा के संहारक यम तुल्य मिहिरकुल स्वरूप यम- राज उत्पन्न किया था । ( २ ) दक्षिण दिशा : मृत्यु की दिशा है । उसका देवता यम है । शिव संहार के देवता है । अतएव शिव मन्दिर का द्वार दक्षिण तथा पश्चिम होता है । पश्चिम में सन्ध्या जन्म लेती है । व जीवन सन्ध्या की दिशा है । वहाँ अन्धकार उत्पन्न होता है । पूर्व दिशा उदय की दिशा है । वहाँ से सूर्य ज्योति अन्धकार को तिरोहित करती उठती है । और पश्चिम में जाकर लुप्त हो जाती है । उत्तर तथा पूर्व दिशा की ओर मुख कर उत्तम तथा पवित्र कार्य किये जाते हैं । मृत्यु के पश्चात् मनुष्यों का पद दक्षिण दिशा की ओर कर दिया जाता है । मुसलमान भी अपने शव का पद दक्षिण की ओर करके गाड़ते हैं । २९२ ( १ ) वेताल : पिशाचों का एक समूह वेताल कहा जाता है । रुद्र गणों में वेताल सम्मिलित है । रणभूमि में उपस्थित रहते हैं । वहाँ के मानव रक्त एवं मांस भक्षण करते हैं । ( भा०२:१०:३९ ) इनकी देवता मानकर भी पूजा की जाती है। इन्हें सर्वत्र शिव का उपासक माना गया है । ( मत्स्य