राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथमं तरंगं ३०६ [बायाँ स्तम्भ] आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में पम्बन सेतु वह गया था। अनेक मकानों की छतें साइक्लोनो में उड़ गयी थीं। भूमि कही समुद्र में धंस गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी। बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है। सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर- कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है। इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर दी थी। जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा कल्हण के वर्णन का मेल खाता है। समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिली। बलुई भूमि ही मिलती गयी। जल कही भी किंचित् मात्र खारा नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है। श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल- काय पड़े है। क्योंकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि के नीचे पत्थर नहीं मिलते। मैने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय [दायाँ स्तम्भ] सेतु समुद्रम् योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहें हैं। विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही मत है। किसी समय थी लंका तथा भारत में स्थल तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा। कालान्तर में हजारो वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र गर्भ मे चला गया है, अथवा टूटा फूटा 'आदम ब्रिजस' के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है। राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था। उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई। समुद्र दोनों तटो के मध्य इतना संकीर्ण है कि संका के सौधो अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर, सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और समझा जा सकता है। मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग ४,२०) द्रष्टव्य है। रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट दिया गया था। रामायण में कही ताखा अथवा खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल मे गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर लाये जाते थे। ते नगाम् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः । अभ्रम्वुः पादपांस्तत्र प्रचकंपुश्च सागरम् ॥ (रा० प्र० २२:५५।)
३०८ राजतरंगिणी
आज के समान विद्युत भाप तथा मशीन परिचालित नहीं थे । प्रारम्भ में क्रेन भी हाथ से ही चलते थे । कल्हण ने भी सेतु शब्द का उल्लेख गूढ़ सेतु के संदर्भ में किया है । भगवान् राम निर्मित सेतु ठोस था अथवा पाँवों पर बनाया गया था, स्वतः एक गवेषणा का विषय है। जैसा कि गूढ़ सेतु के सम्बन्ध में लिखा जा चुका है। विशेषज्ञों की यह धारणा पुष्ट हो गयी है कि सेतु सम्भवतः ठोस था । पाँवों पर नहीं बना था । मुझे एक रोमन कैथोलिक आयरिश इजीनी- यर मिल गये। वे विश्व पर्यटन निमित्त निकले थे । उन्हें भी स्थान देखकर कौतूहल हुआ । चर्चा प्रसंग में उन्होंने कहा—'मैं रोमन कैथोलिक हूँ । बाइबिल में विश्वास करता हूँ । रामायण की चाहे जो गाथा हो । परन्तु मैं इतना निश्चय रूप से कह सकता हूँ । यह विशाल शिलाखण्ड यहाँ बाहर से लाये गये थे । दोनों समुद्रों तटों को सेतु से जोड़ने का प्रयास किया गया था ।' (वाल्मीकि रामायण लंका काण्ड सर्ग २२ द्रष्टव्य है ) मैं हिन्दू हूँ । अतएव राम तथा राम गाथा पर स्वभावतः विश्वास करता हूँ। परन्तु अभियन्ताओं का यह मत स्थिर हो चला है । किसी समय यहाँ सेतु था । भारतीय भूखण्ड को रामेश्वर द्वीप से मिलाता था । वर्तमान सेतुबन्ध रामेश्वरम् मन्दिर का स्थान दो हजार वर्ष से पुराना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता । अतएव निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । रामायण वर्णित रामेश्वर की स्थापना किस स्थान पर की गयी थी । रामेश्वर शब्द से स्पष्ट है । राम ने रामेश्वर की स्थापना की थी । ईश्वर शब्द इस बात का द्योतक है कि शिव की स्थापना भगवान् राम ने की थी । उन्हीं के नाम पर रामेश्वर शिवालय का नाम रखा गया । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वत्र शिव मन्दिरों के लिए नाम के अन्त में ईश्वर या ईश तथा विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द का प्रयोग किया था। यह नामकरण पद्धति समस्त भारत में प्रचलित हो गयी थी । सेतुबन्ध शब्द से प्रतीत होता है कि रामेश्वर का सेतुबन्ध ठोस था । इस सेतु को पार कर राम की सेना लंका के समीप पहुँच गयी थी । यदि धनुषकोटि के पास खड़ा हो कर देखा जाय तो दूसरी ओर श्रीलंका का तट स्थान धुँधला दृष्टिगोचर होगा । लंका और भारत के बीच यह सबसे संकीर्ण स्थान है । दोनों के मध्य छिछला जल है । उसमें कुछ द्वीपों की श्रृंखला मिलेगी जो लंका और भारत के बीच है इस छिछले पानी के कारण बंगाल की खाड़ी से अरब सागर जाने वाले जहाज सरल और नजदीक के मार्ग से न जा कर श्री लंका की परिक्रमा कर जाते हैं। इस संकीर्ण स्थान को आज कल की प्रचलित भाषा में 'आदम्स ब्रिज' कहते हैं । पूर्व काल में रामेश्वरम् द्वीप से लंका तट स्थान भूखण्ड से मिला रहा होगा । मिहिरकुल की सेना सेतु किंवा नाव से श्री लंका पहुँची थी या कोई और उपाय निकाला था । इस विषय पर कल्हण शान्त हैं। रामायण का वर्णन अधिक पूर्ण तथा विस्तार से वस्तु स्थिति पर प्रकाश डालता है । कल्हण ने स्वयं श्री लंका किंवा रामेश्वर की यात्रा नहीं की थी। उसने पूर्व श्रुत अथवा किसी पूर्व कृति पर अपना वर्णन लिखा है । यदि वह रामेश्वरम् की यात्रा किया होता तो उसका वर्णन अधिक सारगर्भित, पूर्ण और समुद्री दृश्यों के वर्णन से भरा होता । कल्हण ने केवल 'राघव' की सेना से उपमा यहाँ दी है । श्री राम की सेना ने जहाँ शिविर डाला था वहाँ मिहिरकुल की सेना का शिविर पड़ना सम्भव तथा कठिन दोनो हो सकता है । इस स्थान की भौगोलिक स्थिति में आमूल परिवर्तन हो चुका है । साइक्लोन, सैण्ड डून तथा तूफानों से स्थान
प्रथम तरंग ३०९ आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में पम्बन सेतु बह गया था। अनेक मकानों की छतें साइक्लोनों में उड़ गयी थीं। भूमि कहीं समुद्र में धंस गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी। बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है। सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर- कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है। इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर दी थी। जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा कल्हण के वर्णन का मेल खाता है। समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिलीं। बलुई भूमि ही मिलती गयी। जल कहीं भी किंचित् मात्र खारा नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है। श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल- काय पड़े हैं। क्योकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि के नीचे पत्थर नहीं मिलते। मैंने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय सेतु समुद्रम योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहे हैं। विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही मत है। किसी समय श्री लंका तथा भारत में स्थल तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा। कालान्तर में हजारों वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र गर्भ में चला गया है, अथवा टूटा-फूटा 'आदम ब्रिजस' के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है। राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था। उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई। समुद्र दोनों तटों के मध्य इतना संकीर्ण है कि लंका के सौधों अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर, सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और समझा जा सकता है। मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग ४,२०) द्रष्टव्य है। रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट दिया गया था। रामायण में कहीं लाक्षा अथवा खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल में गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर लाये जाते थे। ते नगांन् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः। बभन्जुः पादपांस्तत्र प्रचकर्षुश्च सागरम् ॥ (रा० प्र० २२:५५।)
