भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ३१९ स्पर्शोऽङ्गानि यथा वाचं कीर्तनं पापिनां तथा । संदूषयेदतो नोक्ता तस्यान्याऽपि नृशंसता ॥ ३०४ ॥ ३०४. जिस प्रकार पापियों का स्पर्श अंगों को दूषित करता है, उसी प्रकार पापियों का कीर्तन वाणी को सन्दूषित करता है। अतएव उसकी अन्य नृशंसता का वर्णन नही किया गया है। को वेत्त्यद्भुतचेष्टानां कृत्यं प्राकृतचेतसाम् । धर्मं सुकृतप्राप्तिहेतोः सोऽपि यदाददे ॥ ३०५ ॥ ३०५ अद्भुत चेष्टा करने वाले सामान्य चेतस प्राणियों के कृत्य को कौन जान सकता है, जबकि वे भी सुकृति प्राप्ति हेतु धर्म का आश्रय लेते हैं । श्रीनगर्यां हि दुर्बुद्धिर्विदधे मिहिरेश्वरम् । होलाडायां स मिहिरपुराख्यं पृथुपत्तनम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. उस दुर्बुद्धि राजा ने श्रीनगर में मिहिरेश्वर¹ तथा होलाडा² में मिहिरपुर³ नामक महा नगरों की स्थापना की।

आईने अकबरी में भी यह कहानी दी गयी है । मिहिरकुल लज्जाहीन क्रूर राजा था । स्वर्ग ने उसे इजाज़त नही दी थी कि वह काफी फतह करे । एक बार जब यह पर्वत से हस्तीवत्तर स्थान पर उतर रहा था तो एक हाथो फिसल कर गर्त में चला गया । मृत्युमुख कष्ट में पड़े हाथी का आर्तनाद सुनकर मिहिरकुल प्रसन्न हो गया । तुरन्त आदेश दिया कि एक सौ हाथी और उस स्थान पर ढकेल दिए जाएँ । बह क्रूर राजा उन हाथियों का करुण क्रन्दन सुनकर आनन्द विभोर हो उठा । वरनीयर कहता है कि औरंगजेब जब कश्मीर जा रहा था तो इस स्थान पर १५ हाथी नीचे गिर कर मर गये । विचित्र बात है कि सुंग-युन तथा यूनानी लेखक कोसमस दोनों ही हूणों की सेना में विशाल हाथीवाहिनी का वर्णन करते हैं । सुंगयुन सशस्त्र सुसज्जित ७०० शिक्षित हाथियों का वर्णन मिहिरकुल की सेना में करता है । कोसमस ने गोल्ला को युद्ध पर एक हजार से कम हाथियों के साथ जाते नही बहुता । पीर पंजाल का प्राचीन नाम पंचाल धारा है। यह कश्मीर को दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर स्थित है।

निम्नलिखित उल्लेख नीलमत पुराण में इसके सन्दर्भ मे आता है : तदा स्थापयते राजंस्तां च नावं जगद्गुरुः । मत्स्यरूपधरो विष्णुः शृङ्गे कृत्वापकंपयति ॥ आकृष्य नावं तां देवस्तस्मिन्पर्वतमस्तके । बद्ध्वा व्रजति भूपाल हाभिज्ञातां तद्गतिम् ॥ इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमं । नौबन्धनमिति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥ ६०-६३: 39-41 नानेतान् शिखरान्पश्य महाविष्णुमहेश्वरान् । नौबन्धशिखरं यत्तु स एव नृप शंकरः ॥ क्षेमेन्द्र कवि ने समयमातृका में वर्णन किया है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३०५ में 'वेत्यद्भुत' का पाठभेद 'वेत्युद्वृत्त' मिलता है । श्लोकसंख्या ३०६ में 'होलाडाया' का पाठभेद 'होलाढायां', 'होलाह्लायां', 'होलडाया' तथा 'होलाट्टायां' मिलता है।