भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

An accurate line-by-line transcription of the page:

३०४ राजतरंगिणी सिंहलेषु नरेन्द्राह्रिमुद्राङ्कः क्रियते पटः । इति कञ्चुकिना पृष्टेनोक्तो यात्रामरात्ततः ॥ २६५ ॥ २६५. जिज्ञासा पर कंचुकी ने बताया 'सिंहल में बने वस्त्र पर राजा का पद चिन्ह अंकित किया जाता है।'— राजा ने अभियान का आदेश दिया। तत्सेनाकुम्भिदानाम्भोनिस्सङ्गाकृतसंगमः । यमुनालिङ्गनप्रीतिं प्रपेदे दक्षिणार्णवः ॥ २६६ ॥ २६६. उसकी सेना के गजों के गण्डस्थल से उद्भूत मद धार मिलन से दक्षिण समुद्र ने यमुना' मिलन सुख का अनुभव किया।


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

मस्तक श्रीपाद का नमस्कार करती है। उस पर्वत पर जहाँ पदचिन्ह है, मनुष्यसंकुल होने पर भी स्थान हो जाता है। जब एकत्रित मनुष्य पूजा कर निकलते हैं तो उस पवित्र चरण चिन्ह को मेघ धो डालते हैं।' प्रामाणिक रूप से यह मान्यता है कि श्रीपाद ५ फिट लम्बा है। वह स्पष्ट नहीं है। केवल लम्बा गड्ढा मालूम पड़ता है। राजा निःशंक मल्ल ( सन् ११९३-१२०७ ) श्रीपाद को एक बड़े शिला खण्ड से ढकवा दिया था। ढके पत्थर पर नवीन चिन्ह मूल के समान बनवा दिया गया। स्थान छाया हुआ है। समीप ही पुष्पासन है। वहाँ पूजा निमित्त पुष्पांजलि दी जाती है। श्रीपाद इस समय सिमेण्ट की रेलिंग से घेर दिया गया है। वह स्थान समुद्र तट से ६५ मील दूर है। नव मिल दूर से ७३६४ फिट की ऊँची चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। मार्ग घने वन श्री से होकर जाता है। मार्ग में धर्मशालाएँ बनी हैं। छः मिल तक मूल शिखर दिखाई नहीं पड़ता। तीन मिलकी चढ़ाई शेष रह जाने पर श्रीपाद शिखर का दर्शन होता है। तत्पश्चात् सीधी चढ़ाई पड़ती है। पहाड़ काट कर सीढ़ियाँ बनायी गयी हैं। सीढ़ियों के पश्चात् जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है। जंजीरों तक पहुँचने के पूर्व यात्री को खूब समझा दिया जाता है कि वह नीचे की ओर न देखे। नीचे देखने पर भयंकर खाई मालूम पड़ती है। मस्तक घूमने लगता है। किंचित् मात्र पैर फिसलने पर शरीर का पता


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

नहीं चलेगा : सब कुछ चकनाचूर हो जायगा। इसके पश्चात् ४० फिट ऊँची लोहे की सीढ़ी है। इसके पश्चात् श्रीपाद का चबूतरा मिलता है। मैं श्री लंका की यात्रा दो बार कर चुका हूँ। मेरा निश्चित मत है कि कल्हण वर्णित पाद हेमांकित चिन्ह इस श्रीपाद का प्रतीक था जो कंचुकी पर इस प्रकार बनाया जाता था कि वह हृदय स्थल पर भगवान् का पद स्पर्श करता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २६५ में 'नोक्तो' का 'नोक्ता' तथा 'मदात्ततः' का 'मधात्ततः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २९५ ( १ ) कंचुकी : इसका शाब्दिक अर्थ चोली, अंगिया स्त्री लिंग रूप में तथा पुंलिंग रूप में अन्तःपुर रक्षक, द्वारपाल, रनिवास में दास दासियों का अध्यक्ष माना गया है। अन्तःपुर के राज्य अधिकारियों में इसका बड़ा महत्त्व रहा है। संस्कृत नाटकों में यह पात्र विशेष रूप से चित्रित किया गया है। राजाओं के गार्हस्थ्य जीवन के स्वरूप को प्रकट करता है। २९६ ( १ ) यमुना : गंगा-यमुना का प्रायः एक साथ वर्णन मिलता है। गंगा का जल उज्ज्वल तथा यमुना का नीला माना गया है। और है भी। इसका स्पष्ट दर्शन प्रयाग संगम पर मिलता है। जहाँ यमुना तथा गंगा का जल आकर मिलता है। यहाँ

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास) · पृष्ठ 413, कुल 984 में से · BharatKosha