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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

३०२ राजतरंगिणी

में सिंहलराज के अतिरिक्त और किस का पद हो सकता है। इस विचार से अनायास सिंहलराज का हेमांकित पद कह दिया । राजा मिहिरकुल के उग्र स्वभाव को देखकर किसी को प्रतिवाद करने का साहस न हुआ होगा । सिंहल का प्राचीन नाम श्री लंका तथा अर्वा- चीन नाम सिलोन है। अरबो ने इसका नाम 'सैलान' रखा था। अंग्रेजों ने उसी सैलान नाम के आधार पर इसे सीलोन कहना आरम्भ किया और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में यही नाम प्रचलित हो गया । सिंहल में रावण की ख्याति एक वैद्य तथा विद्वान् के रूप में है। विभीषण की मान्यता देवता तुल्य है। श्रीलंका में अशोक वाटिका आज भी है। उसकी पुरानी राजधानी का नाम 'सीता यक' है। विजय सिंह गुजरात से श्री लंका गये थे। अतएव उनके नाम पर सिंहल नाम पड़ने की एक गाथा है।' प्राचीन समय में भगवान् बुद्ध की प्रतिम' नही बनती थी। उनके श्रीपद ही की पूजा होती थी। यह पद सीधा है। साधारण मनुष्यों का पद किंचित् घुमा हुआ रहता है। पद चिन्ह में महापुरुषों के लक्षण है। श्री लंका में प्राचीन भित्तिचित्रों मे कंचुकी के स्थान पर गोलाकार वृत्त बने दिखाये गये हैं। यह वृत्ताकार चिन्ह बौद्ध जगत् का तथा धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रतीक है। सम्भव है। भगवान् का चरण हृदय देश पर स्थित रहे अतएव हेम पादांकित चिन्ह वक्षस्थल पर कंचुकी में बनाया जाता रहा होगा। हेम शब्द यहाँ महत्त्व रखता है। क्योकि भगवान् का वर्ण स्वर्ण अर्थात् हेम तुल्य था। कश्मीर के इतिहास तथा उसके स्थानों पर जिस प्रकार मुसलमानो धार्मिक रंग चढाने का प्रयास किया गया है उसी प्रकार श्रीपाद पर्वत पर भी हिन्दू तथा बौद्ध परम्पराओ पर परदा डाल कर उसे मुस्लिम धार्मिक सांचा में ढालने का प्रयास किया गया है। श्रीशंकराचार्य पर्वत का नाम जिस प्रकार कश्मीर में तख्ते सुलेमान दे दिया गया है। वही प्रक्रिया श्री लंका में श्रीपाद पर्वत के साथ हुई। उसका नाम बाबा आदम की चोटी तथा पोह का नाम 'सोह खिज्र' रख दिया है। श्रीपाद पर पहुँचने वाले रास्तो का कुल नाम बदल कर एक मार्ग को 'बाबा आदम' तथा दूसरा 'मामा' (होवा) नाम रख दिया गया है। श्रीपाद तक पहुँचने के लिए श्री लंका के राजाओ ने लोहे की सिकड़ी अथवा जंजीरें लगवा दी थी। यात्री उन्हें पकड़कर श्रीपाद तक पहुँचता है। उसे सिकन्दर का लगवाया प्रसिद्ध किया गया । प्रसिद्ध ईरानी कवि अशरफ ने अपने ग्रन्थ सिकन्दरनामा में लिखा है कि सिकन्दर जब लंका पहुँचा तो जंजीरो को आदम के कदम तक पहुँचने के लिए लगवा दिया था । इब्नबतूता एक कदम और आगे बढ़ जाता है। वह कहता है द्वार सिकन्दर का निर्माण कराया हुआ है। यहाँ पर लाल गुलाब का फूल हथेली भर का होता है। उस पर 'अल्लाह और 'मुहम्मद' का नाम प्रकृति ने स्वयं लिख दिया है। जंजीर का भी नामकरण कर दिया गया है। दसवी जंजीर को जंजीरे शहादत की संज्ञा दे दी गयी है। दसवी जंजीर से सोह खिज्र तक की दूरी दस मील है। उसमें एक स्रोत है। उस स्रोत को हज़रत खिज्र से सम्बन्धित कर दिया गया है। जंजीर शहादत पकड़ने पर 'कलम शहादत' पढ़ने की हिदायत की गयी है। इब्नबतूता ने चरण चिन्ह का परिमाण ग्यारह बालिश्त और सुलेमान सौदागर ने सत्तर हाथ लम्बा बताया है। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है कि मन की भावना के अनुसार वह किसी को बालिश्तों में और किसी को हाथो

प्रथम तरंग ३०३


[बायाँ स्तम्भ]

में बहुत लम्बा और छोटा दिखाई देता है। यह सब वास्तविक इतिहास पर दूसरा रंग चढ़ाने के लिए किया गया है।

यह तथ्य है कि सिकन्दर कभी लंका में पैर भी नहीं रखा था। वह ईसा पूर्व ३२७ वर्ष में भारत आया और सिन्ध के मार्ग से अपने देश की ओर लौट गया और मार्ग में ही उसका देहावसान सूसा में हो गया। हजरत खिज्र का पैगम्बर मुहम्मद के बहुत बाद का है। पैगम्बर साहब का जन्म ही सन् ५७० ई० में हुआ था।

श्रीपाद पर्वत का अस्तित्व हजरत शिख्र के जन्म से हजारों वर्ष पूर्व था। बौद्ध धर्म अशोक के काल अर्थात् ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में पहुँच चुका था। देश बौद्ध हो चुका था।

श्रीपाद श्री लंका का श्रेष्ठ पूजनीय स्थान था। श्रीपाद धर्म चिन्ह था। सिंहल के हेमांकित पाद-चिन्ह वस्त्र का वही अर्थ था कि वह वस्त्र जहां जाता था वह भगवान् बुद्ध के पद चिन्ह के कारण रामनामी वस्त्र के समान पवित्र तथा श्रेष्ठ माना जाता था। पाद चिन्ह का इतना महत्त्व था कि उसे विश्व में चार स्थानों में बौद्धों ने माना है। जहाँ भगवान् बुद्ध ने अपना पद रखा था। यद्यपि यह भी सत्य है कि भगवान् बुद्ध अपने भौतिक जीवन काल में मध्य देश से कभी बाहर नहीं गये। श्री लंका तो भारत के बाहर था। पाद चिन्ह के विषय में कहा गया है। एक पाद चिन्ह नर्मदा के तट पर था। दूसरा सत्य, वध्य पर्वत की चोटी पर था। तीसरा श्रीलंका में कूट पर था। चौथा यवन देश में था। बुद्ध जगत् निम्नलिखित पद पढ़कर चरण चिन्ह की वन्दना करता है।

यं नम्मदाय नदिया पुलिने च तीरे यं सच्चयद्धगिरिके सुमनां च लग्गे। यं तथ्य यौनक पुरे सुनिनीं च पादं, तं पाद लच्छनमहं सिरसा नमामि ॥


[दायाँ स्तम्भ]

सुमन कूट पर श्रीपाद है। पवनपुर में चौथे श्रीपाद का होना कहा गया है। मैंने बहुत वृद्ध भिक्षुओं से पूछा। उनका कहना है कि चौथा पाद मक्का में था। काबा जिसे बुतखान कहा गया है वह वास्तव में बुद्ध स्थान था। वहाँ सैकड़ो से ऊपर मूर्तियां थी। बुत शब्द बुद्ध का अपभ्रंश है। यह अब प्रमाणित हो चुका है कि बुद्ध शब्द का बुत अपभ्रंश है। काबा में ३०० से ऊपर मूर्तियाँ थी। सबकी पूजा होती थी। इस विवाद में न पड़ कर यही कहना अलम् होगा कि मिहिरकुल के समय तक बौद्धधर्म भारत तथा बाहर था। श्रीपाद का हेम पादांकित रूप पूज्य था। क्योकि उस समय बुद्ध प्रतिमा की पूजा प्रचलित नही थी।

सुमनकूट पहुँचने के लिये हेटन पहुंचना चाहिए। हेटन से मसकेलिय जाना पड़ता है। वहाँ से ११ मील दूर पड़ता है। मसकेलिय से श्रीपाद पर्वत दिखाई पड़ता है। शिखर पर पहुंचने पर चट्टान काटकर सीढ़ियाँ बनायी गयी है। जंजीर तथा धड़ पकड़कर श्रीपाद तक पहुँचते हैं।

श्रीपाद के समीप सुमन देव का मन्दिर है। यह स्थान समुद्र की सतह से ७३६० फिट ऊंचाई पर है। भगवान् सुमन देव की प्रार्थना पर तीसरी बार लंका आये थे।, सुमन कुटी पर उनका आगमन हुआ। यहाँ पर वैशाख पूर्णिमा के दिन अपराह्न काल में अपने वाम पद का चिन्ह अंकित किया था। (सुमन्त कूट वर्णना ७७९) इस पाद की महिमा में सुमन्त कूट वर्णना में कहा गया है—'ऐसे द्वेष रिपुरहित मनुष्यों के हित-साधक उस धर्मराज ने लंका की लक्ष्मी के रम्य सुमनगिरि पर जिस-जिस चरण चिन्ह को दिया वह चित्त मात्र के प्रसन्न होने से तुम्हे बुद्ध के समान स्वर्गापवर्ग देगा। अतएव हे लोगो ! प्रसन्न मन होकर सज्जनो से प्रशंसित उसे नमन करो। उसकी पूजा करो।'

उसकी महत्ता का वर्णन उसी ग्रन्थ में और किया गया है —वहाँ सर्वदा वृक्ष एवं लताएं नत

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३०४ राजतरंगिणी सिंहलेषु नरेन्द्राह्रिमुद्राङ्कः क्रियते पटः । इति कञ्चुकिना पृष्टेनोक्तो यात्रामरात्ततः ॥ २६५ ॥ २६५. जिज्ञासा पर कंचुकी ने बताया 'सिंहल में बने वस्त्र पर राजा का पद चिन्ह अंकित किया जाता है।'— राजा ने अभियान का आदेश दिया। तत्सेनाकुम्भिदानाम्भोनिस्सङ्गाकृतसंगमः । यमुनालिङ्गनप्रीतिं प्रपेदे दक्षिणार्णवः ॥ २६६ ॥ २६६. उसकी सेना के गजों के गण्डस्थल से उद्भूत मद धार मिलन से दक्षिण समुद्र ने यमुना' मिलन सुख का अनुभव किया।


