राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
३२० राजतरंगिणी अग्रहारानगृह्णिरे गान्धाराब्राह्मणास्ततः । समानशीलास्तस्यैव ध्रुवं तेऽपि द्विजाधमाः ॥ ३०७ ॥ ३०७. उसके समान शील वाले, ये द्विजाधम गान्धार¹ ब्राह्मणों ने उस राजा से अग्रहार ग्रहण किया । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ३०६ (१) मिहिरेश्वर : यह मन्दिर कहीं था श्लोकसंख्या ३०७ में 'गान्धारश्रा' या पाठभेद कुछ पता नहीं चलता । राजा मिहिरकुल ने अपने 'गान्धाराश्रा', मिलता है । नाम पर मिहिरेश्वर की स्थापना की । इससे पता ३०७ (१) गान्धार : काबुल उपत्यका या चलता है कि वह पूर्णतया शिवभक्त था । गान्धार एक प्रदेश था । इसमें अप्रहार, लम्बक (लघमान) कपिशा (काबुल तथा कोहिस्तान का उत्तरी (२) होल्हडा : प्राचीन हाल्दा अंचल अवन्तीपुर भाग) तथा पुरुषपुर (पेशावर) सम्मिलित थे । के दक्षिण दिशा में है। इसके पूर्व कटिहा, अवच्छेद, गान्धार के ब्राह्मणों का वर्णन महाभारत के वर्ण गोल तथा उत्तर में पर्वत और पश्चिम में वितस्ता पर्व में आता है। उनका वर्णन पंजाब के ब्राह्मणों के नदी पड़ती है। होलडा क्षेत्र इस समय वुलर साथ उनके मसनातनी आचार के सम्बन्ध में किया परगना नाम से विख्यात है । काश्मीर उपत्यका में गया है । महाभारत की बातो का ही समर्थन कल्हण वितस्ता के उत्तर- पूर्व दक्षिणत्तर तथा वीही परगना के वर्णन से मिलता है । कल्हण उन्हें द्विजाधम कहा के बीच में स्थित है । इसका प्रशासकीय केन्द्र थाल है। महाभारत काल में भी गान्धार ब्राह्मणों के है । लार अर्थात् लोहर तथा देवसर के सम्बन्ध में आचार उत्कृष्ट नही माने गये थे और लगभग ३ इसका पुनः उल्लेख आया है । रा० त० ८:३११५ । हजार वर्ष पश्चात् कल्हण ने उनकी निन्दा दूषित तरग ७।१२२८ के श्लोकों से प्रकट होता है कि यह तथा क्रूर मिहिरकुल द्वारा किए गए दान लेने के मदव राज्य मे था । मदव राज्य मराज़ है । काश्मीर कारण किया है । काश्मीर के ब्राह्मणों ने सम्भवतः उपत्यका का पूर्वीय भाग है। इसका स्थान रा० त० पापी तथा दुरात्मा के हाथों द्वारा प्रदत्त पाप धन रूप ८:१४३० के वर्णन से और स्पष्ट हो जाता है । राजा दान लेना अस्वीकार किया था । अतएव गैर जयसिंह के दो अधिकारी होल्डा के विद्रोही डामरों काश्मीरी अर्थात् गान्धार के ब्राह्मणों को दान देने की द्वारा घेर लिये गये थे । यह स्थान अवन्ति स्वामी का बात कहकर कल्हण काश्मीरी ब्राह्मणों के चरित्र की मन्दिर था । अवन्तीपुर मे था । अवन्तीपुर उत्तर पर- गौण रूप से प्रशंसा करता है । गना में है । रा० तरंगिणी (८:७३३,२८०८,३११५) नीलमत पुराण में गान्धार देश का उल्लेख से और समर्थन मिलता है । होलडा के डामर खूद्यवी मिलता है : अर्थात् खुव के डामरों के साथ दिखाये गये है । खुव दर्वाभिसार गन्धार जुहुण्डुङ्गास्त्वान खशान् । वीही परगना के समीप था । जोनराज के वर्णन तंगणान् माण्डवान् मद्रांश्चन्तर्गिरि बहिर्गिरीन् ॥ (श्लोक सं० ५४८) से मालूम होता है । ४०:५२२ (३) मिहिरपुर . स्थान का पता नहीं चला है । दार्वीभिसारगान्धारजालन्धरशका रसाः । इस नाम तथा इससे मिलते किसी अपभ्रंश नाम का तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिः बहिर्गिरिः ॥ कोई स्थान अभी तक नहीं पाया जा सका है । १३9:१८२
