राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 433, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८ राजतरंगिणी
हटा । उनके पीछे हटने पर पीछे वाले हाथी अपने पीछे वाले हाथी को धक्का दिये । इस प्रकार हट जाने के कारण पंक्ति में हाथियों ने अपने पिछले आने वाले को हटात् धक्का दिया । वहाँ चढ़ाई और मार्ग पतला था । घूम न सकने के कारण उस घबड़ाहट में १५ हाथी ऊँची चढ़ाई से नीचे गिर गये । उन पर बशी स्त्रियों में तीन मर गई । शेष इस लिए बच गयी कि वहाँ चढ़ाई बहुत ऊँची नहीं थी । हाथियो को बचाने का कोई उपाय नहीं था । हाथी जब अच्छी सड़क पर गिर जाते हैं उस समय भी उन्हें उठने में कष्ट होता है । हाथियों के गिरने के दो दिन पश्चात् हम लोग इस मार्ग से गुजरे । मैंने उन गरीब हाथियों को देखा कि उनमें कुछ अभी भी गूँड हिला रहे थे । बादशाही फौज जो एक ही पंक्ति से इस मार्ग से जा रही थी उसे बहुत असुवि- धाओं का सामना करना पड़ा था । शेष दिन तथा रात गिरे स्त्रियों तथा सामान बचाने मे लगाया गया।
हमें तीन चीजें स्मरण रहेंगी जब हम यहाँ से आ रहे थे । पहला तो यहाँ गरमी तथा ठंडक दोनों ऋतुओं का अनुभव एक ही घण्टा के बीच में हुआ । चढ़ते समय बड़ी धूप लगी और पसीना आने लगा । चोटी पर पहुँचने हो जमा बर्फ मिला । बर्फ काटकर जाने वाली फौज ने रास्ता बना दिया था । कुछ पानी वरसने लगा था । शरीर को चुभने वाली ठण्डी हवा चलने लगी थी ।
दूसरी चीज यह थी कि २०० कदम के बीच ही दो दिशाओं से एक साथ हवा चल रही थी । चोटी पर चढ़ने के समय यह उत्तर से बह रही थी । जब मैं उतरने लगा तो वह पीठ की तरफ अर्थात् दक्षिण से बहने लगी ।
तीसरी चीज यहाँ पर मुझमे एक फकीर से भेंट हुई । यह जहाँगीर के समय से यहाँ की चोटी पर रहता था । उसके धर्म के विषय में नहीं कहा जा सकता था कि वह किस धर्म का अनुयायी था। कहा जाता था कि वह अलौकिक बातें करता था । वह विचित्र बिजली पैदा कर देता था । हवा का तूफानं चला देता था । वह तुषार तथा वर्षा तक करा देता था ।
उसकी सफेद और घनी दाढ़ी बहुत लम्बी थी । वह बड़ी रुखाई तथा कड़ाहट के साथ भीख माँगता था । वह देखने में जंगली मालूम होता था । यह यात्रियो के एक पत्थर पर रखे गये कतार में मिट्टी के वरतन से पानी पी लेने के संकेत के साथ जल्दी से जल्दी चुपचाप चोटी छोड़कर चले जाने का इशारा करते हुए वहाँ ठहरने के लिए हाथ से मना करता था । वह उन लोगों पर बड़ा गुस्सा होता था जो हल्ला करते थे । मैं उसको गुफा में गया । आधा रुपया उसके हाथ पर रखा । उसको देखा कि मुखाकृति पर कुछ कोमलता आई है । उसने मुझे बताया कि यहाँ हल्ला करने से बड़ी भयंकर आंधी आती है । औरंगजेव ने उसकी सलाह पर बुद्धिमानी से काम लिया । फौज को जरदो तथा चुपचाप चले जाने का आदेश दिया । उसका पिता शाहजहाँ भी इसी प्रकार विवेक से काम लेता था। जहाँगीर ने एक बार उसके कहने के अनुसार काम नहीं किया और झाँझ तथा तुरही बजवाया । वह बड़ी कठिनता से विनाश होने से बच पाया । पृष्ठ ४०८-४१०
पुस्तक का सम्पादक इस पर नोट लिखता है कि आज कल भी कश्मीर के पर्वतों की चोटी पर स्थित पवित्र स्थानों पर यात्रा करने वाले मन्त्रादि तथा प्रार्थना नही करते जब कि वे बर्फ के किनारे पहुँचते हैं । क्योंकि वाणी की प्रतिध्वनि के अवालांच को अस्थिर कर देता है और उसके लपेट में कितने ही नर नारी नष्ट हो जाते हैं । नोट पृष्ठ ४१०
उक्त वर्णित फकीर की मजार सम्भवतः दरों की चोटी पर है । यहाँ बहुत यात्री अब भी आते हैं । कश्मीरी बहुत दूर से लाश दफनाने के लिए यहाँ लाते हैं। आज भी अठ्ठाहवे वॉच टावर के पास एक फकीर दिखाई पड़ता है । वह दर्रा की चोटी पर रहता है। यह यात्रियों को धूप, पानी तथा आवश्यक सामान देता है । नोट पृष्ट ४०९