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

मस्तक श्रीपाद का नमस्कार करती है। उस पर्वत पर जहाँ पदचिन्ह है, मनुष्यसंकुल होने पर भी स्थान हो जाता है। जब एकत्रित मनुष्य पूजा कर निकलते हैं तो उस पवित्र चरण चिन्ह को मेघ धो डालते हैं।' प्रामाणिक रूप से यह मान्यता है कि श्रीपाद ५ फिट लम्बा है। वह स्पष्ट नहीं है। केवल लम्बा गड्ढा मालूम पड़ता है। राजा निःशंक मल्ल ( सन् ११९३-१२०७ ) श्रीपाद को एक बड़े शिला खण्ड से ढकवा दिया था। ढके पत्थर पर नवीन चिन्ह मूल के समान बनवा दिया गया। स्थान छाया हुआ है। समीप ही पुष्पासन है। वहाँ पूजा निमित्त पुष्पांजलि दी जाती है। श्रीपाद इस समय सिमेण्ट की रेलिंग से घेर दिया गया है। वह स्थान समुद्र तट से ६५ मील दूर है। नव मिल दूर से ७३६४ फिट की ऊँची चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। मार्ग घने वन श्री से होकर जाता है। मार्ग में धर्मशालाएँ बनी हैं। छः मिल तक मूल शिखर दिखाई नहीं पड़ता। तीन मिलकी चढ़ाई शेष रह जाने पर श्रीपाद शिखर का दर्शन होता है। तत्पश्चात् सीधी चढ़ाई पड़ती है। पहाड़ काट कर सीढ़ियाँ बनायी गयी हैं। सीढ़ियों के पश्चात् जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है। जंजीरों तक पहुँचने के पूर्व यात्री को खूब समझा दिया जाता है कि वह नीचे की ओर न देखे। नीचे देखने पर भयंकर खाई मालूम पड़ती है। मस्तक घूमने लगता है। किंचित् मात्र पैर फिसलने पर शरीर का पता


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

नहीं चलेगा : सब कुछ चकनाचूर हो जायगा। इसके पश्चात् ४० फिट ऊँची लोहे की सीढ़ी है। इसके पश्चात् श्रीपाद का चबूतरा मिलता है। मैं श्री लंका की यात्रा दो बार कर चुका हूँ। मेरा निश्चित मत है कि कल्हण वर्णित पाद हेमांकित चिन्ह इस श्रीपाद का प्रतीक था जो कंचुकी पर इस प्रकार बनाया जाता था कि वह हृदय स्थल पर भगवान् का पद स्पर्श करता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २६५ में 'नोक्तो' का 'नोक्ता' तथा 'मदात्ततः' का 'मधात्ततः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २९५ ( १ ) कंचुकी : इसका शाब्दिक अर्थ चोली, अंगिया स्त्री लिंग रूप में तथा पुंलिंग रूप में अन्तःपुर रक्षक, द्वारपाल, रनिवास में दास दासियों का अध्यक्ष माना गया है। अन्तःपुर के राज्य अधिकारियों में इसका बड़ा महत्त्व रहा है। संस्कृत नाटकों में यह पात्र विशेष रूप से चित्रित किया गया है। राजाओं के गार्हस्थ्य जीवन के स्वरूप को प्रकट करता है। २९६ ( १ ) यमुना : गंगा-यमुना का प्रायः एक साथ वर्णन मिलता है। गंगा का जल उज्ज्वल तथा यमुना का नीला माना गया है। और है भी। इसका स्पष्ट दर्शन प्रयाग संगम पर मिलता है। जहाँ यमुना तथा गंगा का जल आकर मिलता है। यहाँ

प्रथम तरंग ३०५ दोनों जलों में भिन्नता प्रकट होती है। संगम के पश्चात् काशी पहुँचने पर गंगा जल उतना उज्ज्वल नहीं रह जाता, जितना हरद्वार तथा प्रयाग में दिखाई देता है। हरद्वार से प्रयाग तक गंगा की धारा में तेजी रहती है। प्रयाग के पश्चात् वेग का लोप हो जाता है। स्थिरता आती है। हिमालय से गंगा तथा यमुना दोनों नदियाँ निकलती हैं। दोनों का जल सदृश होना चाहिए। परन्तु भिन्नता दिखाई पड़ती है। इस पर कुछ प्रकाश डालना आवश्यक है। गंगा में हरद्वार से प्रयाग तक मिलने वाली सब नदियों का स्रोत हिमालय है। सब हिमालय का जल लाकर गंगा में डालती हैं। अतएव गंगा का जल एक ही हिमालय एवं हिम गलने के कारण एक रूप रहता है। यमुना के साथ ठीक उलटी बात होती है। यमुना में मिलने वाली सब नदियाँ विन्ध्याचल, अरावली आदि से निकलती हैं। दक्षिण दिशा किंवा दक्षिण पथ से आकर यमुना में मिलती हैं। वे मैदानी क्षेत्र तथा विन्ध्य के उज्ज्वल वर्ण हीन पत्थरों का टकराया हुआ जल यमुना में लाती हैं। यमुना का जल हिमानी, हिम गलन उसके स्रोत के पश्चात् पुनः उसमें नहीं आता। किन्तु गंगा का जल हिमालय पर्वत के पत्थरों से, जो अपेक्षाकृत विन्ध्य के पत्थरों से अधिक उज्ज्वल हैं, टकराता बलुई भूमि से बहता आता है। वह अपनी उज्ज्वलता स्थिर रखता है। यमुना में आनेवाला जल दक्षिण की नदियों का जल है। ये नदियाँ बलुई भूमि से न होकर कुछ काली मिट्टी से बहती आती हैं। वह मिट्टी लसदार होती है। वह उत्तर प्रदेश के गंगा और हिमालय के मध्य भागोय क्षेत्र की मिट्टी की तरह भूरी तथा बलुआ नहीं है। स्पर्शस्पर्श एवं भौगोलिक स्थिति के कारण जल के रूप में परिवर्तन हो जाता है। जैसे एक ही पिता के दो पुत्र एक ही वर्ण एवं रूप के होते हुए भी यदि एक रूस में तथा दूसरा कांगो अथवा मद्रास में निवास करे तो कुछ समयपश्चात् दोनों के वर्ण में अन्तर पड़ जायगा। एक अधिक शीत के कारण गोरा ही रहेगा। दूसरा अल्पाधिक गरमी के कारण झाँवर होता जायगा। यही बात गंगा तथा यमुना के जलों के विषय में कही जा सकती है। सिंहल (श्रीलंका) तथा भारत अर्थात् रामेश्वर के बीच मनार की खाड़ी है। दोनों के मध्य पतला समुद्र भाग है जो भारत तथा सिंहल को अलग करता है। भगवान् रामचन्द्र ने पम्बन के पास सेतु बाँधा था। रामेश्वर का मन्दिर तथा स्थान पम्बन सेतु पार कर जाना पड़ता है। पम्बन से धनुषकोटि तथा रामेश्वर दो तरफ रेलवे लाइन गयी हैं। धनुषकोटि तथा रामेश्वर एक द्वीप पर हैं। धनुषकोटि से आज भी जहाज तथा नावें श्री लंका को जाती हैं। सन् १९६४-१९६७ ई० भारतीय नौपरिवहन मण्डल के अध्यक्ष होने के कारण मैं यहाँ कई बार आ चुका हूँ। सेतुम् समुद्र एक विशाल योजना है। उसके द्वारा बड़े जहाजों को भारतीय समुद्र में होकर आवागमन के लिये नहर बनाने की योजना है। इस समय जहाज भारत के पश्चिमी तट से पूर्वीय तट पर आने के लिये श्री लंका की परिक्रमा करते हैं। इस योजना के बनने पर ये सीधे भारतीय क्षेत्रीय जल सीमा के अन्दर ही पूर्व से पश्चिम तथा पश्चिमी से पूर्वीय तट पर पहुँच जायेंगे। लगभग ४०० मील की लम्बी यात्रा बच जायगी। उस समय मैंने यहाँ की भौगोलिक स्थिति आदि का विशेष अध्ययन किया। निस्सन्देह मिहिर- कुल धनुषकोटि अंचल पर अपना शिविर लगाया होगा। यहीं से सबसे संकीर्ण समुद्र पार करने का मार्ग हैं। समुद्र का जल यदि शीशे के गिलास में रख दिया जाय तो वह उतना नीला नहीं लगेगा। जल को गहराई, समुद्र अथवा नदी में जल का बाहरी १९

३०६. राजतरंगिणी: स सिंहलेन्द्रेण समं संरम्भादुदपाटयत् । चिरेण चरणस्पृष्टप्रियालोकनरूजां रुषम् ॥ २९७ ॥ २९७. उसने सिंहल नरेश को पदाक्रान्त करने तथा हेम पादांकित प्रिया के कंचुकी द्वारा उद्भूत क्रोध को शान्त किया । दूरात्तत्सैन्यमालोक्य लङ्कासौधैर्निशाचराः । भूयोऽपि राघवोद्योगमाशङ्क्य प्रचकाम्परे ॥ २९८ ॥ २९८. जब लंका के सौधों से निशाचरों ने उसकी सेना का दूर से ही अवलोकन किया, तो 'राघव' के आक्रमण की पुनः आशंका हुई ।