प्रथम तरंग ३२१ मेघागमः फणिभुजं प्रथितन्धकारः प्रीणाति हंसममलो जलदात्ययश्च । प्रीतेः समानरुचितैव भवेन्निमित्तं दातुः प्रतिग्रहकृतश्च परस्परस्य ॥ ३०८ ॥ ३०८. घोर अन्धकार वाले मेघ का आगमन मयूर को तथा जलद का निर्मल अन्त हंस को प्रसन्न करता है। क्यों कि दाता एवं ग्रहीता की समान रुचि ही परस्पर प्रेम का कारण होती है। स वर्षसप्ततिं भुक्त्वा भुवं भूलोकभैरवः । भूरिरोगादितवपुः प्राविशज्जातवेदसम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. वह भूलोक भैरव सत्तर वर्ष भूमि का भोग करके अत्यधिक रोग ग्रस्त होकर, अग्नि में प्रवेश किया। सोऽयं त्रिकोटिहा मुक्तो यः स्वात्मन्यपि निर्घृणः । देहत्यागेऽस्य गगनादुच्चचारैति भारती ॥ ३१० ॥ ३१०. इसके शरीर त्यागने पर गगन से यह भारती उच्चरित हुई—'त्रिकोटिहन्ता वह मिहिरकुल मुक्त हो गया, जिसने अपने शरीर पर भी दया नहीं की।'
उरुचः श्रोक्रणो वायुः शुक्लो मध्वणो यमः । मण्डक नासो गन्धारो नागः शूर्पारकिर्ध्वनिः ॥ 894:१०६४ विशेष द्रष्टव्य है-'गन्धार' पृष्ठ १०६ टिप्पणी श्लोक १:६५ पाठभेद : श्लोक संख्या ३०८ में 'त्ययश्च' का 'त्ययस्य' 'निमित्तम्' का 'नितान्तं' तथा 'ग्रहकृतश्च' का पाठभेद 'ग्रहहृतश्च' मिलता है। ३०९.(१) भूलोकभैरव : अष्ट भैरव निर्दिष्ट हैं, उनके नाम हैं—असितांग, रुद्र, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कुरुपति किंवा कपालिन्, भीषण एवं संहार। भैरव की गणना रुद्र गणों में होती है। भैरव वाराणसी नगर के क्षेत्रपाल (कोतवाल) हैं। लिंग पुराण वीरभद्र को ही भैरव का रूप मानता है। कालिका पुराण में भैरव स्तोत्र नामक मंत्र की विस्तृत व्याख्या उपलब्ध है। उसके अनुसार वारा- णसी अमुरभिध्यात राजा विजय भैरव का वंशज ४१ था। उसने खाण्डवी नगर को विध्वस्त कर खाण्डव वन निर्माण किया था। (कालिका पुराण ९२)। भैरव की उत्पत्ति की कथा लिंग पुराण (१:९८) में दी गयी है। एक समय विष्णु तथा ब्रह्मा गर्वोद्धत होकर भगवान् शंकर का अपमान करने लगे। शिव क्रुद्ध हुए। एक अत्यन्त भयानक शिवगण को उत्पन्न किया। वही भैरव हैं। उत्पन्न होते ही वाम कर की उंगली के नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट डाला। ब्रह्मा ने अपने पाँचवें मुख से शिव की निन्दा की थी। अतएव उसे ब्रह्म हत्या का पातक लग गया। शिव ने ब्रह्मा का कपाल भैरव को थमा दिया। आदेश दिया कि कपाल में भिक्षा मांगो। साथ ही शंकर ने ब्रह्म हत्या से एक स्त्री का निर्माण किया। और उसे भैरव का अनुकरण करने का आदेश दिया। अन्ततोगत्वा वाराणसी क्षेत्र में प्रवेश करने पर इसकी ब्रह्म हत्या दूर हो गयी। तत्पश्चात् ब्रह्मा का कपाल भैरव के हाथ से गिर गया। जिस स्थान पर
३२२ राजतरंगिणी इत्युचुर्यै मते तेषां स एव परिहारदः । खण्डयन्वीतघृणतामग्रहारादिकर्मभिः ॥ ३११ ॥ ३११. जो लोग इस प्रकार कहते थे, उनके मन मे था। परिहार देने वाले, उसी राजा ने अपनी निर्दयता को, अग्रहारादि कर्मों द्वारा खण्डित कर दिया था। आक्रान्ते दारदैर्भोट्टै म्लैच्छैरशुचिकर्मभि । विनष्टधर्मे देशेऽस्मिन्पुण्याचारप्रवर्तनम् ॥ ३१२ ॥ ३१२. दरदों, १ भोट्टों, २ म्लेच्छों ३ तथा अन्य अशुचि कर्मों द्वारा आक्रान्त इस विनष्टधर्म देश में उसने पुण्याचार का प्रवर्तन किया ।