पञ्चम तरङ्ग: उत्पल वंश (अवन्तिवर्मा, शंकरवर्मा व यशोवती)
२२० राजतरङ्गिणी स तत्रान्यं नृपं दत्त्वा, तीव्रशक्तिरुपाहरत् । पटं यमुपदेवाख्यं मार्ताण्डप्रतिमाङ्कितम् ॥ २९६ ॥ २९६. तीव्र शक्तिमान राजा ने सिंहल का सिंहासन दूसरे नृप को देकर, वहाँ से मार्तण्ड प्रतिमांकित यमुप देव नामक वस्त्र लाया। हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥
- २२:६० । समुद्रं क्षोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥
- २२:६२ । पाषाणांश्च गिरिशृङ्गान् गिरीणां शिखराणि च । दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्णदानयसंनिभाः ॥ २२:६६ । पञ्चमेन तथा चाह्ना प्लवगाः क्षिप्रकारिभिः । योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥
- २२:७२ । उक्त उल्लेख से पांच बातें सिद्ध होती हैं: १. शिलाखण्ड विशाल थे। जैसे वे आज भी 'पम्बन' पुल के नीचे पड़े हैं। दूसरी बात पर्वतों तथा अन्य स्थानों से उन्हें यन्त्रों द्वारा लाया जाता था। वह इतने बड़े थे कि मानव-य किंवा वानरी शारीरिक शक्ति के परे की बात थी । तीसरी बात महत्वपूर्ण यह है कि पुल पाँच दिनों में बनकर तैयार हो गया। चौथी बात महत्त्वपूर्ण है। खम्भा या तारा नही बनाया गया था। सर्वत्र उल्लेख मिलता है। शिला- खण्डों से पाट दिया गया था। वह बात पम्बनम् में इसी प्रकार के निर्माण न मिलने के कारण स्पष्ट होती है। पाँचवी बात, निर्माण में सूत्र का प्रयोग किया गया था कि पुल सीधा बने। सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णनं ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । यद्यपि सूत्र एक सो योजन लम्बा बाँधा गया था। परन्तु सेतु केवल २३ योजन लम्बा बांधा गया था। यह बात श्लोक संख्या २२:७२ के 'योज- नानि त्रयोविंशत्' से प्रकट होती है। एक सो योजन लम्बा सेतु बाँधा गया था परन्तु पुल तेईस योजन ही क्यो बाँधा गया और वह भी केवल पाँच दिनों में। इन बातों में मेल नही खाता। यदि एक योजन आठ मील का मान लिया जाय तो लंका और भारत के मध्य समुद्र का पाट ८०० मील होना चाहिए। परन्तु शुद्ध पाट केवल २० मील का है। यदि सेतु २३ योजन लम्बा था तो १८४ मील लंका और भारत के मध्य दूरी होनी चाहिए। यह भी गलत होता है। 'पम्बनम्' पुल की लम्बाई देखकर यह समझा जा सकता है कि निर्माण में विशेष दिन नही लग सका। केवल 'पांच दिन' के उल्लेख से प्रकट होता है कि पुल ८०० या १८४ मिल लम्बा नहीं हो सकता। कवि वर्णन एवं सेतु की विशालता दिखाने के लिये यह वर्णन किया गया है। एक योजन चार कोस का होता है। एक कोस दो मिल का होता है। परन्तु काश्मीरी कोस् दो मिल तथा ढाई मिल के बीच होता था। प्रचलित कोस की दूरी से कम था। उक्त प्रमाणो तथा 'पम्बनम्' में बड़े विशालकाय शिलाखण्डो को देखकर सेतु का वही होना प्रमाणित होता है। यहाँ तटपर मुसलमान माझियों तथा ईसाईयो की आबादी है। कुछ निम्न वर्ण के हिन्दू रहते हैं। उनसे मैने मिहिरकुल सम्बन्धी पुरानी कहानी किंवा आख्यायिका जानने का प्रयास किया। परन्तु उन्हे आश्चर्य हुआ। उन्होंने मिहिरकुल का नाम भी नही सुना था। वे केवल रामायण वर्णित गाथा को ही कुछ हेर फेर के साथ बता सकने में समर्थ हुए। पाठभेद : ... श्लोक संख्या २९६ में 'शक्तिरुपा' शक्ति का
प्रथमं तरंगः ३३१ व्यावृत्य चोलकर्णाटलाटादींश्च नरेश्वरान् । सिन्धुरानिव गन्धेभो गन्धेनैव व्यदारयत् ॥ ३०० ॥ ३००. लौटकर उसने मार्ग में चोल१, कर्णाट२, लाटादि३ के नरेशों को परास्त कर दिया; जैसे गजराज मदगन्ध से ही हाथियों को तितर बितर कर देता है । ममा' तथा 'सविउदया' और 'मार्ताण्ड' का 'मार्तण्ड' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २९९ (१) यमुपदेव : यह वस्त्र क्या था ठीक से पता नहीं चलता । मार्तण्ड अर्थात् सूर्य का उल्लेख यहाँ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दृष्टि से है । मिहिरकुल तथा उसके पिता दोनों की मुद्राओं पर सूर्य आकृति अंकित मिलती है । प्रतीत होता है, राजा शिव भक्त था । सूर्य का उपासक था । सिंहल राजा के हेमपादांकित चिन्ह के स्थान पर उसने 'सूर्यांकित' वस्त्र का प्रचलन किया । रानी के कुच पर उसने सिंहल राजापादांकित चिन्ह देखा था । उसके स्थान गोल उत्तुंग कुच पर उगता गोल सूर्य रश्मि तुल्य वस्त्र लगाना अधिक कलात्मक मालूम होता है । स्तनों पर पश्चिमीय देशों के रंगमंच पर स्त्रियों को इस प्रकार का गोल जरी का काम किये वस्त्र पहने देखा है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३०० में 'लाटादींश्च' का 'लोटा- दींश्च' तथा 'व्यदारयत्' का 'व्यधारयत्' पाठभेद मिलता है । ३०० (१) चोल : आधुनिक तंजोर तथा त्रिचनापल्ली तथा पुडुकोट्ट के कुछ भागों को मिलाकर प्राचीन चोल मण्डल प्रायः बन जाता है । चोल राज्य पूर्वीय सागर तट पर पेन्नार नदी से वेल्लार तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था । यह भी मत है । वेल्लारु नदी के उत्तर दक्षिण (एक ही नाम की दो नदियाँ हैं) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टाईक्कराप तक फैला था। वर्तमान त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पुदुक्कोट्टइ का कुछ भाग सम्मिलित था । इसकी राजधानी 'उरगपुर' अथवा उरैयूर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है । कावेरीपट्टनं कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान कांजीवरम चोल प्रदेश का एक विशाल नगर था । नागपट्टम अर्थात् नाडीपत्तनम भी इसका एक बन्दर- गाह था । यह बन्दरगाह आज भी चालू है । मैं यहाँ दो बार आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण जहाज दो मिल दूर ठहरते हैं । तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोनम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में गंगाई कोण्डा चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी। दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल भी दिया गया है । चोल देश तथा देशवासी दोनों के लिए आया है । (सभा पर्व ५२:३५) । मार्कण्डेय (५७:४५), वायु (४५:५:१२४) मत्स्य पुराणों (११२:५:४६) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ आया है। इसके अतिरिक्त पद्म पुराण (३०, १०८, १०९) स्कन्द पुराण (२:४.२६-२७) में भी उल्लेख मिलता है । रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१२) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड्र, पाण्ड्य, केरल के साथ किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी है । कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है । महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है कि अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त की थी । भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख
६१० राजतरंगिणी स तंत्रान्यं नृपं दत्त्वा तीव्रशक्तिरुपाहरत् । पटं यमुपदेवाख्यं मार्ताण्डप्रतिमाङ्कितम् ॥ २९६ ॥ अर्थात् तीव्र शक्तिमान राजा ने सिंहल का सिंहासन दूसरे नृप को देकर, वहाँ से मार्त्तण्ड प्रतिमांकित यमुप देव नामक वस्त्र लाया । हस्तिमात्रांश्च महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥ २२:६० । समुद्रं शोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । पाषाणांश्च गिरिशृङ्गान् गिरीणां शिखराणि च । दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्यदानवमन्निभाः ॥ २२:६६ । पञ्चमेन तथा चाह्ना प्लवंगैः क्षिप्रकारिभिः । योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥ २२:७२ । उक्त उल्लेख से पाँच बातें सिद्ध होती हैं। १. शिलाखण्ड विशाल थे। जैसे वे आज भी 'पम्बन' पुल के नीचे पड़े हैं। २. दूसरी बात पर्वतों तथा अन्य स्थानों से उन्हें यन्त्रों द्वारा लाया जाता था। वह इतने बड़े थे कि मानव-यत्न किंवा बानरी शारीरिक शक्ति के परे की बात थी। ३. तीसरी बात महत्त्वपूर्ण यह है कि पुल पाँच दिनों में बनकर तैयार हो गया। ४. चौथी बात महत्त्वपूर्ण है। खम्भा या तासा नहीं बनाया गया था । सर्वत्र उल्लेख मिलता है। शिला- खण्डों से पाट दिया गया था। वह बात 'पम्बनम्' में किसी प्रकार के निर्माण न मिलने के कारण स्पष्ट होती है । पाँचवीं बात, निर्माण में सूत्र का प्रयोग किया गया था कि पुल सीधा बने । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्तं ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । यद्यपि मूल एक सौ योजन लम्बा बाँधा गया था। परन्तु सेतु केवल २३ योजन लम्बा बाँधा गया था । यह बात श्लोक संख्या २२:७२ के 'योज- नानि त्रयोविंशत्' से प्रकट होती है। एक सौ योजन लम्बा सेतु बाँधा गया था परन्तु पुल तेईस योजन ही क्यों बाँधा गया और वह भी केवल पाँच दिनों में। इन बातों में मेल नहीं खाता । यदि एक योजन आठ मील का मान लिया जाय तो लंका और भारत के मध्य समुद्र का पाट ८०० मील होना चाहिए । परन्तु शुद्ध पाट केवल २० मील का है। यदि सेतु २३ योजन लम्बा था तो १८४ मील लंका और भारत के मध्य दूरी होनी चाहिए । यह भी गलत होता है। 'पम्बनम्' पुल की लम्बाई देखकर यह समझा जा सकता है कि निर्माण में विशेष दिन नहीं लग सका । केवल 'पाँच दिन' के उल्लेख से प्रकट होता है कि पुल ८०० या १८४ मील लम्बा नहीं हो सकता । कवि वर्णन एवं सेतु की विशालता दिखाने के लिये यह वर्णन किया गया है। एक योजन चार कोस का होता है। एक कोस दो मिल का होता है। परन्तु काश्मीरी कोस दो मिल तथा ढ़ाई मिल के बीच होता था । प्रचलित कोस की दूरी से कम था । उक्त प्रमाणों तथा 'पम्बनम्' में बड़े विशालकाय शिलाखण्डों को देखकर सेतु का वही होना प्रमाणित होता है। यहाँ तटपर मुसलमान माझियों तथा ईसाइयों की आबादी है। कुछ निम्न वर्ण के हिन्दू रहते हैं। उनसे मैंने 'मिहिरकुल सम्बन्धी पुरानी कहानी किंवा आख्यायिका जानने का प्रयास किया। परन्तु उन्हें आश्चर्य हुआ । उन्होंने मिहिरकुल का नाम भी नहीं सुना था । वे केवल रामायण वर्णित गाथा को ही कुछ हेर फेर के साथ बता सकने में समर्थ हुए। पाठभेद : ... श्लोक संख्या २९६ में: 'शक्तिरुपा' शक्ति म।
प्रथमं तरंगः ३११ व्यावृत्त्य चोलकर्णाटलाटादींश्च नरेश्वरान्। सिन्धुरानिव गन्धेभो गन्धेनैव व्यदारयत् ॥ ३०० ॥ ३००. लौटकर उसने मार्ग में चोल१, कर्णाट२, लाटादि३ के नरेशों को परास्त कर दिया; जैसे गजराज मदगन्ध से ही हाथियों को तितर् बितर कर देता है। ममा' तथा 'शशिनदया' और 'मार्ताण्ड' का 'मार्तण्ड' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : *२९९(१) वपुषदेव : यह वस्त्र क्या था ठीक से पता नही चलता। मार्तण्ड अर्थात् सूर्य का उल्लेख यहाँ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दृष्टि से है। मिहिरकुल तथा उसके पिता दोनों की मुद्राओं पर सूर्य आकृति अंकित मिलती है। प्रतीत होता है : राजा शिव भक्त था। सूर्य का उपासक था। सिंहल राजा के हेमपादांकित चिह्न के स्थान पर उसने 'सूर्यावितं' वस्त्र का प्रचलन किया। रानी के कुच पर उसने सिंहल राजापादांकित चिन्ह देखा था। उसके स्थान गोल उत्तुंग कुच पर उगता गोल सूर्य रश्मि तुल्य वस्त्र लगाना अधिक कलात्मक मालूम होता है। स्तनों पर पश्चिमीय देशों के रंगमंच पर स्त्रियों को इस प्रकार का मोल जरी का काम किये वस्त्र पहने देखा है। पाठभेद : १. श्लोक संख्या ३०० में 'लाटादींश्च' का 'नोटा- दींश्च' तथा 'व्यदारयत्' का 'व्यधारत्' पाठभेद मिलता है। ३०० (१) चोल : आधुनिक तंजोर तथा त्रिचनापल्ली तथा पुदुकोट्ट के कुछ भागो को मिलाकर प्राचीन चोल मण्डल प्रायः बन जाता है। चोल राज्य पूर्वीय सागर तट पर पेन्नर नदी से बेल्लार् तथा पश्चिम मे कुर्ग तक विस्तृत था। यह भी मत है। बेल्लारु नदीके उत्तर दक्षिण (एक ही नाम को दो नदियां है) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टार्डवंकराय तक फैला था। वर्तमान सचिनापल्ली, तंजोर तथा पुहुकोटट्इ का कुछ भाग सम्मिलित था। इसकी राजधानी उरगपुर अथवा उरैपुर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी। कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है। कावेरीपट्टन कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था। कांची अर्थात् वर्तमान काजीवरम् चोल प्रदेश का एक विशाल नगर था। नागपटन अर्थात् नागीपत्तन्नम भी इसका एक बन्दर- गाह था। यह बन्दरगाह आज भी चालू है। मैं यहां दो बार आ चुका हूँ। समुद्र उथला होने के कारण जहाज दो मिल दूर ठहरते हैं। तंजौर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोनम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में गंगाई कोण्डा चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी। दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल भी दिया गया है। चोल देश तथा देशवासी दोनों के लिए आया है। (सभा पर्व ५२:३५)। मार्कण्डेय (५७:५:४५,) वायु (४५:५:१२४) मत्स्य पुराणों (११२:५:४६) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ आया है। इसके अतिरिक्त पद्म पुराण (३०, १०८; १०९;) स्कन्द पुराण (२:४:२६-२७) में भी उल्लेख मिलता है। रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१२) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड्र, पाण्ड्य, केरल के साथ किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी हैं। कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है। महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है कि अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त की थी। भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख
३१२ राजतरंगिणी
मिलता है। धृष्टद्युम्न द्वारा निर्मित, क्रौंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व में यहाँ के सैनिक रक्षा निमित्त तत्पर थे। कर्ण पर्व (१२:१५) में उल्लेख आता है। पाण्डवों के पक्ष से चोलवासियों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। द्रोण पर्व (११:१७) में वर्णन मिलता है। भगवान् कृष्ण ने इस देश को जीता था। कात्यायन ने पाणिनि के वार्तिक में चोल तथा पाण्ड्य का उल्लेख किया है। पाणिनि ने अपनी अष्ट- ध्यायी में (४:१:१७५-७) कांचीपुरम का उल्लेख किया है। अशोक ने द्वितीय तथा तेरहवें शिलालेख में चोल, पाण्ड्य, केरल पुत्तो (केरल पुत्र) तथा सतियपुत्तो (सत्यपुत्र) का उल्लेख अपने राज्य के दक्षिणान्त के सीमान्त देश के रूप में किया है। तिब्बतीय बौद्ध ग्रन्थों से मालूम होता है। मौर्यों ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। इसका समर्थन आधुनिक अनुसन्धानों से हो गया है। महावंश में चोल तथा कावेरीपत्तनम का उल्लेख है। जातक में कावेरीपत्तन का उल्लेख मिलता है। चोल का इतिहास उतार-चढाव से भरा पड़ा है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में चोल का उल्लेख किया है। बौद्ध ग्रन्थों में समन्त पसादिका, जातक, पिटकादि में 'कोरु' जनपद का अर्थ चोल जनपद लगाना चाहिए। परमार राज लक्ष्मण देव की प्रशस्ति में चोल विजय का वर्णन है। परन्तु यह कल्पना मात्र प्रतीत होता है। प्लौतमी ने चोल का उल्लेख 'सोर' शब्द से किया है। उस पर अरकाट का शासन होना बताता है। मार्कण्डेय पुराण (५७:४५), वायु. पुराण (४५: १२४), मत्स्य पुराण (११२:४६) में चोल देश का उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में—'चोलाः कुल्या- स्तथैव च' वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में-'चोल्याः कुल्यास्तथैव च' मत्स्य पुराण में 'चोलाः कुल्यास्तथैव च।' वामन पुराण में 'चोल कुल्याश्च राक्षस' का उल्लेख आया है।