रूप तथा वर्ण बनाती है । हवाई जहाज में यात्रा करने पर यह बात स्पष्ट दिखायी पड़ती है । तट- वर्ती समुद्र का पानी भूरा तथा गदला लगेगा । तट से जितना ही दूर जाय, उतना ही जल का रंग गाढा नीला हो जायेगा । समुद्र में जहाँ नदियां आकर मिलती हैं वहां दो तीन मील तक का जल गदला रहता है । गंगा सागर के पास यह बड़ी अच्छी तरह दिखाई देता है । प्रशान्त, अटलांटिक महासागर, तथा भूमध्य महासागर का जल अत्यन्त नीला मिलेगा । इसी प्रकार बंगाल की खाड़ी के मध्य पहुँचने पर भी जल की नीलिमा बढ़ जाती है । तटवर्तीय जल होने के कारण समुद्री जल का वर्णन नीलजा यमुना के जल के समीप रंग रूप में पहुँच जाता है । कल्हण ने बड़ी ही उत्तम उपमा यहां दी है । नील समुद्र में नीलजा का जल मिलना प्रिय तथा प्रिय के मिलन तुल्य है । नील जल युक्त समुद्र पुल्लिंग है और नील जल के साथ नीलजा अर्थात् यमुना स्त्रीलिंग है । नर-नारी का मिलन ही प्रेम है । वही काम की चरम सीमा है । निस्सन्देह कल्हण की उपमा की जितनी प्रशंसा की जाय वह थोड़ी मानी जायगी । पाठभेद : श्लोक संख्या २९७ में 'रुषम्' का पाठभेद 'दृशम्' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : २९७ (१) सिंहल आक्रमण : मुजम्मुल तुल तवारीख में लगभग इसी प्रकार का वर्णन दिया गया है । कश्मीर के एक राजा ने सिंघ पर आक्रमण किया था । कश्मीर के राजा का नाम नहीं दिया है । सिंघराज हाल ने मिहिरकुल को सन्धि करने के लिए बाध्य कर दिया था । (२) क्रोध : कल्हण यहां दोनों क्रोधों की शान्ति का उल्लेख करता है । प्रथम क्रोध हेम- पादांकित कंचुकी देखने के कारण उसमें उत्पन्न हुआ था । दूसरे क्रोध का उदय सिंहल आक्रमण काल में शत्रु को पराजित करने के लिए हुआ था । सिंहल विजय के कारण हेम पादांकित वस्त्र के स्थान पर यमुपदेव वस्त्र प्राप्त किया था । इस प्रकार उसके प्रथम क्रोध की शान्ति हुई । दूसरे क्रोध की शान्ति सिंहलराज को सिंहासन च्युत कर किया था । पाठभेद : श्लोक संख्या २९८ में 'सौधैर्न' का पाठ- भेद 'सौधान्नि' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २९८ (१) राघव : यहा पर राघव शब्द भग- वान् श्री रामचन्द्र जी के लिये आया है । श्री लंका पर ऐतिहासिक किंवा गाथा के आधार पर सर्व प्रथम श्री राम की सेना ने सफल आक्रमण कर विजय प्राप्त की थी ।

[पृष्ठ शीर्ष] प्रथम तरंग ३०७

[बायाँ स्तम्भ] कल्हण मिहिरकुल के लंका आक्रमण की तुलना भगवान् श्री राम के आक्रमण से करता है। लंका पति रावण से राम की सेना देखकर भयग्रस्त राक्षसों ने संवाद कहा था। अन्धकारमय भविष्य कहा था। राम की सेना से उत्पन्न भय कहा था। यही अवस्था मिहिरकुल की सेना देखकर राक्षसों की हुई थी। वे भयभीत हो गये थे। (२) सौध से सेना अवलोकन : लंका का जैसा सर्वनाश बन्दरो तथा राम की सेना द्वारा हुआ था। कहीं उसी की पुनरावृत्ति न हो जाय। इसे स्मरण कर लंका वासी आशंकित हो गये थे। लंका के सौधों अर्थात् प्रासादों से उन्होंने मिहिरकुल की सेना देखी। इसी प्रकार सेना देखने का वर्णन वाल्मीकि ने रामायण में किया है। 'लंका सौध से सेना अवलोकन क्या सम्भव था ?' प्रश्न उपस्थित होता है। क्या भारतीय तट पर पड़ी सेना लंका के सौधों से रामायण तथा मिहिरकुल काल में देखी जा सकती थी। मैं इसका यही उत्तर दे सकता हूँ कि यह सम्भव था। मण्डपम स्टेशन से रेलगाड़ी रामेश्वर द्वीप की ओर बढ़ती है तो बीच में सागर मिलता है। यह बंगाल की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी के जल को मिलाता है। जल डमरूमध्य है। इस पर लम्बा रेलवे का पुल बना है। रेल गाड़ी बहुत धीरे धीरे चलती है। समुद्र का जल जिस दिन भाटा के कारण नीचे आ जाता है तो लहरें नहीं उठतीं। जल स्थिर हो जाता है। यही समय है। जब निश्चय किया जा सकता है कि भारतीय भूखण्ड और पम्बन को जोड़ने के लिए कभी सेतु वहाँ बाँधा गया था या नही। ज्वार के समय जल बहुत ऊपर उठ जाता है। पम्बन के पुल के नीचे वेग से लहर उठती है। मैने यही समय इस स्थान को देखने का निश्चय किया। अपने साथ सिविल विभाग के एक इंजीनियर को भी ले लिया।

[दायाँ स्तम्भ] पहली वस्तु ध्यान आकर्षित करने वाली समुद्र तल में पड़ी विशाल चट्टानें हैं। दोनों भूखण्डो के मध्य विशाल शिलाखण्ड समुद्र तल में पड़े हैं यह केवल वहीं मिलते हैं। समीप पर्वत नही है। जहाँ से विशाल शिलाखण्ड लाया जा सके। यह शिला खण्ड इतने विशाल हैं कि उन्हें मानवी शक्ति द्वारा उठाना सम्भव नही हैं। उन्हें उठाने के लिये क्रेन अथवा कल्हण वर्णित यन्त्र की आवश्यकता पड़ सकती है। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है। नल तथा नील तत्कालीन अभियन्ताओं के निरीक्षण में सेतु बाँधा गया था। विशाल शिलाखण्ड बन्दर लाते थे और समुद्र में छोड़ते थे। यन्त्र का प्रयोग किया गया था। पम्बन पुल के मोचे के विशाल शिलाखण्ड और कश्मीर के भूतेश्वर, मार्तण्ड, परिहासपुरादि में लगे विशाल शिलाखण्डों को देखकर अनायास प्रश्न उठता है। उनका लाना कैसे मानवीय शक्ति के सामर्थ्य की बात हो सकती थी ? कल्हण इसका उत्तर देता है। कल्हण ने शिला- खण्डों को उठाने के लिए 'यन्त्र' शब्द का प्रयोग किया है। यह यन्त्र क्रेन थे। वह स्पष्ट उपमा देते हुए कहता है कि 'यन्त्र' से गिरे शिला तुल्य, अर्थात् यन्त्र शिला को क्रेन की तरह ऊपर उठाता था। वह किसी समय गिरती थी तो राज्यच्युत होते राजा के समान उसे रोकना कठिन था। यही बात क्रेन के सम्बन्ध में कही जायगी। क्रेन से गिरते सामान को किसी प्रकार भी रोका नहीं जा सकता। वह गिर कर ही रहेगा। रामायण ने इसका उत्तर बन्दरों की अलौकिक शक्ति का वर्णन कर दिया है। इससे प्रतीत होता है। प्राचीन काल में कश्मीर से रामेश्वरम् तक 'यन्त्र' अर्थात् क्रेन का शिलाओं के उठाने तथा निर्माण कार्य में प्रयोग किया जाता था। यद्यपि वे क्रेन

३०८ राजतरंगिणी आज के समान विद्युत भाप तथा मशीन परिचालित नही थे। प्रारम्भ मे क्रेन भी हाथ से ही चलते थे। कल्हण ने भी सेतु शब्द का उल्लेख शुद्ध सेतु के संदर्भ में किया है। भगवान् राम निर्मित सेतु ठोस था अथवा पावों पर बनाया गया था, स्वतः एक गवेषणा का विषय है। जैसा कि गूढ़ सेतु के सम्बन्ध में लिखा जा चुका है। विशेषज्ञों की यह धारणा पुष्ट हो गयी है कि सेतु सम्भवतः ठोस था। पाँवों पर नहीं बना था। मुझे एक रोमन कैथोलिक आयरिश इंजिनी- यर मिल गये। वे विश्व पर्यटन निमित्त निकले थे। उन्हें भी स्थान देखकर कौतूहल हुआ। चर्चा प्रसंग में उन्होंने कहा—'मैं रोमन कैथोलिक हूँ। बाइबिल में विश्वास करता हूँ। रामायण की चाहे जो गाथा हो। परन्तु मै इतना निश्चय रूप से कह सकता हूँ। यह विशाल शिलाखण्ड यहाँ बाहर से लाये गये थे। दोनो समुद्री तटों को सेतु से जोड़ने का प्रयास किया गया था।' (वाल्मीकि रामायण लंका काण्ड सर्ग २२ द्रष्टव्य है) मैं हिन्दू हूँ। अतएव राम तथा राम गाथा पर स्वभावतः विश्वास करता हूं। परन्तु अभियन्ताओं का यह मत स्थिर हो चला है। किसी समय यहा सेतु था। भारतीय भूखण्ड को रामेश्वर द्वीप से मिलाता था। वर्तमान सेतुबन्ध रामेश्वरम् मन्दिर का स्थान दो हजार वर्ष से पुराना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता । अतएव निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। रामायण वर्णित रामेश्वर की स्थापना किस स्थान पर की गयी थी। रामेश्वर शब्द से स्पष्ट है। राम ने रामेश्वर की स्थापना की थी। ईश्वर शब्द इस बात का द्योतक है कि शिव की स्थापना भगवान् राम ने की थी। उन्हों के नाम पर रामेश्वर शिवलिंग का नाम रखा गया। कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वत्र शिव मन्दिरों के लिए नाम के अन्त में ईश्वर या ईश तथा विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द का प्रयोग किया था। यह नामकरण पद्धति समस्त भारत मे प्रचलित हो गयी थी। सेतुबन्ध शब्द से प्रतीत होता है कि रामेश्वर का सेतुबन्ध ठोस था। इस सेतु को पार कर राम की सेना लंका के समीप पहुँच गयी थी। यदि धनुषकोटि के पास खड़ा हो कर देखा जाय तो दूसरी ओर श्रीलंका का तट स्थान धुंधला दृष्टिगोचर होगा। लंका और भारत के बीच वह सबसे संकीर्ण स्थान है। दोनो के मध्य छिछला जल है। उसमें कुछ द्वीपो की श्रृंखला मिलेगी जो लंका और भारत के बीच है इस छिछले पानी के कारण बंगाल की खाड़ी से अरब सागर जाने वाले जहाज सरल और नजदीक के मार्ग से न जा कर श्री लंका की परिक्रमा कर जाते हैं। इस संकीर्ण स्थान को आज कल की प्रचलित भाषा में 'आदमस् ब्रिज' कहते हैं। पूर्व काल मे रामेश्वरम् द्वीप से लंका तट स्थान भूखण्ड से मिला रहा होगा। मिहिरकुल की सेना सेतु किंवा नाव से श्री लंका पहुंची थी या कोई और उपाय निकाला था। इस विषय पर कल्हण शान्त है। रामायण का वर्णन अधिक पूर्ण तथा विस्तार से वस्तु स्थिति पर प्रकाश डालता है। कल्हण ने स्वयं श्री लंका किंवा रामेश्वर की यात्रा नहीं की थी। उसने पूर्व श्रुत अथवा किसी पूर्व कृति पर अपना वर्णन लिखा है। यदि वह रामेश्वरम् की यात्रा किया होता तो उसका वर्णन अधिक सारगर्भित, पूर्ण और समुद्री दृश्यों के बखान से भरा होता। कल्हण ने केवल 'राघव' की सेना से उपमा यहाँ दी है। श्री राम की सेना ने जहाँ शिविर डाला था वहाँ मिहिरकुल की सेना का शिविर पड़ना सम्भव तथा कठिन दोनो हो सकता है। इस स्थान की भौगोलिक स्थिति में आमूल परिवर्तन हो चुका है। साइक्लोन, रीण्ड डून तथा तूफानों से स्थान

