राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३२१ मेघागमः फणिभुजं प्रथितन्धकारः प्रीणाति हंसममलो जलदात्ययश्च । प्रीतेः समानरुचितैव भवेन्निमित्तं दातुः प्रतिग्रहकृतश्च परस्परस्य ॥ ३०८ ॥ ३०८. घोर अन्धकार वाले मेघ का आगमन मयूर को तथा जलद का निर्मल अन्त हंस को प्रसन्न करता है। क्यों कि दाता एवं ग्रहीता की समान रुचि ही परस्पर प्रेम का कारण होती है। स वर्षसप्ततिं भुक्त्वा भुवं भूलोकभैरवः । भूरिरोगादितवपुः प्राविशज्जातवेदसम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. वह भूलोक भैरव सत्तर वर्ष भूमि का भोग करके अत्यधिक रोग ग्रस्त होकर, अग्नि में प्रवेश किया। सोऽयं त्रिकोटिहा मुक्तो यः स्वात्मन्यपि निर्घृणः । देहत्यागेऽस्य गगनादुच्चचारैति भारती ॥ ३१० ॥ ३१०. इसके शरीर त्यागने पर गगन से यह भारती उच्चरित हुई—'त्रिकोटिहन्ता वह मिहिरकुल मुक्त हो गया, जिसने अपने शरीर पर भी दया नहीं की।'
उरुचः श्रोक्रणो वायुः शुक्लो मध्वणो यमः । मण्डक नासो गन्धारो नागः शूर्पारकिर्ध्वनिः ॥ 894:१०६४ विशेष द्रष्टव्य है-'गन्धार' पृष्ठ १०६ टिप्पणी श्लोक १:६५ पाठभेद : श्लोक संख्या ३०८ में 'त्ययश्च' का 'त्ययस्य' 'निमित्तम्' का 'नितान्तं' तथा 'ग्रहकृतश्च' का पाठभेद 'ग्रहहृतश्च' मिलता है। ३०९.(१) भूलोकभैरव : अष्ट भैरव निर्दिष्ट हैं, उनके नाम हैं—असितांग, रुद्र, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कुरुपति किंवा कपालिन्, भीषण एवं संहार। भैरव की गणना रुद्र गणों में होती है। भैरव वाराणसी नगर के क्षेत्रपाल (कोतवाल) हैं। लिंग पुराण वीरभद्र को ही भैरव का रूप मानता है। कालिका पुराण में भैरव स्तोत्र नामक मंत्र की विस्तृत व्याख्या उपलब्ध है। उसके अनुसार वारा- णसी अमुरभिध्यात राजा विजय भैरव का वंशज ४१ था। उसने खाण्डवी नगर को विध्वस्त कर खाण्डव वन निर्माण किया था। (कालिका पुराण ९२)। भैरव की उत्पत्ति की कथा लिंग पुराण (१:९८) में दी गयी है। एक समय विष्णु तथा ब्रह्मा गर्वोद्धत होकर भगवान् शंकर का अपमान करने लगे। शिव क्रुद्ध हुए। एक अत्यन्त भयानक शिवगण को उत्पन्न किया। वही भैरव हैं। उत्पन्न होते ही वाम कर की उंगली के नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट डाला। ब्रह्मा ने अपने पाँचवें मुख से शिव की निन्दा की थी। अतएव उसे ब्रह्म हत्या का पातक लग गया। शिव ने ब्रह्मा का कपाल भैरव को थमा दिया। आदेश दिया कि कपाल में भिक्षा मांगो। साथ ही शंकर ने ब्रह्म हत्या से एक स्त्री का निर्माण किया। और उसे भैरव का अनुकरण करने का आदेश दिया। अन्ततोगत्वा वाराणसी क्षेत्र में प्रवेश करने पर इसकी ब्रह्म हत्या दूर हो गयी। तत्पश्चात् ब्रह्मा का कपाल भैरव के हाथ से गिर गया। जिस स्थान पर