भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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३०२ राजतरंगिणी

में सिंहलराज के अतिरिक्त और किस का पद हो सकता है। इस विचार से अनायास सिंहलराज का हेमांकित पद कह दिया । राजा मिहिरकुल के उग्र स्वभाव को देखकर किसी को प्रतिवाद करने का साहस न हुआ होगा । सिंहल का प्राचीन नाम श्री लंका तथा अर्वा- चीन नाम सिलोन है। अरबो ने इसका नाम 'सैलान' रखा था। अंग्रेजों ने उसी सैलान नाम के आधार पर इसे सीलोन कहना आरम्भ किया और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में यही नाम प्रचलित हो गया । सिंहल में रावण की ख्याति एक वैद्य तथा विद्वान् के रूप में है। विभीषण की मान्यता देवता तुल्य है। श्रीलंका में अशोक वाटिका आज भी है। उसकी पुरानी राजधानी का नाम 'सीता यक' है। विजय सिंह गुजरात से श्री लंका गये थे। अतएव उनके नाम पर सिंहल नाम पड़ने की एक गाथा है।' प्राचीन समय में भगवान् बुद्ध की प्रतिम' नही बनती थी। उनके श्रीपद ही की पूजा होती थी। यह पद सीधा है। साधारण मनुष्यों का पद किंचित् घुमा हुआ रहता है। पद चिन्ह में महापुरुषों के लक्षण है। श्री लंका में प्राचीन भित्तिचित्रों मे कंचुकी के स्थान पर गोलाकार वृत्त बने दिखाये गये हैं। यह वृत्ताकार चिन्ह बौद्ध जगत् का तथा धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रतीक है। सम्भव है। भगवान् का चरण हृदय देश पर स्थित रहे अतएव हेम पादांकित चिन्ह वक्षस्थल पर कंचुकी में बनाया जाता रहा होगा। हेम शब्द यहाँ महत्त्व रखता है। क्योकि भगवान् का वर्ण स्वर्ण अर्थात् हेम तुल्य था। कश्मीर के इतिहास तथा उसके स्थानों पर जिस प्रकार मुसलमानो धार्मिक रंग चढाने का प्रयास किया गया है उसी प्रकार श्रीपाद पर्वत पर भी हिन्दू तथा बौद्ध परम्पराओ पर परदा डाल कर उसे मुस्लिम धार्मिक सांचा में ढालने का प्रयास किया गया है। श्रीशंकराचार्य पर्वत का नाम जिस प्रकार कश्मीर में तख्ते सुलेमान दे दिया गया है। वही प्रक्रिया श्री लंका में श्रीपाद पर्वत के साथ हुई। उसका नाम बाबा आदम की चोटी तथा पोह का नाम 'सोह खिज्र' रख दिया है। श्रीपाद पर पहुँचने वाले रास्तो का कुल नाम बदल कर एक मार्ग को 'बाबा आदम' तथा दूसरा 'मामा' (होवा) नाम रख दिया गया है। श्रीपाद तक पहुँचने के लिए श्री लंका के राजाओ ने लोहे की सिकड़ी अथवा जंजीरें लगवा दी थी। यात्री उन्हें पकड़कर श्रीपाद तक पहुँचता है। उसे सिकन्दर का लगवाया प्रसिद्ध किया गया । प्रसिद्ध ईरानी कवि अशरफ ने अपने ग्रन्थ सिकन्दरनामा में लिखा है कि सिकन्दर जब लंका पहुँचा तो जंजीरो को आदम के कदम तक पहुँचने के लिए लगवा दिया था । इब्नबतूता एक कदम और आगे बढ़ जाता है। वह कहता है द्वार सिकन्दर का निर्माण कराया हुआ है। यहाँ पर लाल गुलाब का फूल हथेली भर का होता है। उस पर 'अल्लाह और 'मुहम्मद' का नाम प्रकृति ने स्वयं लिख दिया है। जंजीर का भी नामकरण कर दिया गया है। दसवी जंजीर को जंजीरे शहादत की संज्ञा दे दी गयी है। दसवी जंजीर से सोह खिज्र तक की दूरी दस मील है। उसमें एक स्रोत है। उस स्रोत को हज़रत खिज्र से सम्बन्धित कर दिया गया है। जंजीर शहादत पकड़ने पर 'कलम शहादत' पढ़ने की हिदायत की गयी है। इब्नबतूता ने चरण चिन्ह का परिमाण ग्यारह बालिश्त और सुलेमान सौदागर ने सत्तर हाथ लम्बा बताया है। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है कि मन की भावना के अनुसार वह किसी को बालिश्तों में और किसी को हाथो