प्रथमं तरंगं ३०६ [बायाँ स्तम्भ] आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में पम्बन सेतु वह गया था। अनेक मकानों की छतें साइक्लोनो में उड़ गयी थीं। भूमि कही समुद्र में धंस गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी। बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है। सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर- कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है। इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर दी थी। जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा कल्हण के वर्णन का मेल खाता है। समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिली। बलुई भूमि ही मिलती गयी। जल कही भी किंचित् मात्र खारा नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है। श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल- काय पड़े है। क्योंकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि के नीचे पत्थर नहीं मिलते। मैने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय [दायाँ स्तम्भ] सेतु समुद्रम् योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहें हैं। विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही मत है। किसी समय थी लंका तथा भारत में स्थल तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा। कालान्तर में हजारो वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र गर्भ मे चला गया है, अथवा टूटा फूटा 'आदम ब्रिजस' के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है। राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था। उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई। समुद्र दोनों तटो के मध्य इतना संकीर्ण है कि संका के सौधो अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर, सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और समझा जा सकता है। मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग ४,२०) द्रष्टव्य है। रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट दिया गया था। रामायण में कही ताखा अथवा खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल मे गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर लाये जाते थे। ते नगाम् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः । अभ्रम्वुः पादपांस्तत्र प्रचकंपुश्च सागरम् ॥ (रा० प्र० २२:५५।)

३०८ राजतरंगिणी

आज के समान विद्युत भाप तथा मशीन परिचालित नहीं थे । प्रारम्भ में क्रेन भी हाथ से ही चलते थे । कल्हण ने भी सेतु शब्द का उल्लेख गूढ़ सेतु के संदर्भ में किया है । भगवान् राम निर्मित सेतु ठोस था अथवा पाँवों पर बनाया गया था, स्वतः एक गवेषणा का विषय है। जैसा कि गूढ़ सेतु के सम्बन्ध में लिखा जा चुका है। विशेषज्ञों की यह धारणा पुष्ट हो गयी है कि सेतु सम्भवतः ठोस था । पाँवों पर नहीं बना था । मुझे एक रोमन कैथोलिक आयरिश इजीनी- यर मिल गये। वे विश्व पर्यटन निमित्त निकले थे । उन्हें भी स्थान देखकर कौतूहल हुआ । चर्चा प्रसंग में उन्होंने कहा—'मैं रोमन कैथोलिक हूँ । बाइबिल में विश्वास करता हूँ । रामायण की चाहे जो गाथा हो । परन्तु मैं इतना निश्चय रूप से कह सकता हूँ । यह विशाल शिलाखण्ड यहाँ बाहर से लाये गये थे । दोनों समुद्रों तटों को सेतु से जोड़ने का प्रयास किया गया था ।' (वाल्मीकि रामायण लंका काण्ड सर्ग २२ द्रष्टव्य है ) मैं हिन्दू हूँ । अतएव राम तथा राम गाथा पर स्वभावतः विश्वास करता हूँ। परन्तु अभियन्ताओं का यह मत स्थिर हो चला है । किसी समय यहाँ सेतु था । भारतीय भूखण्ड को रामेश्वर द्वीप से मिलाता था । वर्तमान सेतुबन्ध रामेश्वरम् मन्दिर का स्थान दो हजार वर्ष से पुराना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता । अतएव निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । रामायण वर्णित रामेश्वर की स्थापना किस स्थान पर की गयी थी । रामेश्वर शब्द से स्पष्ट है । राम ने रामेश्वर की स्थापना की थी । ईश्वर शब्द इस बात का द्योतक है कि शिव की स्थापना भगवान् राम ने की थी । उन्हीं के नाम पर रामेश्वर शिवालय का नाम रखा गया । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वत्र शिव मन्दिरों के लिए नाम के अन्त में ईश्वर या ईश तथा विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द का प्रयोग किया था। यह नामकरण पद्धति समस्त भारत में प्रचलित हो गयी थी । सेतुबन्ध शब्द से प्रतीत होता है कि रामेश्वर का सेतुबन्ध ठोस था । इस सेतु को पार कर राम की सेना लंका के समीप पहुँच गयी थी । यदि धनुषकोटि के पास खड़ा हो कर देखा जाय तो दूसरी ओर श्रीलंका का तट स्थान धुँधला दृष्टिगोचर होगा । लंका और भारत के बीच यह सबसे संकीर्ण स्थान है । दोनों के मध्य छिछला जल है । उसमें कुछ द्वीपों की श्रृंखला मिलेगी जो लंका और भारत के बीच है इस छिछले पानी के कारण बंगाल की खाड़ी से अरब सागर जाने वाले जहाज सरल और नजदीक के मार्ग से न जा कर श्री लंका की परिक्रमा कर जाते हैं। इस संकीर्ण स्थान को आज कल की प्रचलित भाषा में 'आदम्स ब्रिज' कहते हैं । पूर्व काल में रामेश्वरम् द्वीप से लंका तट स्थान भूखण्ड से मिला रहा होगा । मिहिरकुल की सेना सेतु किंवा नाव से श्री लंका पहुँची थी या कोई और उपाय निकाला था । इस विषय पर कल्हण शान्त हैं। रामायण का वर्णन अधिक पूर्ण तथा विस्तार से वस्तु स्थिति पर प्रकाश डालता है । कल्हण ने स्वयं श्री लंका किंवा रामेश्वर की यात्रा नहीं की थी। उसने पूर्व श्रुत अथवा किसी पूर्व कृति पर अपना वर्णन लिखा है । यदि वह रामेश्वरम् की यात्रा किया होता तो उसका वर्णन अधिक सारगर्भित, पूर्ण और समुद्री दृश्यों के वर्णन से भरा होता । कल्हण ने केवल 'राघव' की सेना से उपमा यहाँ दी है । श्री राम की सेना ने जहाँ शिविर डाला था वहाँ मिहिरकुल की सेना का शिविर पड़ना सम्भव तथा कठिन दोनो हो सकता है । इस स्थान की भौगोलिक स्थिति में आमूल परिवर्तन हो चुका है । साइक्लोन, सैण्ड डून तथा तूफानों से स्थान

प्रथम तरंग ३०९ आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में पम्बन सेतु बह गया था। अनेक मकानों की छतें साइक्लोनों में उड़ गयी थीं। भूमि कहीं समुद्र में धंस गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी। बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है। सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर- कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है। इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर दी थी। जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा कल्हण के वर्णन का मेल खाता है। समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिलीं। बलुई भूमि ही मिलती गयी। जल कहीं भी किंचित् मात्र खारा नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है। श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल- काय पड़े हैं। क्योकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि के नीचे पत्थर नहीं मिलते। मैंने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय सेतु समुद्रम योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहे हैं। विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही मत है। किसी समय श्री लंका तथा भारत में स्थल तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा। कालान्तर में हजारों वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र गर्भ में चला गया है, अथवा टूटा-फूटा 'आदम ब्रिजस' के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है। राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था। उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई। समुद्र दोनों तटों के मध्य इतना संकीर्ण है कि लंका के सौधों अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर, सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और समझा जा सकता है। मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग ४,२०) द्रष्टव्य है। रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट दिया गया था। रामायण में कहीं लाक्षा अथवा खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल में गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर लाये जाते थे। ते नगांन् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः। बभन्जुः पादपांस्तत्र प्रचकर्षुश्च सागरम् ॥ (रा० प्र० २२:५५।)

पञ्चम तरङ्ग: उत्पल वंश (अवन्तिवर्मा, शंकरवर्मा व यशोवती)

२२० राजतरङ्गिणी स तत्रान्यं नृपं दत्त्वा, तीव्रशक्तिरुपाहरत् । पटं यमुपदेवाख्यं मार्ताण्डप्रतिमाङ्कितम् ॥ २९६ ॥ २९६. तीव्र शक्तिमान राजा ने सिंहल का सिंहासन दूसरे नृप को देकर, वहाँ से मार्तण्ड प्रतिमांकित यमुप देव नामक वस्त्र लाया। हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥

  • २२:६० । समुद्रं क्षोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥
  • २२:६२ । पाषाणांश्च गिरिशृङ्गान् गिरीणां शिखराणि च । दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्णदानयसंनिभाः ॥ २२:६६ । पञ्चमेन तथा चाह्ना प्लवगाः क्षिप्रकारिभिः । योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥
  • २२:७२ । उक्त उल्लेख से पांच बातें सिद्ध होती हैं: १. शिलाखण्ड विशाल थे। जैसे वे आज भी 'पम्बन' पुल के नीचे पड़े हैं। दूसरी बात पर्वतों तथा अन्य स्थानों से उन्हें यन्त्रों द्वारा लाया जाता था। वह इतने बड़े थे कि मानव-य किंवा वानरी शारीरिक शक्ति के परे की बात थी । तीसरी बात महत्वपूर्ण यह है कि पुल पाँच दिनों में बनकर तैयार हो गया। चौथी बात महत्त्वपूर्ण है। खम्भा या तारा नही बनाया गया था। सर्वत्र उल्लेख मिलता है। शिला- खण्डों से पाट दिया गया था। वह बात पम्बनम् में इसी प्रकार के निर्माण न मिलने के कारण स्पष्ट होती है। पाँचवी बात, निर्माण में सूत्र का प्रयोग किया गया था कि पुल सीधा बने। सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णनं ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । यद्यपि सूत्र एक सो योजन लम्बा बाँधा गया था। परन्तु सेतु केवल २३ योजन लम्बा बांधा गया था। यह बात श्लोक संख्या २२:७२ के 'योज- नानि त्रयोविंशत्' से प्रकट होती है। एक सो योजन लम्बा सेतु बाँधा गया था परन्तु पुल तेईस योजन ही क्यो बाँधा गया और वह भी केवल पाँच दिनों में। इन बातों में मेल नही खाता। यदि एक योजन आठ मील का मान लिया जाय तो लंका और भारत के मध्य समुद्र का पाट ८०० मील होना चाहिए। परन्तु शुद्ध पाट केवल २० मील का है। यदि सेतु २३ योजन लम्बा था तो १८४ मील लंका और भारत के मध्य दूरी होनी चाहिए। यह भी गलत होता है। 'पम्बनम्' पुल की लम्बाई देखकर यह समझा जा सकता है कि निर्माण में विशेष दिन नही लग सका। केवल 'पांच दिन' के उल्लेख से प्रकट होता है कि पुल ८०० या १८४ मिल लम्बा नहीं हो सकता। कवि वर्णन एवं सेतु की विशालता दिखाने के लिये यह वर्णन किया गया है। एक योजन चार कोस का होता है। एक कोस दो मिल का होता है। परन्तु काश्मीरी कोस् दो मिल तथा ढाई मिल के बीच होता था। प्रचलित कोस की दूरी से कम था। उक्त प्रमाणो तथा 'पम्बनम्' में बड़े विशालकाय शिलाखण्डो को देखकर सेतु का वही होना प्रमाणित होता है। यहाँ तटपर मुसलमान माझियों तथा ईसाईयो की आबादी है। कुछ निम्न वर्ण के हिन्दू रहते हैं। उनसे मैने मिहिरकुल सम्बन्धी पुरानी कहानी किंवा आख्यायिका जानने का प्रयास किया। परन्तु उन्हे आश्चर्य हुआ। उन्होंने मिहिरकुल का नाम भी नही सुना था। वे केवल रामायण वर्णित गाथा को ही कुछ हेर फेर के साथ बता सकने में समर्थ हुए। पाठभेद : ... श्लोक संख्या २९६ में 'शक्तिरुपा' शक्ति का

प्रथमं तरंगः ३३१ व्यावृत्य चोलकर्णाटलाटादींश्च नरेश्वरान् । सिन्धुरानिव गन्धेभो गन्धेनैव व्यदारयत् ॥ ३०० ॥ ३००. लौटकर उसने मार्ग में चोल१, कर्णाट२, लाटादि३ के नरेशों को परास्त कर दिया; जैसे गजराज मदगन्ध से ही हाथियों को तितर बितर कर देता है । ममा' तथा 'सविउदया' और 'मार्ताण्ड' का 'मार्तण्ड' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २९९ (१) यमुपदेव : यह वस्त्र क्या था ठीक से पता नहीं चलता । मार्तण्ड अर्थात् सूर्य का उल्लेख यहाँ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दृष्टि से है । मिहिरकुल तथा उसके पिता दोनों की मुद्राओं पर सूर्य आकृति अंकित मिलती है । प्रतीत होता है, राजा शिव भक्त था । सूर्य का उपासक था । सिंहल राजा के हेमपादांकित चिन्ह के स्थान पर उसने 'सूर्यांकित' वस्त्र का प्रचलन किया । रानी के कुच पर उसने सिंहल राजापादांकित चिन्ह देखा था । उसके स्थान गोल उत्तुंग कुच पर उगता गोल सूर्य रश्मि तुल्य वस्त्र लगाना अधिक कलात्मक मालूम होता है । स्तनों पर पश्चिमीय देशों के रंगमंच पर स्त्रियों को इस प्रकार का गोल जरी का काम किये वस्त्र पहने देखा है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३०० में 'लाटादींश्च' का 'लोटा- दींश्च' तथा 'व्यदारयत्' का 'व्यधारयत्' पाठभेद मिलता है । ३०० (१) चोल : आधुनिक तंजोर तथा त्रिचनापल्ली तथा पुडुकोट्ट के कुछ भागों को मिलाकर प्राचीन चोल मण्डल प्रायः बन जाता है । चोल राज्य पूर्वीय सागर तट पर पेन्नार नदी से वेल्लार तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था । यह भी मत है । वेल्लारु नदी के उत्तर दक्षिण (एक ही नाम की दो नदियाँ हैं) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टाईक्कराप तक फैला था। वर्तमान त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पुदुक्कोट्टइ का कुछ भाग सम्मिलित था । इसकी राजधानी 'उरगपुर' अथवा उरैयूर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है । कावेरीपट्टनं कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान कांजीवरम चोल प्रदेश का एक विशाल नगर था । नागपट्टम अर्थात् नाडीपत्तनम भी इसका एक बन्दर- गाह था । यह बन्दरगाह आज भी चालू है । मैं यहाँ दो बार आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण जहाज दो मिल दूर ठहरते हैं । तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोनम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में गंगाई कोण्डा चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी। दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल भी दिया गया है । चोल देश तथा देशवासी दोनों के लिए आया है । (सभा पर्व ५२:३५) । मार्कण्डेय (५७:४५), वायु (४५:५:१२४) मत्स्य पुराणों (११२:५:४६) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ आया है। इसके अतिरिक्त पद्म पुराण (३०, १०८, १०९) स्कन्द पुराण (२:४.२६-२७) में भी उल्लेख मिलता है । रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१२) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड्र, पाण्ड्य, केरल के साथ किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी है । कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है । महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है कि अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त की थी । भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख

६१० राजतरंगिणी स तंत्रान्यं नृपं दत्त्वा तीव्रशक्तिरुपाहरत् । पटं यमुपदेवाख्यं मार्ताण्डप्रतिमाङ्कितम् ॥ २९६ ॥ अर्थात् तीव्र शक्तिमान राजा ने सिंहल का सिंहासन दूसरे नृप को देकर, वहाँ से मार्त्तण्ड प्रतिमांकित यमुप देव नामक वस्त्र लाया । हस्तिमात्रांश्च महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥ २२:६० । समुद्रं शोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । पाषाणांश्च गिरिशृङ्गान् गिरीणां शिखराणि च । दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्यदानवमन्निभाः ॥ २२:६६ । पञ्चमेन तथा चाह्ना प्लवंगैः क्षिप्रकारिभिः । योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥ २२:७२ । उक्त उल्लेख से पाँच बातें सिद्ध होती हैं। १. शिलाखण्ड विशाल थे। जैसे वे आज भी 'पम्बन' पुल के नीचे पड़े हैं। २. दूसरी बात पर्वतों तथा अन्य स्थानों से उन्हें यन्त्रों द्वारा लाया जाता था। वह इतने बड़े थे कि मानव-यत्न किंवा बानरी शारीरिक शक्ति के परे की बात थी। ३. तीसरी बात महत्त्वपूर्ण यह है कि पुल पाँच दिनों में बनकर तैयार हो गया। ४. चौथी बात महत्त्वपूर्ण है। खम्भा या तासा नहीं बनाया गया था । सर्वत्र उल्लेख मिलता है। शिला- खण्डों से पाट दिया गया था। वह बात 'पम्बनम्' में किसी प्रकार के निर्माण न मिलने के कारण स्पष्ट होती है । पाँचवीं बात, निर्माण में सूत्र का प्रयोग किया गया था कि पुल सीधा बने । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्तं ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । यद्यपि मूल एक सौ योजन लम्बा बाँधा गया था। परन्तु सेतु केवल २३ योजन लम्बा बाँधा गया था । यह बात श्लोक संख्या २२:७२ के 'योज- नानि त्रयोविंशत्' से प्रकट होती है। एक सौ योजन लम्बा सेतु बाँधा गया था परन्तु पुल तेईस योजन ही क्यों बाँधा गया और वह भी केवल पाँच दिनों में। इन बातों में मेल नहीं खाता । यदि एक योजन आठ मील का मान लिया जाय तो लंका और भारत के मध्य समुद्र का पाट ८०० मील होना चाहिए । परन्तु शुद्ध पाट केवल २० मील का है। यदि सेतु २३ योजन लम्बा था तो १८४ मील लंका और भारत के मध्य दूरी होनी चाहिए । यह भी गलत होता है। 'पम्बनम्' पुल की लम्बाई देखकर यह समझा जा सकता है कि निर्माण में विशेष दिन नहीं लग सका । केवल 'पाँच दिन' के उल्लेख से प्रकट होता है कि पुल ८०० या १८४ मील लम्बा नहीं हो सकता । कवि वर्णन एवं सेतु की विशालता दिखाने के लिये यह वर्णन किया गया है। एक योजन चार कोस का होता है। एक कोस दो मिल का होता है। परन्तु काश्मीरी कोस दो मिल तथा ढ़ाई मिल के बीच होता था । प्रचलित कोस की दूरी से कम था । उक्त प्रमाणों तथा 'पम्बनम्' में बड़े विशालकाय शिलाखण्डों को देखकर सेतु का वही होना प्रमाणित होता है। यहाँ तटपर मुसलमान माझियों तथा ईसाइयों की आबादी है। कुछ निम्न वर्ण के हिन्दू रहते हैं। उनसे मैंने 'मिहिरकुल सम्बन्धी पुरानी कहानी किंवा आख्यायिका जानने का प्रयास किया। परन्तु उन्हें आश्चर्य हुआ । उन्होंने मिहिरकुल का नाम भी नहीं सुना था । वे केवल रामायण वर्णित गाथा को ही कुछ हेर फेर के साथ बता सकने में समर्थ हुए। पाठभेद : ... श्लोक संख्या २९६ में: 'शक्तिरुपा' शक्ति म।