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[बायाँ कॉलम] गिर गया उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं । ( शिव० शत: ८ तथा स्कन्ध पुराण ३:१:२४) । [बायाँ कॉलम] भैरवी यातना काशी में एक प्रचलित शब्द है। काशी में मृत व्यक्ति को भैरव दो घड़ी में यातना देकर उसे मुक्ति दे देते हैं। इसी के आधार पर कहा जाता है कि काशी में मरने से मुक्ति होती है। [बायाँ कॉलम] कल्हण ने भू-लोक भैरव मिहिरकुल को कहा है। वह इतना भयंकर था कि काल स्वरूप भैरव तुल्य था। इस भूमि का अर्थात् मानव रूप यह भैरव था। [बायाँ कॉलम] पाठभेद : [बायाँ कॉलम] श्लोक संख्या ३१० में 'गगना' का पाठभेद 'गद्यना' मिलता है। [बायाँ कॉलम] ३१०. (१) भारती : इसका शाब्दिक अर्थ सरस्वती, वाणी, तथा वाणी की अधिष्ठात्री है। यहाँ पर कल्हणने आकाश वाणी के अर्थ में प्रयोग किया है। वह वाणी जो सुनाई पड़ती है। परन्तु कहने वाला दिखाई नहीं पड़ता । [बायाँ कॉलम] ३११. (१) खण्डित : दान की महिमा का वर्णन कल्हण यहाँ करता है। दान के द्वारा मिहिरकुल के नृशंस एवं निर्दयता पूर्ण कार्यों के दोषों किंवा पापों का मोचन हो गया था। यदि मिहिरकुल ने क्रूरता की तो उसने उपकार भी किया था। कल्हण उसके गुण एवं अवगुण दोनो चरित्रो का यहाँ चित्रण करता है ।
[दायाँ कॉलम] पाठभेद : [दायाँ कॉलम] श्लोक संख्या ३१२ में 'भोट्टै' का पाठभेद 'भोंट्टै' तथा 'भोट्टै' मिलता है। [दायाँ कॉलम] पादटिप्पणियाँ : [दायाँ कॉलम] ३१२. (१) दरद : कल्हण वर्णित दरद जाति आधुनिक दरद है। ये आर्य जातीय हैं। प्राचीन यूनानी लोगों को उनका ज्ञान था। ये इस समय भी सिंधु नदी के पश्चिम चित्राल और यासीन से गिलगिट, चिलास, बुंजी तथा कृष्णगंगा की उपत्यका में रहते हैं। उनका निवास स्थान काश्मीर के उत्तर दिशा में है। (रा० त० ७:११७१ तथा ८:२७०९) दरद के कुछ ग्रामों में विचित्र प्रथा है। धर्म परिवर्तन बहुत होता रहता है। बौद्ध माता-पिता का पुत्र मुसलमान और मुसलमान माता-पिता का पुत्र बौद्ध धर्मावलम्बी हो जाता है। इस ओर के दरदो में किसी भी धर्म के प्रति विशेष आस्था नही है। [दायाँ कॉलम] यूनानी इतिहास लेखक हिरोडोट्स के समय से आज तक दरदो के निवास स्थानों में सम्भवतः कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह कश्मीर की उपत्यका के उत्तरीय पर्वत माला में सुदूर पडता है। [दायाँ कॉलम] (२) भौट्ट : तिब्बत वंशीय जाति है। कश्मीर के पूर्व तथा पूर्व-उत्तर अर्थात् वर्तमान काश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र रुद्दाख पास तथा कुछ स्कर्दू में निवास करते हैं। जो जिला पास (रा० त० ८:२८८६) के वर्णन से मालूम होता है कि
प्रथम तरंग ३२३ दरस तथा लद्दाख के ऊँचे पर्वत भोट्ट तथा काश्मीर के मध्य जलच्छाया बनाता था । श्री जोनराज ने द्वितीय राजतरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । कल्हण वर्णित भोट्ट यही लोग थे । धनाम्बु प्राप्य भौट्टेभ्यः कश्मीरजनविक्रयात् । गज्जंन्नाशाः प्यधात्सर्वांस्तदा रिञ्चनवारिदः ॥१५८ भौट्टांल्लहरकोट्टान्तः पट्टचिक्यकौतुकान् । प्रत्यहं वचनोद्योगै रिञ्चनोऽपविसृष्टवान् ॥ १६७॥ ✕ ✕ ✕ स्वदेशे मन्त्रिणोस्तस्य कोट्टभट्टोदयश्रियः । समरेषु भरंवासीच्चन्द्रडामरलौलयोः ॥ ३९९ ॥ ✕ ✕ ✕ केवलं हृदयं शून्यं भौट्टानां नाभवत्तदा । भूमिपालभयावेशात् कोपोऽपि चिरमज्जितः ॥८२५॥ श्रीवर ने तृतीय अर्थात् जोनराज तरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । अथाशङ्क्या नृपः पापं शत्रूघात् कतिचिद्दिनैः । बहिर्निष्कासयामास भुट्टमार्गेण तं सुतम् ॥१:७१॥ ✕ ✕ ✕ कालेनादमखानेऽथ भुट्टान् जित्वा समागते । हाजियखानोऽकरोद्यात्राः लोहराद्रौ नृपाज्ञया ॥३:८२॥ ✕ ✕ ✕ पित्र्याः पैतामहा वापि विरुद्धा बन्धनेऽवसन् । भुट्टदेशं धिया तस्य तेषां निष्कासनं व्यधात् ॥३:३२ सम्मोह तन्त्र में भोट देश का उल्लेख किया गया है : ऐराकभोटीतचीन (मा) महाचीनस्तथैव च । नेपाल(लः) शीलहट्टश्च, गौडकोशलमगधाः ॥ -शक्ति संगम तन्त्र ३:७:३३ काश्मीरं तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवि ऐराकः परिकीर्तितः ॥ ३३ ॥ उक्त उल्लेखों से भोट देश का महाचीन, नेपाल, काश्मीर, कामरूप ऐराक के समीप वर्णन किया है । काश्मीर से कामरूप अर्थात् आसाम तक यह अंचल लम्बा था । मानसरोवर के दक्षिण था । इस प्रकार प्राचीन भोट्ट देश की सीमा उत्तर में मानसरोवर, दक्षिण में नेपाल, पूर्व में कामरूप किंवा आसाम तथा पश्चिम में काश्मीर था । वर्तमान तिब्बत का यह दक्षिणी भाग था । वर्तमान भूटान सिक्किम तथा तिब्बत का वह दक्षिणी भाग जो मानसरोवर के दक्षिण में पड़ता था, भोट देश में सम्मिलित समझा गया था । तिब्बती लोगों के लिए भोट्ट, भोटिया तथा भोट शब्द का प्रयोग किया गया है । कल्हण ने 'भुट्टराष्ट्राधवन' भोट्ट देश जाने वाले मार्ग जोजिला पास का नाम दिया है । (रा० त० ८:२८८७) (३) म्लेच्छ : यह सम्भवतः हूणों के लिये प्रयुक्त किया गया है जो सिन्धु महानद के उस पार रहते थे । किन्तु म्लेच्छ शब्द का रूप तथा उससे सम्बन्धित होने वाले लोगों की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है । मुद्राराक्षस अंक प्रथम (१:२) में चाणक्य कहता है-'यथा तस्य म्लेच्छराजबलस्य मध्यात् प्रधानतमाः पञ्च राजान' परया भक्त्या राक्षसमनुवर्तन्ते । ते यथा- कौलूतश्चित्रवर्मा मलयनरपतिः सिंहनादो नृसिंहः काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपुमहिमो सैन्धवः सिन्धुषेणः। मेघाक्षः पञ्चमोऽस्मिन् पृथुतुरगबलः पारसीकाधिराजो म्लेच्छ राज मलयकेतु की सेना के पाँच प्रमुख राजगण राक्षस के बड़े भक्त तथा अनुयायी थे । उनका नाम- कुलूतराज चित्रवर्मा, मलयनरेश सिंहनाद, काश्मीर के राजा पुष्कराक्ष, सिन्धु- देशाधिपति सिन्धुषेण, पारसीकाधिराज मेघाक्ष था । राक्षस छठवें अंक में मलयकेतु को म्लेच्छ कहता हैः-
३२२ राजतरंगिणी इत्यूचुर्ये मते तेषां स एव परिहारदः । खण्डयन्वीतघृणतामग्रहारादिकर्मभिः ॥ ३११ ॥ ३११. जो लोग इस प्रकार कहते थे, उनके मन मे था । परिहार देने वाले, उसी राजा ने अपनी निर्दयता को, अग्रहारादि कर्मों द्वारा खण्डित कर दिया था । आक्रान्ते दारदैर्भाट्टैर्म्लेंच्छैरशुचिकर्मभि । विनष्टधर्मे देशेऽस्मिन्पुण्याचारप्रवर्तनम् ॥ ३१२ ॥ ३१२. दरदों, १ भोट्टों, २ म्लेच्छों ३ तथा अन्य अशुचि कर्मों द्वारा आक्रान्त इस विनष्टधर्म देश मे उसने पुण्याचार का प्रवर्तन किया । गिर गया उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं । ( शिव० शत० ८ तथा स्कन्ध पुराण ३:१:२४) । भैरवी यातना काशी में एक प्रचलित शब्द है। काशी में मृत व्यक्ति को भैरव दो घड़ी में यातना देकर उसे मुक्ति दे देते हैं । इसी के आधार पर कहा जाता है कि काशी मे मरने से मुक्ति होती है । कल्हण ने भू-लोक भैरव मिहिरकुल को कहा है। वह इतना भयंकर था कि काल स्वरूप भैरव तुल्य था । इस भूमि का अर्थात् मानव रूप यह भैरव था। पाठभेद : श्लोक संख्या ३१० में 'गगना' का पाठभेद 'गखना' मिलता है । ३१०. (१) भारती : इसका शाब्दिक अर्थ सरस्वती, वाणी, तथा वाणी की अधिष्ठात्री है। यहाँ पर कल्हणने आकाश वाणी के अर्थ में प्रयोग किया है। वह वाणी जो सुनाई पड़ती है । परन्तु कहने वाला दिखाई नही पड़ता । ३११. (१) खण्डित : दान की महिमा का वर्णन कल्हण यहाँ करता है । दान के द्वारा मिहिर- कुल के नृशंस एवं निर्दयता पूर्ण कार्यों के दोषों किंवा पापो का मोचन हो गया था। यदि मिहिरकुल ने क्रूरता की तो उसने उपकार भो किया था । कल्हण उसके गुण एवं अवगुण दोनों चरित्रो का यहाँ चित्रण करता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३१२ में 'भौट्टै' का पाठभेद 'भोट्टै' तथा 'भट्टै' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३१२. (१) दरद : कल्हण वर्णित दरद जाति आधुनिक दरद है । ये आर्य जातीय है। प्राचीन यूनानी लोगों को उनका ज्ञान था। वे इस समय भी सिंधु नदी के पश्चिम चित्राल और यागीन से गिलगिट, चिलास, गुंजी तथा कृष्णगंगा की उपत्यका में रहते हैं। उनका निवास स्थान काश्मीर के उत्तर दिशा मे है। (रा० त० ७:११७१ तथा ८:२७०९) दरद के कुछ ग्रामो में विचित्र प्रथा है । धर्म परिवर्तन बहुत होता रहता है । बौद्ध माता-पिता का पुत्र मुसलमान और मुसलमान माता- पिता का पुत्र बौद्ध धर्मावलम्बी हो जाता है। इस ओर के दरदों में किसी भी धर्म के प्रति विशेष आस्था नहीं है । यूनानी इतिहास लेखक हिरोडोट्स के समय से आज तक दरदों के निवास स्थानों में सम्भवतः कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह कश्मीर की उपत्यका के उत्तरीय पर्वत माला में सुदूर पड़ता है। (२) भोट्ट : तिब्बत वंशीय जाति है। कश्मीर के पूर्व तथा पूर्व-उत्तर अर्थात् वर्तमान काश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र लद्दाख पास तथा कुछ स्कर्दू में निवास करते हैं । जो जिला पास (रा० त० ८:२८८६) के वर्णन से मालूम होता है कि
दरस तथा लद्दाख के ऊँचे पर्वत भोट्ट तथा काश्मीर के मध्य जलच्छाया बनाता था । श्री जोनराज ने द्वितीय राजतरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । कल्हण वर्णित भोट्ट यही लोग थे । धनाम्बु प्राप्य भोट्टेभ्यः कश्मीरजनथिक्रयान् । गञ्जेन्नाशाः व्यधात्सर्वास्तदा रिञ्चनयारिदः ॥१५८ भोट्टांल्लहरकोटान्तः पट्टविक्रय कौतुकान् । प्रत्यहं वचनोद्यौगै रिञ्चनोऽप्यभिसृष्टवान् ॥ १६७॥ ✕ ✕ ✕ स्वदेशे मन्त्रिणोस्तस्य कोटभट्टोदयधियोः । समरेषु भरश्वासीच्छङ्ग्रडामरलौल्योः ॥ ३९९ ॥ ✕ ✕ ✕ केवलं हृदयं शून्यं भोट्टानां नाभवत्तदा । भूमिपालभयावेशात् कोपोऽपि चिरसञ्चितः ॥८२५॥ श्रीवर ने तृतीय अर्थात् जोनराज तरङ्गिणी में भोट्टो का उल्लेख किया हैं । अथाशङ्क्या नृपः पापं तद्बधात् कतिचिद्दिनैः । बहिर्निष्कासयामास भुट्टमार्गेण तं सुतम् ॥१:७१॥ ✕ ✕ ✕ कालेनादमखानेऽथ भुट्टान् जित्वा समागते । हाजियरानेऽकरोद्यात्राः लोहराद्रौ नृपाज्ञया ॥१:८२॥ ✕ ✕ ✕ पित्र्याः पैतामहा वापि चिरुद्धा बन्धनेऽवसन् । भुट्टदेशं धिया तस्य तेषां निष्कासनं व्यधात् ॥३:३२ सम्मोह तन्त्र में भोट देश का उल्लेख किया गया है : ऐराकमोटांस्तथाचीन ( ना ) महाचीनस्तथैव च । नेपाल( ज्ञः ) शीलहट्टश्च, गौडकोशलमगधाः ॥ —शक्ति संगम तन्त्र ३:७:३३ काश्मीरं तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवि ऐराकः परिकीर्त्तितः ॥ ३६ ॥ उक्त उल्लेखों से भोट देश का महाचीन, नेपाल, काश्मीर, कामरूप ऐराक के समीप वर्णन किया है। काश्मीर से कामरूप अर्थात् आसाम तक यह अंचल लम्बा था । मानसरोवर के दक्षिण था । इस प्रकार प्राचीन भोट्ट देश की सीमा उत्तर में मानसरोवर, दक्षिण में नेपाल, पूर्व में कामरूप किंवा आसाम तथा पश्चिम मे काश्मीर था । वर्तमान तिब्बत का यह दक्षिणी भाग था । वर्तमान भूटान सिक्किम तथा तिब्बत का यह दक्षिणी भाग जो मानसरोवर के दक्षिण में पड़ता था, भोट देश में सम्मिलित समझा गया था। तिब्बती लोगो के लिए भोट्ट, भोटिया तथा भोट शब्द का प्रयोग किया गया है । कल्हण ने 'भुट्टराष्ट्राध्वन' भोट्ट देश जाने वाले मार्ग जोजिला पास का नाम दिया है । (रा० त० ८:२८८७) (३) म्लेच्छ : यह सम्भवतः हूणों के लिये प्रयुक्त किया गया है जो सिन्धु महानद के उस पार रहते थे । किन्तु म्लेच्छ शब्द का रूप तथा उससे सम्बन्धित होने वाले लोगो की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है । मुद्राराक्षस अंक प्रथम (१:२) मे चाणक्य कहता है—'यथा तस्य म्लेच्छराजबलस्य मध्यात् प्रधानतमाः पञ्च राजानः परया भक्त्या राक्षरामनुवर्त्तन्ते । ते यथा— कौलूतश्चित्रवर्मा मलयनरपतिः सिंहनादो नृसिंहः काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपुमहिमो सैन्धवः सिन्धुषेणः। मेघाक्षः पञ्चमोऽस्मिन् पृथुतुरगबलः पारसीकाधिराजो म्लेच्छ राज मलयकेतु की सेना के पाँच प्रमुख राजगण राक्षस के बड़े भक्त तथा अनुयायी थे । उनका नाम— कुलूतराज चित्रवर्मा, मलयनरेश सिहनाद, काश्मीर के राजा पुष्कराक्ष, सिन्धु- देशाधिपति सिन्धुषेण, पारसीकाधिराज मेघाक्ष था । राक्षस छठवें अंक में मलयकेतु को म्लेच्छ कहता है:—
३२४ राजतरंगिणी आर्यदेश्यान्स संस्थाप्य व्यतनोद्दारुणं तपः । संकल्प्य स्ववपुर्दाहं प्रायश्चित्तक्रियां व्यधात् ॥३१३॥ ३१३. आर्य देशीय१ जनों को संस्थापित कर, उसने दारुण तपस्या२ की । शरीर दाह३ का संकल्प करके प्रायश्चित्त कर्म किया । मलयकेतु पर्वतीय राजकुमार है । उसके साथी धर्माचरण त्यागी, निर्दय, परपीड़क, चण्ड, नित्य कुलूत आदि राजा पर्वतीय हैं। हिंसक तथा अविवेकी व्यक्ति म्लेच्छ है । कल्हण का वर्णन स्पष्ट इस ओर संकेत करता है 'मृच्छकटिकम्' नाटक में म्लेच्छों को अशुद्ध कि सीमा पर रहने वाले म्लेच्छादि काश्मीर में भाषा भाषी कहा गया है । उनका उच्चारण ठीक प्रवेश कर पुराने आचार को नष्ट कर दिये थे । म्लेच्छ नहीं होता था । (अंक ६) एवं काश्मीरियों का सम्पर्क इससे प्रकट होता है । पाठभेदः म्लेच्छ शब्द का अर्थ शुक्रनीति के समय घोर श्लोक संख्या ३१३ में 'देश्यान्' का पाठभेद रूप ले लिया था । आचार भ्रष्ट निकृष्ट तथा हेय 'देशान्' मिलता है । व्यक्तियों तथा वर्ग के लिये म्लेच्छ शब्द प्रयुक्त होने पादटिप्पणियाँ लगा था । समय के साथ शब्द के अर्थ तथा भाव ३१३ (१) आर्य देशीय : आर्यदेशीय ब्राह्मणों में परिवर्तन होता है । म्लेच्छ शब्द इसका एक के कश्मीर में बसाने का उल्लेख मिलता है । परन्तु उदाहरण है । 