शक्ति संगम तंत्र (३:७:२२) में उल्लेख किया गया है : द्राविडेतैंलंगयोर्मध्ये चोलदेशः प्रकीर्तितः । लम्बकर्णाश्च ते प्रोक्ता भद्रोग्याव्याम्भरी भवेत् ॥ २२ इससे प्रकट होता है कि चोल देश द्रविड़ तथा तैलंग देश के मध्य स्थित था। २. कर्णाट : वर्तमान कर्नाटक क्षेत्र है। भागवत (५:६:७,) महाभारत भीष्म पर्व (९:१९) में कर्णाटक को दक्षिण भारत का एक जनपद कहा गया है। जातक (भाग १:४४७,) महावंश (६:५, ६:३५, ८:६-७) भागवत पुराण (५:६:७) में कर्णाटक का उल्लेख आया है। इसे गरा मंडल कहा गया है। स्कन्द पुराण के देशों की तालिका में कर्णाट का स्थान ४४वाँ तथा ग्राम-संख्या १२५००० दी गयी है। बृहत् संहिता में केरल के साथ कर्णाट का उल्लेख किया गया है। सम्मोह तन्त्र जिसकी रचना सन् १४५० ई० के पूर्व हुई थी, में उल्लेख आता है : सौराशे द्रविड़ेऽथैवं (च) स्तैंलिग मल्याद्र (द्रि) कौ। कर्णाटान्यन्य वैदर्भं मर्यां (श्रा) मौर (राः) समालवा (याः) ॥ ४ शक्ति संगम तन्त्र (३:७:११४:६) में उल्लेख आता है मार्जारतीर्थराजेन्द्रे कोलापुरनिवासिनी । तावद्देशो महाराष्ट्रः कर्णाटस्याभि गोचर ॥ ११ रामनाथं समारभ्य श्रीरंगान्तं वरेश्वरि । कर्णाट देशो देवेशि साम्राज्यभोगदायकः ॥ १९ शक्ति संगम तन्त्र ३:८:१५ पूर्वे बैजनाथस्तूत्तरेऽमरकण्टकम् । कांचीपुरममध्यभागे मोहनावत्तं मे (ए) व च ॥ १५ उक्त उद्धरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि कल्हण ने कर्णाट नाम ठीक दिया है। कर्नाटक प्राचीन नाम नहीं है। कन्नड़ भी प्राचीन नाम नही
प्रथम तरंग ३१३ है। कर्नाटक देशवासियों की भाषा कन्नड़ है। उनका साहित्य कन्नड़ साहित्य कहा जाता है। वर्तमान मैसूर राज्य समस्त कन्नड़ भाषियों का राज्य है। कन्नड़ शब्द संस्कृत कर्णाट का अपभ्रंश है। उक्त तन्त्रों के अनुसार प्राचीन कर्णाटक देश रामनाथ से श्रीरंग तक विस्तृत था। श्रीरंग शब्द वर्तमान श्रीरंगपत्तन के लिए आया है। श्रीरंग कावेरी नदी के दूसरे तट पर तंजोर के दूसरी तरफ है। रामनाथ स्थान रामनाथपुरम् अर्थात् पूर्व रामनद जिला अथवा रामनाथ मठ मदुरा जिला अथवा तुंग और भद्रा नदियों के संगम पर रामेश्वर तीर्थ हो सकता है। कश्मीरी महाकवि विल्हण ने कुन्तल देश को कर्णाट देश का समानार्थक कहा है। विक्रमादित्य षष्ठ को 'कुन्तलेश' तथा 'कर्णान्ते' कहा गया है। कुन्तल देश कर्णाटक का एक भाग हो सकता है। हरिहर राजा द्वितीय के एक लेख सन् १३०७ ई० मे पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट देश में था। विजय नगर साम्राज्य के विस्तार के साथ कर्णाट प्रदेश की सीमा दक्षिण मे बहुत विस्तृत हो गयी थी। तल्लीकोट के युद्ध (सन् १५६५ ई०) के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् वेल्लोर जिला, उत्तरेश अरकाट तक पीछे चले आये थे। उनका राज्य परिमित हो गया था। लघु राज्य होने पर भी उन्हें कर्नाटक का राय कहा जाता है। सन् १६६२-१७०१ ई० मे जुलफिकार अली खा कर्ना- टक का नवाब बना दिया गया था। (४) लाट : दक्षिण तथा गुजरात के मध्य का प्रदेश जिसे ताप्ती तथा नर्मदा नदियां सींचती है। लाट देश था। एक मत है। ताप्ती और माही के मध्य का देश लाट था। बन्धुवर्मा के मन्दसोर शिलालेख में लाट का उल्लेख मिलता है। प्रतिहार राजा कक्कुक ने लाट देश मे बहुत ख्याति प्राप्त की थी। एक ४० और मत है माही और किम नदियों के मध्य यह अंचल था। उत्तरी कोंकन और गुजरात का पुराना नाम कहा जाता है। एक मत है कि यह मध्य गुजरात का भाग है। खेडु के कर्ण के शिलालेख से मालूम होता है कि इसमें मध्य तथा दक्षिणी गुजरात क्षेत्र सम्मिलित थे। बौद्ध साहित्य दीपवंश तथा महावंश के अनुसार लाटराष्ट्र गुजरात था जिसकी राजधानी दीपवंश के अनुसार सिंह- पुर थी। पुराने राष्ट्रकूट और गुजरात के कागजा- तों से प्रतीत होता है कि लाटेश्वर देश गुजरात था। लाटेश्वर राज्य की राजधानी इलापुर थी। महाभारत अनुशासन पर्व (३५ : १७-१२) मे वर्णन आता है कि लाट एक क्षत्रिय जाति थी परन्तु ब्राह्मणों के साथ ईर्ष्या करने के कारण नीच हो गये थे। संमोह तन्त्र में (२ : ३) देशों की तालिका में लाट देश का नाम दिया है। यथा • चोल्यां (पां) चालगौश्च मलपांढ (पालश्च सिंहल। व्योक विडो व्योगश्चैव (१) का(क)र्णाटो लाट एव च॥ शक्ति संगम तन्त्र (३:७ ५५) में लाट देश का उल्लेख मिलता है। अवन्तीतः पश्चिमे तु वैदर्भाद् दक्षिणोत्तरे। लाटदेशः समाख्यातो वरारं शृणु पार्वति ॥ लाट देश उक्त उद्धरणों के आधार पर अवन्ती के पश्चिम तथा विदर्भ (वरार) के उत्तर पश्चिम ठहरता है। लाट देश अधोगामी माही तथा ताप्ती के मध्य में था। राजाओं की शक्ति एवं राज्य विस्तार के कारण यह सीमा कभी-कभी माही से और परे तक चलो जाती थी। उसने भृगुकच्छ (भड़ौच) तथा नवसारिका (नवसारी) के अंचल सम्मिलित थे। कामसूत्र (६:५:२६) के अनुसार लाट देश मालवा के पश्चिम दिशा में था। सन् १४२५ ई० के एक दक्षिणी अभिलेख से पता चलता है कि पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में कन्नडिग, तामिल, तैलंग, इयाल अर्थात् गुजरात के ब्राह्मण
३१४ राजतरंगिणी तस्मिन्प्रयाते प्राप्तेभ्यः नर्शगुम्नत्पराभवम् । नगर्यो नगनाथेभ्यश्श्रुतद्रद्त्वाचमेखलाः ॥ ३०१ ॥ ३०१. उसके चले जाने पर, पुनः लोटे, राजाओं से टूटती अटूट मेखलाओं वाली नगरियों ने उनके पराभव को कहा । काश्मीरं द्वारमापद्य श्वभ्रभ्रष्टस्य दन्तिनः । श्रुत्वा स प्रायतं घोषं तीव्रांमाश्चित्तोऽभवन् ॥ ३०२ ॥ ३०२. कश्मीर द्वार१ पहुँचने पर गर्त२ में गिरे गज३ के आर्तनाद को सुनकर वह हर्ष से रोमांचित होगया । थे। स्कन्द पुराण के पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में निम्न- लिखित ब्राह्मण वर्ग आते हैं : कर्णाटैश्चैव, तैलंगा (द्राविडा) गुर्जरा राष्ट्रवासिनः । आन्ध्राश्च द्राविडाः पंच विन्ध्यदक्षिणवासिनः ॥ कर्णाट, तैलंग, गुर्जर, आन्ध्र तथा राष्ट्रवासी (महाराष्ट्र) पाँच राष्ट्रवासियों को विन्ध्य के दक्षिण रहने वालों में गिनता है। अर्थात् दक्षिणापथ का अर्थ यही लगाया जाता था । विन्ध्य के उत्तर रहने वाले पंच गौड़ ब्राह्मण पुरों की व्याख्या स्कन्दपुराण करता है : सारस्वतः कान्यकुब्जो गौड़मैथिलउत्कलाः । पञ्चगौड़ा इति ख्याता विन्ध्यस्योत्तरवासिनः ॥ विनयचन्द्र की काव्यशिक्षा में लाट देश के ग्रामों की संख्या २१ हजार तथा गुर्जर देश की ७० हजार दी गयी है। स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में लाड किंवा लाट देश की क्रमसंख्या ३८ तथा उसके ग्रामों की संख्या भी २१ हजार दी गयी है । उसमें कच्छ की ग्राम- संख्या १४ हजार, सौराष्ट्र की ५५ हजार तथा गुजरात की ग्राम संख्या ७० हजार दी गयी है। इससे स्पष्ट है कि लाट देश का अस्तित्व प्राचीन काल में गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ से स्वतन्त्र तथा भिन्न था । लाट प्रदेश गुजरात तथा सौराष्ट्र से छोटा और कच्छ से बड़ा था। लाट तथा लाट विषय का उल्लेख प्रथम शताब्दी से सातवी तथा आठवीं शताब्दी तक भारतीय वाङ्- मय में होता रहा है । इस प्रदेश का नाम पुराण तथा महाभारत और रामायण में मुझे नहीं मिल सका है। कौटिल्य ने इसका उल्लेख किया है । लाट देश का प्रवृत्त उस लाट देश को गया था। इसमें गुजरात तथा उत्तरीथ कोंकण का अंश आ जाता था। मुदगों के काल में लाट समुद्र तथा भ्राता मगूदी आदि का उल्लेख मिलता है। लाड देश के अन्तर्गत नगरलता (भड़ोच महरच्छ) तथा ओर्देत (उज्जैन) नगर थे । ३०२. (१) द्वार : द्वार का अर्थ दर्रा या पास है। संस्कृत में दर्रों को 'संकट' कहते हैं। गोवर पास की तरह कश्मीर में दर्रे अर्थात् द्वारों की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध दिया जाता था । द्वारों पर सेना रहती थी । सुरक्षा की दृढ़ व्याख्या की जाती थी । उन्हें द्वारपति, द्वाराधिपति, द्वारपति, द्वारेश, द्वाराधिकारी तथा द्वारनायक कहा जाता था । द्वार के आधीन 'ड्रंग' अर्थात् चौकियाँ होती थी । ड्रंगाधिपति ड्रंग का नायक होता था। यह द्वाराधिप के आधीन होता था। कल्हण ने द्वार का पुनः उल्लेख रा० त० ४:४०४ ५:१३७, ८:१६१० में किया है। विशेष द्रष्टव्य है टिप्पणी १:१२२ पृष्ठ १८४ । (२) गर्त : हस्तिकंज जिसे आइने अकबरी में गलती से हस्तिवत्तर लिख दिया गया है। पीर पंजाल मार्ग पर अलियाबाद सराय से आधा मील अधोभाग में है। ∴
प्रथमतरंग ३१५ तदाकर्णनसंरम्भे सहर्षोऽथ विशुद्धधीः । शतमन्यद्गजेन्द्राणां हठेन निरलोठयत् ॥ ३०३ ॥ ३०३. उस समय विशुद्धधी, प्रसन्न उस राजा ने, उस घोष को सुनने के उत्साह में एक सौ दूसरे हाथियों¹ को बलात् गर्त² में गिरवा दिया ।
(३) गज-हाथी : वरनीयर इसी प्रकार की औरंगजेब के समय की एक घटना का वर्णन करता है, जबकि हाथी पीर पंजाल पन्तसल या पंचाल धारा पर्वत पर चढ़ रहा था, तो गर्त में गिर गया । ३०३. (१) हाथी : सुंग युन तथा कोसमस इण्डिको प्लीपुस्टेस (पृष्ठ ७९) दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि श्वेत हूणों की सेना में हाथियों का एक बड़ा भारी समूह था । सुंग युन लिखता है कि सेना में सात सौ हाथी थे। इण्डिकोप्लोपुस्टेस से प्रतीत होता है कि 'गोल्लास' (मिहिरकुल) के युद्ध में जाते समय एक सहस्र हाथी से कम उसके पास नहीं थे। (२) गर्त : हस्तिवंज : प्राचीन काल से ही यह घटना जहाँ हुई थी उसे लोग जानते हैं। इस घटना के पश्चात् से मिहिरकुल जिस मार्ग से लौटा था उसे हस्तिवंज कहने लगे थे। आइने अक- बरी में यह घटना राजतरंगिणी से ली गयी है। उसमें गलती से 'हस्तीवतर' स्थान का नाम लिखा है। काश्मीर इतिहास लेखक हैदर मलिक, नारायण कौल और बीरबल कचरू हस्तिवंज ही नाम देते हैं। उसे पीर पंजाल पर्वतमाला में ही स्थित करते हैं। स्टीन ने स्वयं सितम्बर १८६१ में इस स्थान की यात्रा की थी। उसने वहाँ स्थान तथा लोक- श्रुति का पता लगा लिया था। उसने वहाँ का विस्तृत वर्णन टोपो ग्राफी पीर पन्तसाल मार्ग जे० ए० एस० पी० १८९५ पृष्ठ ३७६ पर दिया है। पुराने मुगल मार्ग का वर्णन किया है। हूरपुर अर्थात् शूरपुर (३:२१७) से यह मार्ग कुछ दूर तक रामम्यार नदी के दक्षिण तट के साथ चलता है। फिर मार्ग यह ऊँचाई पार करता वाम अथवा उत्तरी तट पर चलता पुरानी मुगल सराय जिसे 'अलियाबाद' कहते हैं पहुँचता है। दक्षिणी पार्श्व के संकुचित मार्ग के दूसरी तरफ लगभग आध मील अलियाबाद के अधो- भाग में एक ऊँची पर्वतीय ऊर्ध्व भूमि मिलती है। वहाँ से कगार की चट्टान ढालुआ होती नदी के पेटा में मिल जाती हैं। यह झुकी हुई ऊर्ध्वभूमि हस्तिभंज का स्थान कहा जाता है। यहाँ के सभी लोग इस बात को दुहराते हैं। एक राजा का हाथी यहाँ से नीचे खड्ड में गिर गया था। राजा का नाम उन्हें नही मालूम है। हाथी स्वयं गिरा था। अथवा गिरा दिया गया था। यह भी उन्हें मालूम नहीं है। अकबर के सड़क बनवाने के पहले मार्ग हस्तिवंज टीले पर से रामम्यार नदी के दक्षिण तट से जाता था। आइने अकबरी में अबुल फजल भीमबर से काश्मीर के अनेक मार्गों का वर्णन करता है। वह हस्तिवंज (हस्तिवतर) का उल्लेख अलग करता है (२:७१३०)। यह पूर्वकालीन मार्ग था। अकबर की सेना इसी मार्ग से काश्मीर पहुँची थी। पीर पंतसल का मुगल मार्ग जो पोसियाना तथा यहराम गल्ला होकर जाता है वह दक्षिण से उस मार्ग से मिलता है। जो नन्दन सर के पास से दुरहाल दर्रा होता राजोरी जाता है। यहाँ से दक्षिण का मार्ग सीधा पड़ता है। इस मार्ग का लोग अब भी प्रयोग करते हैं। सन् १८४४ तथा १८१९ में सिक्खों ने अपने सैनिक अभियान के लिये इसी मार्ग को चुना था। यह मार्ग रामम्यार नदी के दक्षिण ओर हस्तिवंज के ऊपर होकर जाता है। इस प्रकार नदी पार नहीं करना पड़ता। सीमान्त प्राचीन द्वार अथवा डम्म का स्थान क्रमावर्त में था। (रा० त० ३:२२७)। इस स्थान
३१६ राजतरंगिणी
को स्टीन ने कामरेन क्रीट से पहचाना है। यह वर्तमान द्वार स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण में है। हस्तिवंज से लगभग ३ मील नीचे अर्थात् अधोभाग में है। इससे प्रगट होता है कि पुराना द्वार जिसका उल्लेख श्लोक २०२ में कल्हण ने किया है। उसी दिशा में रहा होगा।
हस्तिवंज जिस मार्ग से पार किया जाता है। यह ऊँचाई पर चढ़ता, धान वाले ढाल से पूर्व की ओर टाँके के पश्चिम पड़ता है। आज भी इस उपे- क्षित मार्ग पर जानवरों पर सामान लादकर ले जाया जा सकता है।
हस्त्यंज नाम से ही प्रकट होता है। स्थान का सम्बन्ध हस्ती अर्थात् हाथियों से रहा होगा। पर्शियन वृत्तान्तरो से पता चलता है। 'वंज' शब्द का अर्थ 'गमन' अर्थात् चलना है। पश्चिमी पंजाबी में वंज माने 'चलना' आज भी प्रयुक्त होता है।
अलिहाबाद सराय श्रीनगर से ४६ मील दूर होगी। पीर पंतशाल या पंजाल दर्रा (संकट) के पड़ाव का स्थान है। मुगलों के समय यह सराय थी। आश्रय प्रदान का काम करती थी। जंगल में है। शीतकाल में हिमाच्छादित हो जाता है। समुद्र की सतह से ११८०० फुट ऊँचा है।
मनीपर्त्ती पर्वत शिखर लगभग १६००० फुट ऊँचा है। कोसर नाग दर्रे पर स्थित कश्मीर की सबसे बड़ी झील है।
इसका प्राचीन नाम क्रमोत्सर है। शिखर का नाम कौन्सरंग है। कोसरंग तीर्थ का वर्णन महाभारत के वन पर्व १८४:५० में दिया गया है। इस शिखर पर मत्स्य भगवान् के सींग से बाँधकर नौका सत्यव्रतो ने बाँधा था। यह शिखर बनिहाल की पश्चिम दिशा में है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, - तीन शिखर हैं। सबसे सबसे ऊँचा शिखर १५५३३ फुट है। इसी प्रसिद्ध कौन्सरा तीर्थ है।
बसुदेव चरित्र के अनुसार तथा हरदत्त सूरी के मत से कथा मिलती है। नाव से दुष्टों प्राणियों के संहार से रक्षा निमित्त उत्पन्न हुई थी। 'महाभारत वन पर्व १८४:५०, नीलमत ३३, हरचरित चिंतामणि ४:२७, ग्रोवर १:१७४, सर्वविस्तार ३:४,१२; ४:१७४, नौबन्धन माहात्म्य )
यह समुद्र की सतह से १३००० फुट ऊँचाई पर है। झील दो मील लम्बी है। झील के चारों ओर हिमालय की अत्यन्त शोभनीय पर्वतमालाएँ तथा शिखर हैं। उनमें ३ शिखर १५००० फुट ऊँचे हैं। वे कौसर नाग सर को जैसे निरन्तर नीचे की ओर देखती रहती हैं। 'पंचाल' ईरानी शब्द है। कश्मीरी में उसे पंतसल कहते हैं। इसका अर्थ होता है यात्रियों के लिए जल का प्रबन्ध । 'पोतला' अथवा 'पौसरा' से इस शब्द का मेल खाता है। पोतला, पोसरा, प्याऊ, सबील, एक ही शब्द के समानार्थक भिन्न नाम हैं। उनका सम्बन्ध पानी से है। पंचाल शब्द के लिए पन्तशाल शब्द का प्रयोग किया गया है। पंचाल महाभारत में एक जनपद के लिए प्रयुक्त किया गया है। (भीष्म पर्व ९ ४१ १८४७)
मैंने इस स्थान को देखा है। यदि ऊपर अर्थात् भारत से आने वाले मार्ग से श्रीनगर की ओर चला जाय तो इस अंचल का सर्व प्रथम प्राचीन स्थान पुष्यान्नाद मिलेगा। यह वर्तमान पूशियान है। तत्पश्चात् पंचाल धारा पड़ेगी। अनन्तर हस्तिवंज और फिर उसके बाद उतराई पर क्रमावर्त्त, द्रग एवं शूरपुर पड़ेगा। शूरपुर को आज कल हुरपूर कहते हैं। तत्पश्चात् प्राचीन दे- ग्राम, नगछोल, मिनार और शुपियान पड़ता है। शुपियान के पश्चात् श्रीनगर और विजयेश्वर तक समथर भूमि मिलने लगती है।