प्रथमं तरंगः ३११ व्यावृत्त्य चोलकर्णाटलाटादींश्च नरेश्वरान्। सिन्धुरानिव गन्धेभो गन्धेनैव व्यदारयत् ॥ ३०० ॥ ३००. लौटकर उसने मार्ग में चोल१, कर्णाट२, लाटादि३ के नरेशों को परास्त कर दिया; जैसे गजराज मदगन्ध से ही हाथियों को तितर् बितर कर देता है। ममा' तथा 'शशिनदया' और 'मार्ताण्ड' का 'मार्तण्ड' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : *२९९(१) वपुषदेव : यह वस्त्र क्या था ठीक से पता नही चलता। मार्तण्ड अर्थात् सूर्य का उल्लेख यहाँ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दृष्टि से है। मिहिरकुल तथा उसके पिता दोनों की मुद्राओं पर सूर्य आकृति अंकित मिलती है। प्रतीत होता है : राजा शिव भक्त था। सूर्य का उपासक था। सिंहल राजा के हेमपादांकित चिह्न के स्थान पर उसने 'सूर्यावितं' वस्त्र का प्रचलन किया। रानी के कुच पर उसने सिंहल राजापादांकित चिन्ह देखा था। उसके स्थान गोल उत्तुंग कुच पर उगता गोल सूर्य रश्मि तुल्य वस्त्र लगाना अधिक कलात्मक मालूम होता है। स्तनों पर पश्चिमीय देशों के रंगमंच पर स्त्रियों को इस प्रकार का मोल जरी का काम किये वस्त्र पहने देखा है। पाठभेद : १. श्लोक संख्या ३०० में 'लाटादींश्च' का 'नोटा- दींश्च' तथा 'व्यदारयत्' का 'व्यधारत्' पाठभेद मिलता है। ३०० (१) चोल : आधुनिक तंजोर तथा त्रिचनापल्ली तथा पुदुकोट्ट के कुछ भागो को मिलाकर प्राचीन चोल मण्डल प्रायः बन जाता है। चोल राज्य पूर्वीय सागर तट पर पेन्नर नदी से बेल्लार् तथा पश्चिम मे कुर्ग तक विस्तृत था। यह भी मत है। बेल्लारु नदीके उत्तर दक्षिण (एक ही नाम को दो नदियां है) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टार्डवंकराय तक फैला था। वर्तमान सचिनापल्ली, तंजोर तथा पुहुकोटट्इ का कुछ भाग सम्मिलित था। इसकी राजधानी उरगपुर अथवा उरैपुर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी। कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है। कावेरीपट्टन कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था। कांची अर्थात् वर्तमान काजीवरम् चोल प्रदेश का एक विशाल नगर था। नागपटन अर्थात् नागीपत्तन्नम भी इसका एक बन्दर- गाह था। यह बन्दरगाह आज भी चालू है। मैं यहां दो बार आ चुका हूँ। समुद्र उथला होने के कारण जहाज दो मिल दूर ठहरते हैं। तंजौर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोनम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में गंगाई कोण्डा चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी। दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल भी दिया गया है। चोल देश तथा देशवासी दोनों के लिए आया है। (सभा पर्व ५२:३५)। मार्कण्डेय (५७:५:४५,) वायु (४५:५:१२४) मत्स्य पुराणों (११२:५:४६) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ आया है। इसके अतिरिक्त पद्म पुराण (३०, १०८; १०९;) स्कन्द पुराण (२:४:२६-२७) में भी उल्लेख मिलता है। रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१२) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड्र, पाण्ड्य, केरल के साथ किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी हैं। कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है। महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है कि अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त की थी। भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख

३१२ राजतरंगिणी

मिलता है। धृष्टद्युम्न द्वारा निर्मित, क्रौंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व में यहाँ के सैनिक रक्षा निमित्त तत्पर थे। कर्ण पर्व (१२:१५) में उल्लेख आता है। पाण्डवों के पक्ष से चोलवासियों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। द्रोण पर्व (११:१७) में वर्णन मिलता है। भगवान् कृष्ण ने इस देश को जीता था। कात्यायन ने पाणिनि के वार्तिक में चोल तथा पाण्ड्य का उल्लेख किया है। पाणिनि ने अपनी अष्ट- ध्यायी में (४:१:१७५-७) कांचीपुरम का उल्लेख किया है। अशोक ने द्वितीय तथा तेरहवें शिलालेख में चोल, पाण्ड्य, केरल पुत्तो (केरल पुत्र) तथा सतियपुत्तो (सत्यपुत्र) का उल्लेख अपने राज्य के दक्षिणान्त के सीमान्त देश के रूप में किया है। तिब्बतीय बौद्ध ग्रन्थों से मालूम होता है। मौर्यों ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। इसका समर्थन आधुनिक अनुसन्धानों से हो गया है। महावंश में चोल तथा कावेरीपत्तनम का उल्लेख है। जातक में कावेरीपत्तन का उल्लेख मिलता है। चोल का इतिहास उतार-चढाव से भरा पड़ा है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में चोल का उल्लेख किया है। बौद्ध ग्रन्थों में समन्त पसादिका, जातक, पिटकादि में 'कोरु' जनपद का अर्थ चोल जनपद लगाना चाहिए। परमार राज लक्ष्मण देव की प्रशस्ति में चोल विजय का वर्णन है। परन्तु यह कल्पना मात्र प्रतीत होता है। प्लौतमी ने चोल का उल्लेख 'सोर' शब्द से किया है। उस पर अरकाट का शासन होना बताता है। मार्कण्डेय पुराण (५७:४५), वायु. पुराण (४५: १२४), मत्स्य पुराण (११२:४६) में चोल देश का उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में—'चोलाः कुल्या- स्तथैव च' वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में-'चोल्याः कुल्यास्तथैव च' मत्स्य पुराण में 'चोलाः कुल्यास्तथैव च।' वामन पुराण में 'चोल कुल्याश्च राक्षस' का उल्लेख आया है।

शक्ति संगम तंत्र (३:७:२२) में उल्लेख किया गया है : द्राविडेतैंलंगयोर्मध्ये चोलदेशः प्रकीर्तितः । लम्बकर्णाश्च ते प्रोक्ता भद्रोग्याव्याम्भरी भवेत् ॥ २२ इससे प्रकट होता है कि चोल देश द्रविड़ तथा तैलंग देश के मध्य स्थित था। २. कर्णाट : वर्तमान कर्नाटक क्षेत्र है। भागवत (५:६:७,) महाभारत भीष्म पर्व (९:१९) में कर्णाटक को दक्षिण भारत का एक जनपद कहा गया है। जातक (भाग १:४४७,) महावंश (६:५, ६:३५, ८:६-७) भागवत पुराण (५:६:७) में कर्णाटक का उल्लेख आया है। इसे गरा मंडल कहा गया है। स्कन्द पुराण के देशों की तालिका में कर्णाट का स्थान ४४वाँ तथा ग्राम-संख्या १२५००० दी गयी है। बृहत् संहिता में केरल के साथ कर्णाट का उल्लेख किया गया है। सम्मोह तन्त्र जिसकी रचना सन् १४५० ई० के पूर्व हुई थी, में उल्लेख आता है : सौराशे द्रविड़ेऽथैवं (च) स्तैंलिग मल्याद्र (द्रि) कौ। कर्णाटान्यन्य वैदर्भं मर्यां (श्रा) मौर (राः) समालवा (याः) ॥ ४ शक्ति संगम तन्त्र (३:७:११४:६) में उल्लेख आता है मार्जारतीर्थराजेन्द्रे कोलापुरनिवासिनी । तावद्देशो महाराष्ट्रः कर्णाटस्याभि गोचर ॥ ११ रामनाथं समारभ्य श्रीरंगान्तं वरेश्वरि । कर्णाट देशो देवेशि साम्राज्यभोगदायकः ॥ १९ शक्ति संगम तन्त्र ३:८:१५ पूर्वे बैजनाथस्तूत्तरेऽमरकण्टकम् । कांचीपुरममध्यभागे मोहनावत्तं मे (ए) व च ॥ १५ उक्त उद्धरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि कल्हण ने कर्णाट नाम ठीक दिया है। कर्नाटक प्राचीन नाम नहीं है। कन्नड़ भी प्राचीन नाम नही

प्रथम तरंग ३१३ है। कर्नाटक देशवासियों की भाषा कन्नड़ है। उनका साहित्य कन्नड़ साहित्य कहा जाता है। वर्तमान मैसूर राज्य समस्त कन्नड़ भाषियों का राज्य है। कन्नड़ शब्द संस्कृत कर्णाट का अपभ्रंश है। उक्त तन्त्रों के अनुसार प्राचीन कर्णाटक देश रामनाथ से श्रीरंग तक विस्तृत था। श्रीरंग शब्द वर्तमान श्रीरंगपत्तन के लिए आया है। श्रीरंग कावेरी नदी के दूसरे तट पर तंजोर के दूसरी तरफ है। रामनाथ स्थान रामनाथपुरम् अर्थात् पूर्व रामनद जिला अथवा रामनाथ मठ मदुरा जिला अथवा तुंग और भद्रा नदियों के संगम पर रामेश्वर तीर्थ हो सकता है। कश्मीरी महाकवि विल्हण ने कुन्तल देश को कर्णाट देश का समानार्थक कहा है। विक्रमादित्य षष्ठ को 'कुन्तलेश' तथा 'कर्णान्ते' कहा गया है। कुन्तल देश कर्णाटक का एक भाग हो सकता है। हरिहर राजा द्वितीय के एक लेख सन् १३०७ ई० मे पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट देश में था। विजय नगर साम्राज्य के विस्तार के साथ कर्णाट प्रदेश की सीमा दक्षिण मे बहुत विस्तृत हो गयी थी। तल्लीकोट के युद्ध (सन् १५६५ ई०) के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् वेल्लोर जिला, उत्तरेश अरकाट तक पीछे चले आये थे। उनका राज्य परिमित हो गया था। लघु राज्य होने पर भी उन्हें कर्नाटक का राय कहा जाता है। सन् १६६२-१७०१ ई० मे जुलफिकार अली खा कर्ना- टक का नवाब बना दिया गया था। (४) लाट : दक्षिण तथा गुजरात के मध्य का प्रदेश जिसे ताप्ती तथा नर्मदा नदियां सींचती है। लाट देश था। एक मत है। ताप्ती और माही के मध्य का देश लाट था। बन्धुवर्मा के मन्दसोर शिलालेख में लाट का उल्लेख मिलता है। प्रतिहार राजा कक्कुक ने लाट देश मे बहुत ख्याति प्राप्त की थी। एक ४० और मत है माही और किम नदियों के मध्य यह अंचल था। उत्तरी कोंकन और गुजरात का पुराना नाम कहा जाता है। एक मत है कि यह मध्य गुजरात का भाग है। खेडु के कर्ण के शिलालेख से मालूम होता है कि इसमें मध्य तथा दक्षिणी गुजरात क्षेत्र सम्मिलित थे। बौद्ध साहित्य दीपवंश तथा महावंश के अनुसार लाटराष्ट्र गुजरात था जिसकी राजधानी दीपवंश के अनुसार सिंह- पुर थी। पुराने राष्ट्रकूट और गुजरात के कागजा- तों से प्रतीत होता है कि लाटेश्वर देश गुजरात था। लाटेश्वर राज्य की राजधानी इलापुर थी। महाभारत अनुशासन पर्व (३५ : १७-१२) मे वर्णन आता है कि लाट एक क्षत्रिय जाति थी परन्तु ब्राह्मणों के साथ ईर्ष्या करने के कारण नीच हो गये थे। संमोह तन्त्र में (२ : ३) देशों की तालिका में लाट देश का नाम दिया है। यथा • चोल्यां (पां) चालगौश्च मलपांढ (पालश्च सिंहल। व्योक विडो व्योगश्चैव (१) का(क)र्णाटो लाट एव च॥ शक्ति संगम तन्त्र (३:७ ५५) में लाट देश का उल्लेख मिलता है। अवन्तीतः पश्चिमे तु वैदर्भाद् दक्षिणोत्तरे। लाटदेशः समाख्यातो वरारं शृणु पार्वति ॥ लाट देश उक्त उद्धरणों के आधार पर अवन्ती के पश्चिम तथा विदर्भ (वरार) के उत्तर पश्चिम ठहरता है। लाट देश अधोगामी माही तथा ताप्ती के मध्य में था। राजाओं की शक्ति एवं राज्य विस्तार के कारण यह सीमा कभी-कभी माही से और परे तक चलो जाती थी। उसने भृगुकच्छ (भड़ौच) तथा नवसारिका (नवसारी) के अंचल सम्मिलित थे। कामसूत्र (६:५:२६) के अनुसार लाट देश मालवा के पश्चिम दिशा में था। सन् १४२५ ई० के एक दक्षिणी अभिलेख से पता चलता है कि पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में कन्नडिग, तामिल, तैलंग, इयाल अर्थात् गुजरात के ब्राह्मण

