भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

प्रथम तरंग ३०३


[बायाँ स्तम्भ]

में बहुत लम्बा और छोटा दिखाई देता है। यह सब वास्तविक इतिहास पर दूसरा रंग चढ़ाने के लिए किया गया है।

यह तथ्य है कि सिकन्दर कभी लंका में पैर भी नहीं रखा था। वह ईसा पूर्व ३२७ वर्ष में भारत आया और सिन्ध के मार्ग से अपने देश की ओर लौट गया और मार्ग में ही उसका देहावसान सूसा में हो गया। हजरत खिज्र का पैगम्बर मुहम्मद के बहुत बाद का है। पैगम्बर साहब का जन्म ही सन् ५७० ई० में हुआ था।

श्रीपाद पर्वत का अस्तित्व हजरत शिख्र के जन्म से हजारों वर्ष पूर्व था। बौद्ध धर्म अशोक के काल अर्थात् ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में पहुँच चुका था। देश बौद्ध हो चुका था।

श्रीपाद श्री लंका का श्रेष्ठ पूजनीय स्थान था। श्रीपाद धर्म चिन्ह था। सिंहल के हेमांकित पाद-चिन्ह वस्त्र का वही अर्थ था कि वह वस्त्र जहां जाता था वह भगवान् बुद्ध के पद चिन्ह के कारण रामनामी वस्त्र के समान पवित्र तथा श्रेष्ठ माना जाता था। पाद चिन्ह का इतना महत्त्व था कि उसे विश्व में चार स्थानों में बौद्धों ने माना है। जहाँ भगवान् बुद्ध ने अपना पद रखा था। यद्यपि यह भी सत्य है कि भगवान् बुद्ध अपने भौतिक जीवन काल में मध्य देश से कभी बाहर नहीं गये। श्री लंका तो भारत के बाहर था। पाद चिन्ह के विषय में कहा गया है। एक पाद चिन्ह नर्मदा के तट पर था। दूसरा सत्य, वध्य पर्वत की चोटी पर था। तीसरा श्रीलंका में कूट पर था। चौथा यवन देश में था। बुद्ध जगत् निम्नलिखित पद पढ़कर चरण चिन्ह की वन्दना करता है।

यं नम्मदाय नदिया पुलिने च तीरे यं सच्चयद्धगिरिके सुमनां च लग्गे। यं तथ्य यौनक पुरे सुनिनीं च पादं, तं पाद लच्छनमहं सिरसा नमामि ॥


[दायाँ स्तम्भ]

सुमन कूट पर श्रीपाद है। पवनपुर में चौथे श्रीपाद का होना कहा गया है। मैंने बहुत वृद्ध भिक्षुओं से पूछा। उनका कहना है कि चौथा पाद मक्का में था। काबा जिसे बुतखान कहा गया है वह वास्तव में बुद्ध स्थान था। वहाँ सैकड़ो से ऊपर मूर्तियां थी। बुत शब्द बुद्ध का अपभ्रंश है। यह अब प्रमाणित हो चुका है कि बुद्ध शब्द का बुत अपभ्रंश है। काबा में ३०० से ऊपर मूर्तियाँ थी। सबकी पूजा होती थी। इस विवाद में न पड़ कर यही कहना अलम् होगा कि मिहिरकुल के समय तक बौद्धधर्म भारत तथा बाहर था। श्रीपाद का हेम पादांकित रूप पूज्य था। क्योकि उस समय बुद्ध प्रतिमा की पूजा प्रचलित नही थी।

सुमनकूट पहुँचने के लिये हेटन पहुंचना चाहिए। हेटन से मसकेलिय जाना पड़ता है। वहाँ से ११ मील दूर पड़ता है। मसकेलिय से श्रीपाद पर्वत दिखाई पड़ता है। शिखर पर पहुंचने पर चट्टान काटकर सीढ़ियाँ बनायी गयी है। जंजीर तथा धड़ पकड़कर श्रीपाद तक पहुँचते हैं।

श्रीपाद के समीप सुमन देव का मन्दिर है। यह स्थान समुद्र की सतह से ७३६० फिट ऊंचाई पर है। भगवान् सुमन देव की प्रार्थना पर तीसरी बार लंका आये थे।, सुमन कुटी पर उनका आगमन हुआ। यहाँ पर वैशाख पूर्णिमा के दिन अपराह्न काल में अपने वाम पद का चिन्ह अंकित किया था। (सुमन्त कूट वर्णना ७७९) इस पाद की महिमा में सुमन्त कूट वर्णना में कहा गया है—'ऐसे द्वेष रिपुरहित मनुष्यों के हित-साधक उस धर्मराज ने लंका की लक्ष्मी के रम्य सुमनगिरि पर जिस-जिस चरण चिन्ह को दिया वह चित्त मात्र के प्रसन्न होने से तुम्हे बुद्ध के समान स्वर्गापवर्ग देगा। अतएव हे लोगो ! प्रसन्न मन होकर सज्जनो से प्रशंसित उसे नमन करो। उसकी पूजा करो।'

उसकी महत्ता का वर्णन उसी ग्रन्थ में और किया गया है —वहाँ सर्वदा वृक्ष एवं लताएं नत