अलिहाबाद सराय रामम्यार नदी के वाम तट पर खड़े ऊँचे पहाड़ के मूल में स्थित है। नवम्बर से अप्रैल तक तुषार से ढँका रहता है। यहाँ उस समय कोई नहीं आता। यह उजड़े, निर्जन स्थान में उपेक्षित पड़ा है। यात्रियों का निवास स्थान प्रवेश द्वार से दूसरी तरफ के आहाते के पश्चिम पार्श्व में है। इमारत भयंकर रूप में गंदी है। उसमें गिरती
[Page Header] प्रथम तरंग ३१७
[Column 1] तथा दरवाजे तक नही लगे हैं । सराय की अपेक्षा इसे अस्तबल कहना ठीक होगा । फिर भी तूफान में इससे रक्षा की जा सकती है । यह इतना ठण्डा तथा डरावना है कि यहाँ पर किसी प्रकार का सामान नही मिलता । सराय के चारो तरफ कैम्प लगाने लायक स्थान हैं । नदी के तट के समीप यहाँ हैजे द्वारा सन् १८७६ मे मरे अल्फ्रेड जान बले एस० डी० की कब्र है । इस सराय पर पहुचने के पूर्व रामम्यार नदी के दक्षिणी तट परे एक स्रोतस्विनी इससे मिलती है । उसे लद्दी नाला कहते हैं । इसके तट से मार्ग नन्दन सर तथा भगसर को जाता है । इन सरों मे राजोरी से दरहल दर्रा से होकर पहुंचा जा सकता है । वहा दो-तीन पडाव डाल कर पैदल पहुंचा जाता है । यहा जाने के लिए बरमगल्ला या पोशियन या हुर- पुर से सामान आदि ले लेना चाहिए । रावलपिण्डी से आने वाले मार्ग पर यह कश्मीर उपत्यका के सबसे समीपवर्ती पडने वाले सर हैं । बड़ी ऊँचाई पर होने के कारण स्थान शीतल, पथरीला तथा रहने योग्य नही है । कठिनता से जलोनी लकड़ी मिलती है । यहा कुछ उपज नही होती । कस्तूरी मृग अलियाबाद सराय के ऊँचे पर्वती स्थानों में मिलते हैं । अलियाबाद में यात्रियो को नही ठहरना चाहिए । सराय से ६ मील दूर शंखोद में ठहरना चाहिए । कैम्प लगाने लायक स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण तट पर मिल जाता है । यहाँ से सुपियान एक दिन मे आया जा सकता है । कैप्टन नाइट ने सन् १८६० जून २७ में यहा की यात्रा की थी । वह अपनी पुस्तक में लिखता है—दो मील दर्रा से नीचे उतरने पर अलियाबाद सराय मिली । वहा पर रहने लायक एक भाग था जिससे एक फकीर या मुल्ला रहता था । और एक युवक बंगाली तोपची जो शिकार खेलने आया था रहता था ! लगभग मध्याह्न काल मे पानी बरसने लगा । वहाँ एक कष्टप्रद रूम में बचाव के
[Column 2] लिए गया । वहाँ की फर्श सीलन से भरी थी । वहाँ पत्थर के बहुत ही सुन्दर संगतराशी की एक खिडकी थी । वहाँ की शेष इमारतों से वह मेल नही खाती थी । सराय के बीच में हरा जल से भरा एक गड्डा था । पृष्ठ ७१ डब्ल्यु०डब्ल्यु० अल्फ्रेड (१८७५) संक्षेप मे केवल इतना कहता है । पोशियन से अलियाबाद सराय आया जाता है । दोनो के मध्य में दूरी ११ मील है । एक दिन मे मार्ग खत्म किया जा सकता है । मुख्य दर्रा पीर पंजाल का यहाँ से पार किया जाता है । वह ऊँचो और खडी चढ़ाई है । चढाई ऊँचाई पर टेढा मेढा घोर पहाड का किनारा काटकर कर मार्ग बनाया गया है । मार्ग काफी अच्छा है । परन्तु कही कही पर बडे बड़े पत्थरों के ढोको और असम्बन्धित पत्थरो के कारण उवड खाबड है । मुझे बड़ा आश्चर्य मालूम होता था कि कैसे खच्चूँ । खच्चड लदे हुए एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर बिल्ली की तरह कूदने हुए चलते थे । ऊपर की चढ़ाई धीमी पड़ जाती है । पेत- शिया से प्रस्थान करने पर चार घण्टे में शिखर पर पहुँचते हैं । जहाँ से पाशियाना ६ मील पीछे छूट जाता है । शिविर उतराई क्रमश: सरल दूर्वाच्छादित प्लेटो पर से आरम्भ हो जाती है । ५ मील लम्बा तथा आठ मिल चौड़ा मार्ग ५ मील चलकर अलियाबाद सराय पहुंचा देता है । यह यात्रियों के लिए एक साधारण आश्रम स्थान है । यह एकाकी एक निर्जन स्थान में खडा है । वर्ष के अधिक महीनो में वह वीरान पड़ा रहता है । क्योकि बर्फ के कारण यहाँ पहुँचना कठिन हो जाता है । बादशाह ( औरंगजेव ) पीर पंजाल पर्वत पर चढ रहे थे । वह पहाडो में सबसे ऊँचा था । वहाँ से कश्मीर का दृश्य मिल जाता है । बादशाह के पीछे हाथियो की लम्बी कतार थी । जिनमें महिलाएँ थी । हौदों तथा अम्बारियो में बैठी थी । पहला हाथी लम्बी चढ़ाई देखकर भयभीत हो गया । वह पीछे
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[Left Column] तथा दरवाजे तक नहीं लगे हैं। सराय की अपेक्षा इसे अस्तबल कहना ठीक होगा। फिर भी तूफ़ान में इसमें रक्षा की जा सकती है। यह इतना ठण्डा तथा डरावना है कि यहाँ पर किसी प्रकार का सामान नहीं मिलता। सराय के चारों तरफ कैम्प लगाने लायक स्थान है। नदी के तट के समीप यहाँ हैजे द्वारा सन् १८७६ में मरे अल्फ्रेड जान वले एस० टी० की कब्र है। इस सराय पर पहुंचने के पूर्व रामम्बार नदी के दक्षिणी तट परे एक स्रोतस्विनी इससे मिलती है। उसे लट्टी नाला कहते हैं। इसके तट से मार्ग नन्दन सर तथा भगसर को जाता है। इन सरों में राजौरी से दरहल दर्रा से होकर पहुंचा जा सकता है। वहां दो-तीन पड़ाव डाल कर पैदल पहुंचा जाता है। यहां जाने के लिए बरमगल्ला या पोशियन या हुर- पुर से सामान आदि ले लेना चाहिए। रावलपिण्डी से आने वाले मार्ग पर यह कश्मीर उपत्यका के सबसे समीपवर्ती पड़ने वाले सर हैं। बड़ी ऊंचाई पर होने के कारण स्थान शीतल, पथरीला तथा रहने योग्य नहीं है। कठिनता से जलोनी लकड़ी मिलती है। यहाँ कुछ उपज नहीं होती। कस्तूरी मृग अलियाबाद सराय के ऊँचे पर्वतीय स्थाना में मिलते हैं। अलियाबाद में यात्रियों को नहीं ठहरना चाहिए। सराय से ६ मील दूर शादीद में ठहरना चाहिए। कैम्प लगाने लायक स्थान रामम्बार नदी के दक्षिण तट पर मिल जाता है। यहाँ से सुपियान एक दिन में जाया जा सकता है। कैप्टन नाइट ने सन् १८६० जून २७ में यहां की यात्रा की थी। वह अपनी पुस्तक में लिखता है—दो मील दर्रा से नीचे उतरने पर अलियाबाद सराय मिली। वहां पर रहने लायक एक भाग था जिसमें एक फकीर या मुल्ला रहता था। और एक युवक बंगाली तोपची जो शिकार खेलने आया था रहता था ! लगभग मध्याह्न काल में पानी बरसने लगा। वहीं एक कष्टप्रद रूम में बचाव के
[Right Column] लिए गया। वहाँ की फर्श सीलन से भरी थी। वहाँ पत्थर के बहुत ही सुन्दर संगतराशी की एक खिड़की थी। वहाँ की शेष इमारतों से वह मेल नहीं खाती थी। सराय के बीच में हरा जल से भरा एक गड्ढा था। पृष्ठ ७१ डब्ल्यू०डब्ल्यू० अटर्केड (१८७५) संक्षेप में केवल इतना कहता है। पोशियन में अलियाबाद सराय जाया जाता है। दोनों के मध्य में दूरी ११ मील है। एक दिन में मार्ग खत्म किया जा सकता है। मुख्य दर्रा पीर पंजाल का यहाँ से पार किया जाता है। वह ऊंची और खड़ी चढ़ाई है। चढ़ाई ऊंचाई पर टेढ़ा मेढ़ा घोर पहाड़ का किनारा काटकर कर मार्ग बनाया गया है। मार्ग काफी अच्छा है। परन्तु कहीं कहीं पर बड़े बड़े पत्थरों के ढोंकों और असम्बन्धित पत्थरों के कारण उबड़ खाबड़ है। मुझे बड़ा आश्चर्य मालूम होता था कि कैसे रहूँ। खच्चड लदे हुए एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर बिल्ली की तरह कूदते हुए चलते थे। ऊपर को चढ़ाई धीमी पड़ जाती है। पेत- शिया से प्रस्थान करने पर चार घण्टे में शिखर पर पहुँचते हैं। जहाँ से पोशियाना ६ मील पीछे छूट जाता है। शिविर उतराई क्रमशः सरल दूर्वाच्छादित प्लेटो दर से आरम्भ हो जाती है। ५ मील लम्बा तथा आठ मील चौड़ा मार्ग ५ मील चलकर अलियाबाद सराय पहुँचा देता है। यह यात्रियों के लिए एक साधारण आश्रम स्थान है। यह एकाकी एक निर्जन स्थान में खड़ा है। वर्ष के अधिक महीनो में वह वीरान पड़ा रहता है। क्योकि बर्फ के कारण यहाँ पहुँचना कठिन हो जाता है। वादशाह (औरंगजेब) पीर पंजाल पर्वत पर चढ़ रहे थे। वह पहाड़ों में सबसे ऊँचा था। वहाँ से कश्मीर का दृश्य मिल जाता है। बादशाह के पीछे हाथियों की लम्बी कतार थी। जिनमें महिलाएँ थीं। हौदों तथा अम्बारियो में बैठी थी। पहला हाथी लम्बी चढ़ाई देखकर भयभीत हो गया। वह पीछे
