राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३०५ दोनों जलों में भिन्नता प्रकट होती है। संगम के पश्चात् काशी पहुँचने पर गंगा जल उतना उज्ज्वल नहीं रह जाता, जितना हरद्वार तथा प्रयाग में दिखाई देता है। हरद्वार से प्रयाग तक गंगा की धारा में तेजी रहती है। प्रयाग के पश्चात् वेग का लोप हो जाता है। स्थिरता आती है। हिमालय से गंगा तथा यमुना दोनों नदियाँ निकलती हैं। दोनों का जल सदृश होना चाहिए। परन्तु भिन्नता दिखाई पड़ती है। इस पर कुछ प्रकाश डालना आवश्यक है। गंगा में हरद्वार से प्रयाग तक मिलने वाली सब नदियों का स्रोत हिमालय है। सब हिमालय का जल लाकर गंगा में डालती हैं। अतएव गंगा का जल एक ही हिमालय एवं हिम गलने के कारण एक रूप रहता है। यमुना के साथ ठीक उलटी बात होती है। यमुना में मिलने वाली सब नदियाँ विन्ध्याचल, अरावली आदि से निकलती हैं। दक्षिण दिशा किंवा दक्षिण पथ से आकर यमुना में मिलती हैं। वे मैदानी क्षेत्र तथा विन्ध्य के उज्ज्वल वर्ण हीन पत्थरों का टकराया हुआ जल यमुना में लाती हैं। यमुना का जल हिमानी, हिम गलन उसके स्रोत के पश्चात् पुनः उसमें नहीं आता। किन्तु गंगा का जल हिमालय पर्वत के पत्थरों से, जो अपेक्षाकृत विन्ध्य के पत्थरों से अधिक उज्ज्वल हैं, टकराता बलुई भूमि से बहता आता है। वह अपनी उज्ज्वलता स्थिर रखता है। यमुना में आनेवाला जल दक्षिण की नदियों का जल है। ये नदियाँ बलुई भूमि से न होकर कुछ काली मिट्टी से बहती आती हैं। वह मिट्टी लसदार होती है। वह उत्तर प्रदेश के गंगा और हिमालय के मध्य भागोय क्षेत्र की मिट्टी की तरह भूरी तथा बलुआ नहीं है। स्पर्शस्पर्श एवं भौगोलिक स्थिति के कारण जल के रूप में परिवर्तन हो जाता है। जैसे एक ही पिता के दो पुत्र एक ही वर्ण एवं रूप के होते हुए भी यदि एक रूस में तथा दूसरा कांगो अथवा मद्रास में निवास करे तो कुछ समयपश्चात् दोनों के वर्ण में अन्तर पड़ जायगा। एक अधिक शीत के कारण गोरा ही रहेगा। दूसरा अल्पाधिक गरमी के कारण झाँवर होता जायगा। यही बात गंगा तथा यमुना के जलों के विषय में कही जा सकती है। सिंहल (श्रीलंका) तथा भारत अर्थात् रामेश्वर के बीच मनार की खाड़ी है। दोनों के मध्य पतला समुद्र भाग है जो भारत तथा सिंहल को अलग करता है। भगवान् रामचन्द्र ने पम्बन के पास सेतु बाँधा था। रामेश्वर का मन्दिर तथा स्थान पम्बन सेतु पार कर जाना पड़ता है। पम्बन से धनुषकोटि तथा रामेश्वर दो तरफ रेलवे लाइन गयी हैं। धनुषकोटि तथा रामेश्वर एक द्वीप पर हैं। धनुषकोटि से आज भी जहाज तथा नावें श्री लंका को जाती हैं। सन् १९६४-१९६७ ई० भारतीय नौपरिवहन मण्डल के अध्यक्ष होने के कारण मैं यहाँ कई बार आ चुका हूँ। सेतुम् समुद्र एक विशाल योजना है। उसके द्वारा बड़े जहाजों को भारतीय समुद्र में होकर आवागमन के लिये नहर बनाने की योजना है। इस समय जहाज भारत के पश्चिमी तट से पूर्वीय तट पर आने के लिये श्री लंका की परिक्रमा करते हैं। इस योजना के बनने पर ये सीधे भारतीय क्षेत्रीय जल सीमा के अन्दर ही पूर्व से पश्चिम तथा पश्चिमी से पूर्वीय तट पर पहुँच जायेंगे। लगभग ४०० मील की लम्बी यात्रा बच जायगी। उस समय मैंने यहाँ की भौगोलिक स्थिति आदि का विशेष अध्ययन किया। निस्सन्देह मिहिर- कुल धनुषकोटि अंचल पर अपना शिविर लगाया होगा। यहीं से सबसे संकीर्ण समुद्र पार करने का मार्ग हैं। समुद्र का जल यदि शीशे के गिलास में रख दिया जाय तो वह उतना नीला नहीं लगेगा। जल को गहराई, समुद्र अथवा नदी में जल का बाहरी १९