राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० राजतरंगिणी अग्रहारानगृह्णिरे गान्धाराब्राह्मणास्ततः । समानशीलास्तस्यैव ध्रुवं तेऽपि द्विजाधमाः ॥ ३०७ ॥ ३०७. उसके समान शील वाले, ये द्विजाधम गान्धार¹ ब्राह्मणों ने उस राजा से अग्रहार ग्रहण किया । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ३०६ (१) मिहिरेश्वर : यह मन्दिर कहीं था श्लोकसंख्या ३०७ में 'गान्धारश्रा' या पाठभेद कुछ पता नहीं चलता । राजा मिहिरकुल ने अपने 'गान्धाराश्रा', मिलता है । नाम पर मिहिरेश्वर की स्थापना की । इससे पता ३०७ (१) गान्धार : काबुल उपत्यका या चलता है कि वह पूर्णतया शिवभक्त था । गान्धार एक प्रदेश था । इसमें अप्रहार, लम्बक (लघमान) कपिशा (काबुल तथा कोहिस्तान का उत्तरी (२) होल्हडा : प्राचीन हाल्दा अंचल अवन्तीपुर भाग) तथा पुरुषपुर (पेशावर) सम्मिलित थे । के दक्षिण दिशा में है। इसके पूर्व कटिहा, अवच्छेद, गान्धार के ब्राह्मणों का वर्णन महाभारत के वर्ण गोल तथा उत्तर में पर्वत और पश्चिम में वितस्ता पर्व में आता है। उनका वर्णन पंजाब के ब्राह्मणों के नदी पड़ती है। होलडा क्षेत्र इस समय वुलर साथ उनके मसनातनी आचार के सम्बन्ध में किया परगना नाम से विख्यात है । काश्मीर उपत्यका में गया है । महाभारत की बातो का ही समर्थन कल्हण वितस्ता के उत्तर- पूर्व दक्षिणत्तर तथा वीही परगना के वर्णन से मिलता है । कल्हण उन्हें द्विजाधम कहा के बीच में स्थित है । इसका प्रशासकीय केन्द्र थाल है। महाभारत काल में भी गान्धार ब्राह्मणों के है । लार अर्थात् लोहर तथा देवसर के सम्बन्ध में आचार उत्कृष्ट नही माने गये थे और लगभग ३ इसका पुनः उल्लेख आया है । रा० त० ८:३११५ । हजार वर्ष पश्चात् कल्हण ने उनकी निन्दा दूषित तरग ७।१२२८ के श्लोकों से प्रकट होता है कि यह तथा क्रूर मिहिरकुल द्वारा किए गए दान लेने के मदव राज्य मे था । मदव राज्य मराज़ है । काश्मीर कारण किया है । काश्मीर के ब्राह्मणों ने सम्भवतः उपत्यका का पूर्वीय भाग है। इसका स्थान रा० त० पापी तथा दुरात्मा के हाथों द्वारा प्रदत्त पाप धन रूप ८:१४३० के वर्णन से और स्पष्ट हो जाता है । राजा दान लेना अस्वीकार किया था । अतएव गैर जयसिंह के दो अधिकारी होल्डा के विद्रोही डामरों काश्मीरी अर्थात् गान्धार के ब्राह्मणों को दान देने की द्वारा घेर लिये गये थे । यह स्थान अवन्ति स्वामी का बात कहकर कल्हण काश्मीरी ब्राह्मणों के चरित्र की मन्दिर था । अवन्तीपुर मे था । अवन्तीपुर उत्तर पर- गौण रूप से प्रशंसा करता है । गना में है । रा० तरंगिणी (८:७३३,२८०८,३११५) नीलमत पुराण में गान्धार देश का उल्लेख से और समर्थन मिलता है । होलडा के डामर खूद्यवी मिलता है : अर्थात् खुव के डामरों के साथ दिखाये गये है । खुव दर्वाभिसार गन्धार जुहुण्डुङ्गास्त्वान खशान् । वीही परगना के समीप था । जोनराज के वर्णन तंगणान् माण्डवान् मद्रांश्चन्तर्गिरि बहिर्गिरीन् ॥ (श्लोक सं० ५४८) से मालूम होता है । ४०:५२२ (३) मिहिरपुर . स्थान का पता नहीं चला है । दार्वीभिसारगान्धारजालन्धरशका रसाः । इस नाम तथा इससे मिलते किसी अपभ्रंश नाम का तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिः बहिर्गिरिः ॥ कोई स्थान अभी तक नहीं पाया जा सका है । १३9:१८२