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हटा । उनके पीछे हटने पर पीछे वाले हाथी अपने पीछे वाले हाथी को धक्का दिये । इस प्रकार हट जाने के कारण पंक्ति में हाथियों ने अपने पिछले आने वाले को हटात् धक्का दिया । वहाँ चढ़ाई और मार्ग पतला था । घूम न सकने के कारण उस घबड़ाहट में १५ हाथी ऊँची चढ़ाई से नीचे गिर गये । उन पर बशी स्त्रियों में तीन मर गई । शेष इस लिए बच गयी कि वहाँ चढ़ाई बहुत ऊँची नहीं थी । हाथियो को बचाने का कोई उपाय नहीं था । हाथी जब अच्छी सड़क पर गिर जाते हैं उस समय भी उन्हें उठने में कष्ट होता है । हाथियों के गिरने के दो दिन पश्चात् हम लोग इस मार्ग से गुजरे । मैंने उन गरीब हाथियों को देखा कि उनमें कुछ अभी भी गूँड हिला रहे थे । बादशाही फौज जो एक ही पंक्ति से इस मार्ग से जा रही थी उसे बहुत असुवि- धाओं का सामना करना पड़ा था । शेष दिन तथा रात गिरे स्त्रियों तथा सामान बचाने मे लगाया गया।
हमें तीन चीजें स्मरण रहेंगी जब हम यहाँ से आ रहे थे । पहला तो यहाँ गरमी तथा ठंडक दोनों ऋतुओं का अनुभव एक ही घण्टा के बीच में हुआ । चढ़ते समय बड़ी धूप लगी और पसीना आने लगा । चोटी पर पहुँचने हो जमा बर्फ मिला । बर्फ काटकर जाने वाली फौज ने रास्ता बना दिया था । कुछ पानी वरसने लगा था । शरीर को चुभने वाली ठण्डी हवा चलने लगी थी ।
दूसरी चीज यह थी कि २०० कदम के बीच ही दो दिशाओं से एक साथ हवा चल रही थी । चोटी पर चढ़ने के समय यह उत्तर से बह रही थी । जब मैं उतरने लगा तो वह पीठ की तरफ अर्थात् दक्षिण से बहने लगी ।
तीसरी चीज यहाँ पर मुझमे एक फकीर से भेंट हुई । यह जहाँगीर के समय से यहाँ की चोटी पर रहता था । उसके धर्म के विषय में नहीं कहा जा सकता था कि वह किस धर्म का अनुयायी था। कहा जाता था कि वह अलौकिक बातें करता था । वह विचित्र बिजली पैदा कर देता था । हवा का तूफानं चला देता था । वह तुषार तथा वर्षा तक करा देता था ।
उसकी सफेद और घनी दाढ़ी बहुत लम्बी थी । वह बड़ी रुखाई तथा कड़ाहट के साथ भीख माँगता था । वह देखने में जंगली मालूम होता था । यह यात्रियो के एक पत्थर पर रखे गये कतार में मिट्टी के वरतन से पानी पी लेने के संकेत के साथ जल्दी से जल्दी चुपचाप चोटी छोड़कर चले जाने का इशारा करते हुए वहाँ ठहरने के लिए हाथ से मना करता था । वह उन लोगों पर बड़ा गुस्सा होता था जो हल्ला करते थे । मैं उसको गुफा में गया । आधा रुपया उसके हाथ पर रखा । उसको देखा कि मुखाकृति पर कुछ कोमलता आई है । उसने मुझे बताया कि यहाँ हल्ला करने से बड़ी भयंकर आंधी आती है । औरंगजेव ने उसकी सलाह पर बुद्धिमानी से काम लिया । फौज को जरदो तथा चुपचाप चले जाने का आदेश दिया । उसका पिता शाहजहाँ भी इसी प्रकार विवेक से काम लेता था। जहाँगीर ने एक बार उसके कहने के अनुसार काम नहीं किया और झाँझ तथा तुरही बजवाया । वह बड़ी कठिनता से विनाश होने से बच पाया । पृष्ठ ४०८-४१०
पुस्तक का सम्पादक इस पर नोट लिखता है कि आज कल भी कश्मीर के पर्वतों की चोटी पर स्थित पवित्र स्थानों पर यात्रा करने वाले मन्त्रादि तथा प्रार्थना नही करते जब कि वे बर्फ के किनारे पहुँचते हैं । क्योंकि वाणी की प्रतिध्वनि के अवालांच को अस्थिर कर देता है और उसके लपेट में कितने ही नर नारी नष्ट हो जाते हैं । नोट पृष्ठ ४१०
उक्त वर्णित फकीर की मजार सम्भवतः दरों की चोटी पर है । यहाँ बहुत यात्री अब भी आते हैं । कश्मीरी बहुत दूर से लाश दफनाने के लिए यहाँ लाते हैं। आज भी अठ्ठाहवे वॉच टावर के पास एक फकीर दिखाई पड़ता है । वह दर्रा की चोटी पर रहता है। यह यात्रियों को धूप, पानी तथा आवश्यक सामान देता है । नोट पृष्ट ४०९
प्रथम तरंग ३१९ स्पर्शोऽङ्गानि यथा वाचं कीर्तनं पापिनां तथा । संदूषयेदतो नोक्ता तस्यान्याऽपि नृशंसता ॥ ३०४ ॥ ३०४. जिस प्रकार पापियों का स्पर्श अंगों को दूषित करता है, उसी प्रकार पापियों का कीर्तन वाणी को सन्दूषित करता है। अतएव उसकी अन्य नृशंसता का वर्णन नही किया गया है। को वेत्त्यद्भुतचेष्टानां कृत्यं प्राकृतचेतसाम् । धर्मं सुकृतप्राप्तिहेतोः सोऽपि यदाददे ॥ ३०५ ॥ ३०५ अद्भुत चेष्टा करने वाले सामान्य चेतस प्राणियों के कृत्य को कौन जान सकता है, जबकि वे भी सुकृति प्राप्ति हेतु धर्म का आश्रय लेते हैं । श्रीनगर्यां हि दुर्बुद्धिर्विदधे मिहिरेश्वरम् । होलाडायां स मिहिरपुराख्यं पृथुपत्तनम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. उस दुर्बुद्धि राजा ने श्रीनगर में मिहिरेश्वर¹ तथा होलाडा² में मिहिरपुर³ नामक महा नगरों की स्थापना की।
आईने अकबरी में भी यह कहानी दी गयी है । मिहिरकुल लज्जाहीन क्रूर राजा था । स्वर्ग ने उसे इजाज़त नही दी थी कि वह काफी फतह करे । एक बार जब यह पर्वत से हस्तीवत्तर स्थान पर उतर रहा था तो एक हाथो फिसल कर गर्त में चला गया । मृत्युमुख कष्ट में पड़े हाथी का आर्तनाद सुनकर मिहिरकुल प्रसन्न हो गया । तुरन्त आदेश दिया कि एक सौ हाथी और उस स्थान पर ढकेल दिए जाएँ । बह क्रूर राजा उन हाथियों का करुण क्रन्दन सुनकर आनन्द विभोर हो उठा । वरनीयर कहता है कि औरंगजेब जब कश्मीर जा रहा था तो इस स्थान पर १५ हाथी नीचे गिर कर मर गये । विचित्र बात है कि सुंग-युन तथा यूनानी लेखक कोसमस दोनों ही हूणों की सेना में विशाल हाथीवाहिनी का वर्णन करते हैं । सुंगयुन सशस्त्र सुसज्जित ७०० शिक्षित हाथियों का वर्णन मिहिरकुल की सेना में करता है । कोसमस ने गोल्ला को युद्ध पर एक हजार से कम हाथियों के साथ जाते नही बहुता । पीर पंजाल का प्राचीन नाम पंचाल धारा है। यह कश्मीर को दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर स्थित है।
निम्नलिखित उल्लेख नीलमत पुराण में इसके सन्दर्भ मे आता है : तदा स्थापयते राजंस्तां च नावं जगद्गुरुः । मत्स्यरूपधरो विष्णुः शृङ्गे कृत्वापकंपयति ॥ आकृष्य नावं तां देवस्तस्मिन्पर्वतमस्तके । बद्ध्वा व्रजति भूपाल हाभिज्ञातां तद्गतिम् ॥ इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमं । नौबन्धनमिति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥ ६०-६३: 39-41 नानेतान् शिखरान्पश्य महाविष्णुमहेश्वरान् । नौबन्धशिखरं यत्तु स एव नृप शंकरः ॥ क्षेमेन्द्र कवि ने समयमातृका में वर्णन किया है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३०५ में 'वेत्यद्भुत' का पाठभेद 'वेत्युद्वृत्त' मिलता है । श्लोकसंख्या ३०६ में 'होलाडाया' का पाठभेद 'होलाढायां', 'होलाह्लायां', 'होलडाया' तथा 'होलाट्टायां' मिलता है।
३२० राजतरंगिणी अग्रहारानगृह्णिरे गान्धाराब्राह्मणास्ततः । समानशीलास्तस्यैव ध्रुवं तेऽपि द्विजाधमाः ॥ ३०७ ॥ ३०७. उसके समान शील वाले, ये द्विजाधम गान्धार¹ ब्राह्मणों ने उस राजा से अग्रहार ग्रहण किया । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ३०६ (१) मिहिरेश्वर : यह मन्दिर कहीं था श्लोकसंख्या ३०७ में 'गान्धारश्रा' या पाठभेद कुछ पता नहीं चलता । राजा मिहिरकुल ने अपने 'गान्धाराश्रा', मिलता है । नाम पर मिहिरेश्वर की स्थापना की । इससे पता ३०७ (१) गान्धार : काबुल उपत्यका या चलता है कि वह पूर्णतया शिवभक्त था । गान्धार एक प्रदेश था । इसमें अप्रहार, लम्बक (लघमान) कपिशा (काबुल तथा कोहिस्तान का उत्तरी (२) होल्हडा : प्राचीन हाल्दा अंचल अवन्तीपुर भाग) तथा पुरुषपुर (पेशावर) सम्मिलित थे । के दक्षिण दिशा में है। इसके पूर्व कटिहा, अवच्छेद, गान्धार के ब्राह्मणों का वर्णन महाभारत के वर्ण गोल तथा उत्तर में पर्वत और पश्चिम में वितस्ता पर्व में आता है। उनका वर्णन पंजाब के ब्राह्मणों के नदी पड़ती है। होलडा क्षेत्र इस समय वुलर साथ उनके मसनातनी आचार के सम्बन्ध में किया परगना नाम से विख्यात है । काश्मीर उपत्यका में गया है । महाभारत की बातो का ही समर्थन कल्हण वितस्ता के उत्तर- पूर्व दक्षिणत्तर तथा वीही परगना के वर्णन से मिलता है । कल्हण उन्हें द्विजाधम कहा के बीच में स्थित है । इसका प्रशासकीय केन्द्र थाल है। महाभारत काल में भी गान्धार ब्राह्मणों के है । लार अर्थात् लोहर तथा देवसर के सम्बन्ध में आचार उत्कृष्ट नही माने गये थे और लगभग ३ इसका पुनः उल्लेख आया है । रा० त० ८:३११५ । हजार वर्ष पश्चात् कल्हण ने उनकी निन्दा दूषित तरग ७।