३१४ राजतरंगिणी तस्मिन्प्रयाते प्राप्तेभ्यः नर्शगुम्नत्पराभवम् । नगर्यो नगनाथेभ्यश्श्रुतद्रद्त्वाचमेखलाः ॥ ३०१ ॥ ३०१. उसके चले जाने पर, पुनः लोटे, राजाओं से टूटती अटूट मेखलाओं वाली नगरियों ने उनके पराभव को कहा । काश्मीरं द्वारमापद्य श्वभ्रभ्रष्टस्य दन्तिनः । श्रुत्वा स प्रायतं घोषं तीव्रांमाश्चित्तोऽभवन् ॥ ३०२ ॥ ३०२. कश्मीर द्वार१ पहुँचने पर गर्त२ में गिरे गज३ के आर्तनाद को सुनकर वह हर्ष से रोमांचित होगया । थे। स्कन्द पुराण के पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में निम्न- लिखित ब्राह्मण वर्ग आते हैं : कर्णाटैश्चैव, तैलंगा (द्राविडा) गुर्जरा राष्ट्रवासिनः । आन्ध्राश्च द्राविडाः पंच विन्ध्यदक्षिणवासिनः ॥ कर्णाट, तैलंग, गुर्जर, आन्ध्र तथा राष्ट्रवासी (महाराष्ट्र) पाँच राष्ट्रवासियों को विन्ध्य के दक्षिण रहने वालों में गिनता है। अर्थात् दक्षिणापथ का अर्थ यही लगाया जाता था । विन्ध्य के उत्तर रहने वाले पंच गौड़ ब्राह्मण पुरों की व्याख्या स्कन्दपुराण करता है : सारस्वतः कान्यकुब्जो गौड़मैथिलउत्कलाः । पञ्चगौड़ा इति ख्याता विन्ध्यस्योत्तरवासिनः ॥ विनयचन्द्र की काव्यशिक्षा में लाट देश के ग्रामों की संख्या २१ हजार तथा गुर्जर देश की ७० हजार दी गयी है। स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में लाड किंवा लाट देश की क्रमसंख्या ३८ तथा उसके ग्रामों की संख्या भी २१ हजार दी गयी है । उसमें कच्छ की ग्राम- संख्या १४ हजार, सौराष्ट्र की ५५ हजार तथा गुजरात की ग्राम संख्या ७० हजार दी गयी है। इससे स्पष्ट है कि लाट देश का अस्तित्व प्राचीन काल में गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ से स्वतन्त्र तथा भिन्न था । लाट प्रदेश गुजरात तथा सौराष्ट्र से छोटा और कच्छ से बड़ा था। लाट तथा लाट विषय का उल्लेख प्रथम शताब्दी से सातवी तथा आठवीं शताब्दी तक भारतीय वाङ्- मय में होता रहा है । इस प्रदेश का नाम पुराण तथा महाभारत और रामायण में मुझे नहीं मिल सका है। कौटिल्य ने इसका उल्लेख किया है । लाट देश का प्रवृत्त उस लाट देश को गया था। इसमें गुजरात तथा उत्तरीथ कोंकण का अंश आ जाता था। मुदगों के काल में लाट समुद्र तथा भ्राता मगूदी आदि का उल्लेख मिलता है। लाड देश के अन्तर्गत नगरलता (भड़ोच महरच्छ) तथा ओर्देत (उज्जैन) नगर थे । ३०२. (१) द्वार : द्वार का अर्थ दर्रा या पास है। संस्कृत में दर्रों को 'संकट' कहते हैं। गोवर पास की तरह कश्मीर में दर्रे अर्थात् द्वारों की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध दिया जाता था । द्वारों पर सेना रहती थी । सुरक्षा की दृढ़ व्याख्या की जाती थी । उन्हें द्वारपति, द्वाराधिपति, द्वारपति, द्वारेश, द्वाराधिकारी तथा द्वारनायक कहा जाता था । द्वार के आधीन 'ड्रंग' अर्थात् चौकियाँ होती थी । ड्रंगाधिपति ड्रंग का नायक होता था। यह द्वाराधिप के आधीन होता था। कल्हण ने द्वार का पुनः उल्लेख रा० त० ४:४०४ ५:१३७, ८:१६१० में किया है। विशेष द्रष्टव्य है टिप्पणी १:१२२ पृष्ठ १८४ । (२) गर्त : हस्तिकंज जिसे आइने अकबरी में गलती से हस्तिवत्तर लिख दिया गया है। पीर पंजाल मार्ग पर अलियाबाद सराय से आधा मील अधोभाग में है। ∴

प्रथमतरंग ३१५ तदाकर्णनसंरम्भे सहर्षोऽथ विशुद्धधीः । शतमन्यद्गजेन्द्राणां हठेन निरलोठयत् ॥ ३०३ ॥ ३०३. उस समय विशुद्धधी, प्रसन्न उस राजा ने, उस घोष को सुनने के उत्साह में एक सौ दूसरे हाथियों¹ को बलात् गर्त² में गिरवा दिया ।

(३) गज-हाथी : वरनीयर इसी प्रकार की औरंगजेब के समय की एक घटना का वर्णन करता है, जबकि हाथी पीर पंजाल पन्तसल या पंचाल धारा पर्वत पर चढ़ रहा था, तो गर्त में गिर गया । ३०३. (१) हाथी : सुंग युन तथा कोसमस इण्डिको प्लीपुस्टेस (पृष्ठ ७९) दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि श्वेत हूणों की सेना में हाथियों का एक बड़ा भारी समूह था । सुंग युन लिखता है कि सेना में सात सौ हाथी थे। इण्डिकोप्लोपुस्टेस से प्रतीत होता है कि 'गोल्लास' (मिहिरकुल) के युद्ध में जाते समय एक सहस्र हाथी से कम उसके पास नहीं थे। (२) गर्त : हस्तिवंज : प्राचीन काल से ही यह घटना जहाँ हुई थी उसे लोग जानते हैं। इस घटना के पश्चात् से मिहिरकुल जिस मार्ग से लौटा था उसे हस्तिवंज कहने लगे थे। आइने अक- बरी में यह घटना राजतरंगिणी से ली गयी है। उसमें गलती से 'हस्तीवतर' स्थान का नाम लिखा है। काश्मीर इतिहास लेखक हैदर मलिक, नारायण कौल और बीरबल कचरू हस्तिवंज ही नाम देते हैं। उसे पीर पंजाल पर्वतमाला में ही स्थित करते हैं। स्टीन ने स्वयं सितम्बर १८६१ में इस स्थान की यात्रा की थी। उसने वहाँ स्थान तथा लोक- श्रुति का पता लगा लिया था। उसने वहाँ का विस्तृत वर्णन टोपो ग्राफी पीर पन्तसाल मार्ग जे० ए० एस० पी० १८९५ पृष्ठ ३७६ पर दिया है। पुराने मुगल मार्ग का वर्णन किया है। हूरपुर अर्थात् शूरपुर (३:२१७) से यह मार्ग कुछ दूर तक रामम्यार नदी के दक्षिण तट के साथ चलता है। फिर मार्ग यह ऊँचाई पार करता वाम अथवा उत्तरी तट पर चलता पुरानी मुगल सराय जिसे 'अलियाबाद' कहते हैं पहुँचता है। दक्षिणी पार्श्व के संकुचित मार्ग के दूसरी तरफ लगभग आध मील अलियाबाद के अधो- भाग में एक ऊँची पर्वतीय ऊर्ध्व भूमि मिलती है। वहाँ से कगार की चट्टान ढालुआ होती नदी के पेटा में मिल जाती हैं। यह झुकी हुई ऊर्ध्वभूमि हस्तिभंज का स्थान कहा जाता है। यहाँ के सभी लोग इस बात को दुहराते हैं। एक राजा का हाथी यहाँ से नीचे खड्ड में गिर गया था। राजा का नाम उन्हें नही मालूम है। हाथी स्वयं गिरा था। अथवा गिरा दिया गया था। यह भी उन्हें मालूम नहीं है। अकबर के सड़क बनवाने के पहले मार्ग हस्तिवंज टीले पर से रामम्यार नदी के दक्षिण तट से जाता था। आइने अकबरी में अबुल फजल भीमबर से काश्मीर के अनेक मार्गों का वर्णन करता है। वह हस्तिवंज (हस्तिवतर) का उल्लेख अलग करता है (२:७१३०)। यह पूर्वकालीन मार्ग था। अकबर की सेना इसी मार्ग से काश्मीर पहुँची थी। पीर पंतसल का मुगल मार्ग जो पोसियाना तथा यहराम गल्ला होकर जाता है वह दक्षिण से उस मार्ग से मिलता है। जो नन्दन सर के पास से दुरहाल दर्रा होता राजोरी जाता है। यहाँ से दक्षिण का मार्ग सीधा पड़ता है। इस मार्ग का लोग अब भी प्रयोग करते हैं। सन् १८४४ तथा १८१९ में सिक्खों ने अपने सैनिक अभियान के लिये इसी मार्ग को चुना था। यह मार्ग रामम्यार नदी के दक्षिण ओर हस्तिवंज के ऊपर होकर जाता है। इस प्रकार नदी पार नहीं करना पड़ता। सीमान्त प्राचीन द्वार अथवा डम्म का स्थान क्रमावर्त में था। (रा० त० ३:२२७)। इस स्थान

