राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमं तरंगं ३०६ [बायाँ स्तम्भ] आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में पम्बन सेतु वह गया था। अनेक मकानों की छतें साइक्लोनो में उड़ गयी थीं। भूमि कही समुद्र में धंस गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी। बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है। सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर- कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है। इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर दी थी। जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा कल्हण के वर्णन का मेल खाता है। समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिली। बलुई भूमि ही मिलती गयी। जल कही भी किंचित् मात्र खारा नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है। श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल- काय पड़े है। क्योंकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि के नीचे पत्थर नहीं मिलते। मैने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय [दायाँ स्तम्भ] सेतु समुद्रम् योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहें हैं। विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही मत है। किसी समय थी लंका तथा भारत में स्थल तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा। कालान्तर में हजारो वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र गर्भ मे चला गया है, अथवा टूटा फूटा 'आदम ब्रिजस' के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है। राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था। उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई। समुद्र दोनों तटो के मध्य इतना संकीर्ण है कि संका के सौधो अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर, सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और समझा जा सकता है। मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग ४,२०) द्रष्टव्य है। रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट दिया गया था। रामायण में कही ताखा अथवा खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल मे गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर लाये जाते थे। ते नगाम् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः । अभ्रम्वुः पादपांस्तत्र प्रचकंपुश्च सागरम् ॥ (रा० प्र० २२:५५।)