१२२८ के श्लोकों से प्रकट होता है कि यह तथा क्रूर मिहिरकुल द्वारा किए गए दान लेने के मदव राज्य मे था । मदव राज्य मराज़ है । काश्मीर कारण किया है । काश्मीर के ब्राह्मणों ने सम्भवतः उपत्यका का पूर्वीय भाग है। इसका स्थान रा० त० पापी तथा दुरात्मा के हाथों द्वारा प्रदत्त पाप धन रूप ८:१४३० के वर्णन से और स्पष्ट हो जाता है । राजा दान लेना अस्वीकार किया था । अतएव गैर जयसिंह के दो अधिकारी होल्डा के विद्रोही डामरों काश्मीरी अर्थात् गान्धार के ब्राह्मणों को दान देने की द्वारा घेर लिये गये थे । यह स्थान अवन्ति स्वामी का बात कहकर कल्हण काश्मीरी ब्राह्मणों के चरित्र की मन्दिर था । अवन्तीपुर मे था । अवन्तीपुर उत्तर पर- गौण रूप से प्रशंसा करता है । गना में है । रा० तरंगिणी (८:७३३,२८०८,३११५) नीलमत पुराण में गान्धार देश का उल्लेख से और समर्थन मिलता है । होलडा के डामर खूद्यवी मिलता है : अर्थात् खुव के डामरों के साथ दिखाये गये है । खुव दर्वाभिसार गन्धार जुहुण्डुङ्गास्त्वान खशान् । वीही परगना के समीप था । जोनराज के वर्णन तंगणान् माण्डवान् मद्रांश्चन्तर्गिरि बहिर्गिरीन् ॥ (श्लोक सं० ५४८) से मालूम होता है । ४०:५२२ (३) मिहिरपुर . स्थान का पता नहीं चला है । दार्वीभिसारगान्धारजालन्धरशका रसाः । इस नाम तथा इससे मिलते किसी अपभ्रंश नाम का तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिः बहिर्गिरिः ॥ कोई स्थान अभी तक नहीं पाया जा सका है । १३9:१८२
प्रथम तरंग ३२१ मेघागमः फणिभुजं प्रथितन्धकारः प्रीणाति हंसममलो जलदात्ययश्च । प्रीतेः समानरुचितैव भवेन्निमित्तं दातुः प्रतिग्रहकृतश्च परस्परस्य ॥ ३०८ ॥ ३०८. घोर अन्धकार वाले मेघ का आगमन मयूर को तथा जलद का निर्मल अन्त हंस को प्रसन्न करता है। क्यों कि दाता एवं ग्रहीता की समान रुचि ही परस्पर प्रेम का कारण होती है। स वर्षसप्ततिं भुक्त्वा भुवं भूलोकभैरवः । भूरिरोगादितवपुः प्राविशज्जातवेदसम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. वह भूलोक भैरव सत्तर वर्ष भूमि का भोग करके अत्यधिक रोग ग्रस्त होकर, अग्नि में प्रवेश किया। सोऽयं त्रिकोटिहा मुक्तो यः स्वात्मन्यपि निर्घृणः । देहत्यागेऽस्य गगनादुच्चचारैति भारती ॥ ३१० ॥ ३१०. इसके शरीर त्यागने पर गगन से यह भारती उच्चरित हुई—'त्रिकोटिहन्ता वह मिहिरकुल मुक्त हो गया, जिसने अपने शरीर पर भी दया नहीं की।'
उरुचः श्रोक्रणो वायुः शुक्लो मध्वणो यमः । मण्डक नासो गन्धारो नागः शूर्पारकिर्ध्वनिः ॥ 894:१०६४ विशेष द्रष्टव्य है-'गन्धार' पृष्ठ १०६ टिप्पणी श्लोक १:६५ पाठभेद : श्लोक संख्या ३०८ में 'त्ययश्च' का 'त्ययस्य' 'निमित्तम्' का 'नितान्तं' तथा 'ग्रहकृतश्च' का पाठभेद 'ग्रहहृतश्च' मिलता है। ३०९.(१) भूलोकभैरव : अष्ट भैरव निर्दिष्ट हैं, उनके नाम हैं—असितांग, रुद्र, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कुरुपति किंवा कपालिन्, भीषण एवं संहार। भैरव की गणना रुद्र गणों में होती है। भैरव वाराणसी नगर के क्षेत्रपाल (कोतवाल) हैं। लिंग पुराण वीरभद्र को ही भैरव का रूप मानता है। कालिका पुराण में भैरव स्तोत्र नामक मंत्र की विस्तृत व्याख्या उपलब्ध है। उसके अनुसार वारा- णसी अमुरभिध्यात राजा विजय भैरव का वंशज ४१ था। उसने खाण्डवी नगर को विध्वस्त कर खाण्डव वन निर्माण किया था। (कालिका पुराण ९२)। भैरव की उत्पत्ति की कथा लिंग पुराण (१:९८) में दी गयी है। एक समय विष्णु तथा ब्रह्मा गर्वोद्धत होकर भगवान् शंकर का अपमान करने लगे। शिव क्रुद्ध हुए। एक अत्यन्त भयानक शिवगण को उत्पन्न किया। वही भैरव हैं। उत्पन्न होते ही वाम कर की उंगली के नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट डाला। ब्रह्मा ने अपने पाँचवें मुख से शिव की निन्दा की थी। अतएव उसे ब्रह्म हत्या का पातक लग गया। शिव ने ब्रह्मा का कपाल भैरव को थमा दिया। आदेश दिया कि कपाल में भिक्षा मांगो। साथ ही शंकर ने ब्रह्म हत्या से एक स्त्री का निर्माण किया। और उसे भैरव का अनुकरण करने का आदेश दिया। अन्ततोगत्वा वाराणसी क्षेत्र में प्रवेश करने पर इसकी ब्रह्म हत्या दूर हो गयी। तत्पश्चात् ब्रह्मा का कपाल भैरव के हाथ से गिर गया। जिस स्थान पर
३२२ राजतरंगिणी इत्युचुर्यै मते तेषां स एव परिहारदः । खण्डयन्वीतघृणतामग्रहारादिकर्मभिः ॥ ३११ ॥ ३११. जो लोग इस प्रकार कहते थे, उनके मन मे था। परिहार देने वाले, उसी राजा ने अपनी निर्दयता को, अग्रहारादि कर्मों द्वारा खण्डित कर दिया था। आक्रान्ते दारदैर्भोट्टै म्लैच्छैरशुचिकर्मभि । विनष्टधर्मे देशेऽस्मिन्पुण्याचारप्रवर्तनम् ॥ ३१२ ॥ ३१२. दरदों, १ भोट्टों, २ म्लेच्छों ३ तथा अन्य अशुचि कर्मों द्वारा आक्रान्त इस विनष्टधर्म देश में उसने पुण्याचार का प्रवर्तन किया ।
--- (दो कॉलम में विभाजन) ---
[बायाँ कॉलम] गिर गया उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं । ( शिव० शत: ८ तथा स्कन्ध पुराण ३:१:२४) । [बायाँ कॉलम] भैरवी यातना काशी में एक प्रचलित शब्द है। काशी में मृत व्यक्ति को भैरव दो घड़ी में यातना देकर उसे मुक्ति दे देते हैं। इसी के आधार पर कहा जाता है कि काशी में मरने से मुक्ति होती है। [बायाँ कॉलम] कल्हण ने भू-लोक भैरव मिहिरकुल को कहा है। वह इतना भयंकर था कि काल स्वरूप भैरव तुल्य था। इस भूमि का अर्थात् मानव रूप यह भैरव था। [बायाँ कॉलम] पाठभेद : [बायाँ कॉलम] श्लोक संख्या ३१० में 'गगना' का पाठभेद 'गद्यना' मिलता है। [बायाँ कॉलम] ३१०. (१) भारती : इसका शाब्दिक अर्थ सरस्वती, वाणी, तथा वाणी की अधिष्ठात्री है। यहाँ पर कल्हणने आकाश वाणी के अर्थ में प्रयोग किया है। वह वाणी जो सुनाई पड़ती है। परन्तु कहने वाला दिखाई नहीं पड़ता । [बायाँ कॉलम] ३११. (१) खण्डित : दान की महिमा का वर्णन कल्हण यहाँ करता है। दान के द्वारा मिहिरकुल के नृशंस एवं निर्दयता पूर्ण कार्यों के दोषों किंवा पापों का मोचन हो गया था। यदि मिहिरकुल ने क्रूरता की तो उसने उपकार भी किया था। कल्हण उसके गुण एवं अवगुण दोनो चरित्रो का यहाँ चित्रण करता है ।
[दायाँ कॉलम] पाठभेद : [दायाँ कॉलम] श्लोक संख्या ३१२ में 'भोट्टै' का पाठभेद 'भोंट्टै' तथा 'भोट्टै' मिलता है। [दायाँ कॉलम] पादटिप्पणियाँ : [दायाँ कॉलम] ३१२. (१) दरद : कल्हण वर्णित दरद जाति आधुनिक दरद है। ये आर्य जातीय हैं। प्राचीन यूनानी लोगों को उनका ज्ञान था। ये इस समय भी सिंधु नदी के पश्चिम चित्राल और यासीन से गिलगिट, चिलास, बुंजी तथा कृष्णगंगा की उपत्यका में रहते हैं। उनका निवास स्थान काश्मीर के उत्तर दिशा में है। (रा० त० ७:११७१ तथा ८:२७०९) दरद के कुछ ग्रामों में विचित्र प्रथा है। धर्म परिवर्तन बहुत होता रहता है। बौद्ध माता-पिता का पुत्र मुसलमान और मुसलमान माता-पिता का पुत्र बौद्ध धर्मावलम्बी हो जाता है। इस ओर के दरदो में किसी भी धर्म के प्रति विशेष आस्था नही है। [दायाँ कॉलम] यूनानी इतिहास लेखक हिरोडोट्स के समय से आज तक दरदो के निवास स्थानों में सम्भवतः कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह कश्मीर की उपत्यका के उत्तरीय पर्वत माला में सुदूर पडता है। [दायाँ कॉलम] (२) भौट्ट : तिब्बत वंशीय जाति है। कश्मीर के पूर्व तथा पूर्व-उत्तर अर्थात् वर्तमान काश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र रुद्दाख पास तथा कुछ स्कर्दू में निवास करते हैं। जो जिला पास (रा० त० ८:२८८६) के वर्णन से मालूम होता है कि