३१६ राजतरंगिणी

को स्टीन ने कामरेन क्रीट से पहचाना है। यह वर्तमान द्वार स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण में है। हस्तिवंज से लगभग ३ मील नीचे अर्थात् अधोभाग में है। इससे प्रगट होता है कि पुराना द्वार जिसका उल्लेख श्लोक २०२ में कल्हण ने किया है। उसी दिशा में रहा होगा।

हस्तिवंज जिस मार्ग से पार किया जाता है। यह ऊँचाई पर चढ़ता, धान वाले ढाल से पूर्व की ओर टाँके के पश्चिम पड़ता है। आज भी इस उपे- क्षित मार्ग पर जानवरों पर सामान लादकर ले जाया जा सकता है।

हस्त्यंज नाम से ही प्रकट होता है। स्थान का सम्बन्ध हस्ती अर्थात् हाथियों से रहा होगा। पर्शियन वृत्तान्तरो से पता चलता है। 'वंज' शब्द का अर्थ 'गमन' अर्थात् चलना है। पश्चिमी पंजाबी में वंज माने 'चलना' आज भी प्रयुक्त होता है।

अलिहाबाद सराय श्रीनगर से ४६ मील दूर होगी। पीर पंतशाल या पंजाल दर्रा (संकट) के पड़ाव का स्थान है। मुगलों के समय यह सराय थी। आश्रय प्रदान का काम करती थी। जंगल में है। शीतकाल में हिमाच्छादित हो जाता है। समुद्र की सतह से ११८०० फुट ऊँचा है।

मनीपर्त्ती पर्वत शिखर लगभग १६००० फुट ऊँचा है। कोसर नाग दर्रे पर स्थित कश्मीर की सबसे बड़ी झील है।

इसका प्राचीन नाम क्रमोत्सर है। शिखर का नाम कौन्सरंग है। कोसरंग तीर्थ का वर्णन महाभारत के वन पर्व १८४:५० में दिया गया है। इस शिखर पर मत्स्य भगवान् के सींग से बाँधकर नौका सत्यव्रतो ने बाँधा था। यह शिखर बनिहाल की पश्चिम दिशा में है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, - तीन शिखर हैं। सबसे सबसे ऊँचा शिखर १५५३३ फुट है। इसी प्रसिद्ध कौन्सरा तीर्थ है।

बसुदेव चरित्र के अनुसार तथा हरदत्त सूरी के मत से कथा मिलती है। नाव से दुष्टों प्राणियों के संहार से रक्षा निमित्त उत्पन्न हुई थी। 'महाभारत वन पर्व १८४:५०, नीलमत ३३, हरचरित चिंतामणि ४:२७, ग्रोवर १:१७४, सर्वविस्तार ३:४,१२; ४:१७४, नौबन्धन माहात्म्य )

यह समुद्र की सतह से १३००० फुट ऊँचाई पर है। झील दो मील लम्बी है। झील के चारों ओर हिमालय की अत्यन्त शोभनीय पर्वतमालाएँ तथा शिखर हैं। उनमें ३ शिखर १५००० फुट ऊँचे हैं। वे कौसर नाग सर को जैसे निरन्तर नीचे की ओर देखती रहती हैं। 'पंचाल' ईरानी शब्द है। कश्मीरी में उसे पंतसल कहते हैं। इसका अर्थ होता है यात्रियों के लिए जल का प्रबन्ध । 'पोतला' अथवा 'पौसरा' से इस शब्द का मेल खाता है। पोतला, पोसरा, प्याऊ, सबील, एक ही शब्द के समानार्थक भिन्न नाम हैं। उनका सम्बन्ध पानी से है। पंचाल शब्द के लिए पन्तशाल शब्द का प्रयोग किया गया है। पंचाल महाभारत में एक जनपद के लिए प्रयुक्त किया गया है। (भीष्म पर्व ९ ४१ १८४७)

मैंने इस स्थान को देखा है। यदि ऊपर अर्थात् भारत से आने वाले मार्ग से श्रीनगर की ओर चला जाय तो इस अंचल का सर्व प्रथम प्राचीन स्थान पुष्यान्नाद मिलेगा। यह वर्तमान पूशियान है। तत्पश्चात् पंचाल धारा पड़ेगी। अनन्तर हस्तिवंज और फिर उसके बाद उतराई पर क्रमावर्त्त, द्रग एवं शूरपुर पड़ेगा। शूरपुर को आज कल हुरपूर कहते हैं। तत्पश्चात् प्राचीन दे- ग्राम, नगछोल, मिनार और शुपियान पड़ता है। शुपियान के पश्चात् श्रीनगर और विजयेश्वर तक समथर भूमि मिलने लगती है।

अलिहाबाद सराय रामम्यार नदी के वाम तट पर खड़े ऊँचे पहाड़ के मूल में स्थित है। नवम्बर से अप्रैल तक तुषार से ढँका रहता है। यहाँ उस समय कोई नहीं आता। यह उजड़े, निर्जन स्थान में उपेक्षित पड़ा है। यात्रियों का निवास स्थान प्रवेश द्वार से दूसरी तरफ के आहाते के पश्चिम पार्श्व में है। इमारत भयंकर रूप में गंदी है। उसमें गिरती

[Page Header] प्रथम तरंग ३१७

[Column 1] तथा दरवाजे तक नही लगे हैं । सराय की अपेक्षा इसे अस्तबल कहना ठीक होगा । फिर भी तूफान में इससे रक्षा की जा सकती है । यह इतना ठण्डा तथा डरावना है कि यहाँ पर किसी प्रकार का सामान नही मिलता । सराय के चारो तरफ कैम्प लगाने लायक स्थान हैं । नदी के तट के समीप यहाँ हैजे द्वारा सन् १८७६ मे मरे अल्फ्रेड जान बले एस० डी० की कब्र है । इस सराय पर पहुचने के पूर्व रामम्यार नदी के दक्षिणी तट परे एक स्रोतस्विनी इससे मिलती है । उसे लद्दी नाला कहते हैं । इसके तट से मार्ग नन्दन सर तथा भगसर को जाता है । इन सरों मे राजोरी से दरहल दर्रा से होकर पहुंचा जा सकता है । वहा दो-तीन पडाव डाल कर पैदल पहुंचा जाता है । यहा जाने के लिए बरमगल्ला या पोशियन या हुर- पुर से सामान आदि ले लेना चाहिए । रावलपिण्डी से आने वाले मार्ग पर यह कश्मीर उपत्यका के सबसे समीपवर्ती पडने वाले सर हैं । बड़ी ऊँचाई पर होने के कारण स्थान शीतल, पथरीला तथा रहने योग्य नही है । कठिनता से जलोनी लकड़ी मिलती है । यहा कुछ उपज नही होती । कस्तूरी मृग अलियाबाद सराय के ऊँचे पर्वती स्थानों में मिलते हैं । अलियाबाद में यात्रियो को नही ठहरना चाहिए । सराय से ६ मील दूर शंखोद में ठहरना चाहिए । कैम्प लगाने लायक स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण तट पर मिल जाता है । यहाँ से सुपियान एक दिन मे आया जा सकता है । कैप्टन नाइट ने सन् १८६० जून २७ में यहा की यात्रा की थी । वह अपनी पुस्तक में लिखता है—दो मील दर्रा से नीचे उतरने पर अलियाबाद सराय मिली । वहा पर रहने लायक एक भाग था जिससे एक फकीर या मुल्ला रहता था । और एक युवक बंगाली तोपची जो शिकार खेलने आया था रहता था ! लगभग मध्याह्न काल मे पानी बरसने लगा । वहाँ एक कष्टप्रद रूम में बचाव के

[Column 2] लिए गया । वहाँ की फर्श सीलन से भरी थी । वहाँ पत्थर के बहुत ही सुन्दर संगतराशी की एक खिडकी थी । वहाँ की शेष इमारतों से वह मेल नही खाती थी । सराय के बीच में हरा जल से भरा एक गड्डा था । पृष्ठ ७१ डब्ल्यु०डब्ल्यु० अल्फ्रेड (१८७५) संक्षेप मे केवल इतना कहता है । पोशियन से अलियाबाद सराय आया जाता है । दोनो के मध्य में दूरी ११ मील है । एक दिन मे मार्ग खत्म किया जा सकता है । मुख्य दर्रा पीर पंजाल का यहाँ से पार किया जाता है । वह ऊँचो और खडी चढ़ाई है । चढाई ऊँचाई पर टेढा मेढा घोर पहाड का किनारा काटकर कर मार्ग बनाया गया है । मार्ग काफी अच्छा है । परन्तु कही कही पर बडे बड़े पत्थरों के ढोको और असम्बन्धित पत्थरो के कारण उवड खाबड है । मुझे बड़ा आश्चर्य मालूम होता था कि कैसे खच्चूँ । खच्चड लदे हुए एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर बिल्ली की तरह कूदने हुए चलते थे । ऊपर की चढ़ाई धीमी पड़ जाती है । पेत- शिया से प्रस्थान करने पर चार घण्टे में शिखर पर पहुँचते हैं । जहाँ से पाशियाना ६ मील पीछे छूट जाता है । शिविर उतराई क्रमश: सरल दूर्वाच्छादित प्लेटो पर से आरम्भ हो जाती है । ५ मील लम्बा तथा आठ मिल चौड़ा मार्ग ५ मील चलकर अलियाबाद सराय पहुंचा देता है । यह यात्रियों के लिए एक साधारण आश्रम स्थान है । यह एकाकी एक निर्जन स्थान में खडा है । वर्ष के अधिक महीनो में वह वीरान पड़ा रहता है । क्योकि बर्फ के कारण यहाँ पहुँचना कठिन हो जाता है । बादशाह ( औरंगजेव ) पीर पंजाल पर्वत पर चढ रहे थे । वह पहाडो में सबसे ऊँचा था । वहाँ से कश्मीर का दृश्य मिल जाता है । बादशाह के पीछे हाथियो की लम्बी कतार थी । जिनमें महिलाएँ थी । हौदों तथा अम्बारियो में बैठी थी । पहला हाथी लम्बी चढ़ाई देखकर भयभीत हो गया । वह पीछे