'आर्यदेशीय जनों' का यहाँ उल्लेख किया गया है । न जात्या ब्राह्मणश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न । मिहिरकुल, प्रतीत होता है, आर्यदेश अर्थात् कश्मीर न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥१:३८॥ के बाहर पंजाब आदि भारतीय भागों से सभी श्रेणियों जन्मना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और म्लेच्छ तथा वर्गों के जनों को लाकर कश्मीर में आबाद नहीं होते किन्तु गुण एवं कर्म के भेद के अनुसार किया था । होते हैं । (२) दारुण तपस्या : प्रतीत होता है, मिहिरकुल राजा को भी म्लेच्छ कहा गया है यदि वह योगी था । उसने दारुण तपस्या की थी । उसकी अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करता- तपस्या इतनी उग्र थी कि उसने स्वेच्छया आग में असत्यवादिनं गूढ़चारं न चैश्च शास्ति यः । प्रवेश किया । स यो म्लेच्छ इत्युक्तः प्रजाप्राणधनापहः ॥ १:१३६॥ राजा सिद्ध के प्रसंग में लिखा जा चुका है। असत्यवादी, गूढ़चारी का जो राजा शासन नहीं कि वह भी योगी था । उसने भी तपस्या की । करता वह प्रजा के प्राण एवं धन का अपहर्त्ता तत्पश्चात् सप्तलोक प्राण विसर्जन किया । म्लेच्छ है । यहाँ प्राण विसर्जन की प्रक्रिया अत्यन्त क्रूर तथा म्लेच्छ की एक और परिभाषा शुक्रनीति रोमांचित करने वाली है । मिहिरकुल का यह करती है- चरित्र वर्णन उसे योगियों की श्रेणी में रख देता है । त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणाः परपीड़काः । उसे सांसारिक माया व्याप्त नहीं थी । श्लोक संख्या चण्डाश्च हिंसका नित्यं म्लेच्छास्ते ह्यस्यविवेकिनः। ३१५ के वर्णन से प्रकट होता है । उसने छुरी,
प्रथम तरंग ३२५ अत एवाऽग्रहाराणां सहस्रं प्रत्यपादयत् । गान्धारदेशजातेभ्यो द्विजेभ्यो विजये श्वरे ॥३१४॥ ३१४. अतएव विजयेश्वर में उसने एक सहस्र अग्रहार गान्धार देशीय द्विजों^१ को दिया । क्षुरखङ्गासिधेन्वादिपूर्णे यः फलके तदा । वह्निप्रदीप्ते सहसा पर्यन्ते स्वां तनुं जहौ ॥३१५॥ ३१५. तत्पश्चात् उसने सहसा क्षुर, खड्ग, असिधेनु आदि से पूर्ण वह्नि प्रदीप्त फलक पर अपने शरीर^३ को डाल दिया ।
कृपाण, असि आदि जड़ित तपे तख्त पर अपना शरीर डाल दिया था । उसका शरीर गर्म तीक्ष्ण धार वाले वस्तुओ से छिद गया । गर्म लोहा घावो में घुस गया । उसे दारुण कष्ट दिया । इस प्रकार वह फलक पर जलता, घावों से छिदता, प्राण विसर्जन किया । यह कार्य साधारण नही है । उसके इस कार्य से प्रकट होता है । वह नृशंस होते भी कितना व्यक्तित्व सम्पन्न, प्रतिभाशाली, उग्र तेजस्वी पुरुष था । पादटिप्पणी : ३१४ (१) गान्धारदेशीय द्विज : काश्मीर के ब्राह्मणों से, प्रतीत होता है, मिहिरकुल अप्रसन्न था । अपनी इस अप्रसन्नता के प्रतीक स्वरूप, उसने द्विजाधम गान्धार ब्राह्मणोंको, जो कि आचार-हीन महाभारत काल से ही कहे जाते थे, प्रश्रय दिया । उन्हें दान देकर उनकी मर्यादा ऊपर उठाने का प्रयास किया । विजयेश्वर के उल्लेख से मालूम होता है । उन दिनों वह स्थान ब्राह्मणो तथा पुण्यकर्मियो का केन्द्र हो गया था । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३१५ मे 'धेन्वा' का 'धन्वादि' तथा 'क्षुर' का 'खर' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियां : ३१५ ( १ ) श्लोक ३१२-३१६ : एक मत है कि श्लोक ३१२ से ३१६ तक 'कुलकम्' है । श्री स्टीन ने ३१२ से ३१६ तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने ३१२ से ३१७ तक इन्हें 'कुलकम्' मानकर उनका एक साथ अनुवाद किया है । मैने यहाँ श्लोकों के प्रत्येक पदों को भिन्न मानकर अनुवाद किया है । यदि सबका एक साथ 'कुलकम्' समझ-कर अनुवाद किया जाय तो अनुवाद सरल तथा साहित्यिक दृष्टि से अच्छा और भाव प्रधान होगा । परन्तु प्रत्येक श्लोक के शाब्दिक अर्थो का तात्पर्य समझने में कठिनाई होगी । (२) असिधेनु : यहाँ पर छुरी के अर्थ में प्रयोग किया गया है । छोटी छुरी आदि को असि-धेनु कहते हैं । (३) शरीर : कल्हण ने यहाँ तीसरे उदाहरण से योग, साधन एवं मनोबल के कारण स्वतः शरीर त्यागने का वर्णन किया है। इसके पूर्व जलोक ने सपत्नीक तपस्या द्वारा तथा सिद्ध ने अपनी शिद्धता द्वारा शरीर त्याग किया था । मिहिरकुल ने अपने अद्भुत मनोबल के द्वारा शरीर त्याग किया । कल्हण ने यह तीसरा प्रकार स्वेच्छया शरीर त्याग का उपस्थित किया है । स्वतः आत्मदाह से प्राण विसर्जन करना प्राचीन काल से प्रचलित था । परन्तु यह आत्महत्या सनातनी विचार के अनुसार माना जायगा । बौद्ध देशों में आज-कल भी प्रचलित है । वीतनाम के
३२८ राजतरंगिणी द्वाभिसारगांधारजालंधरशकाः खसाः । तंगणा माण्डवाश्चैव धान्तगिरिर्यहिर्गिरिः १३९ = १८२ नौलमत में 'खशा' तथा 'खश' एक ही शब्द किंवा समानार्थक समझना चाहिए । कल्हण ने खशो का बहुत वर्णन किया है। उन्हें इस समय खख्खा भी कहते हैं । खखल मुसलमान भी है । उन्हें राजपूत मुसलमान भी कहा जाता है। राजतरंगिणी में अनेक स्थानो पर राजोरी अर्थात् राजपुरी का शासक खशो के राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना को खशा कहा गया है (रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६, १८६८, १८९५ ) । राजपुरी से पूर्व की ओर चलने पर आन्स नदी की ऊपरी उपत्यका मिलती है। इस नदी को अब पंजगव्वर कहते है। श्रीवर ने जोन राजतरंगणी में इसका उल्लेख किया है । पञ्चगह्वरजाः केचित् सिन्धूपत्यन्वयोदिताः । रशा म्लेच्छास्तथान्येऽपि रुरुधुः सर्वतो दिशः ॥ उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशों का निवास-स्थान कहा है। उससे पूर्व बाणशाल अर्थात् आधुनिक बानहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है। यही पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी (रा० त० ८ : १६६५) । राजतरंगिणी (८ : १७७ तथा १०७४) के वर्णन से प्रतीत होता है कि वह सब उपत्यका जो बनिहाल से चन्द्रभागा तक जाती है, जिसे अब 'विचलारी' कहते हैं, और जिसे पुरावृत्तिकार 'विशालटा' कहते है, खशों से आबाद थी । राजोरी के पूर्व अंचल को भी संज्ञा अनेक स्थानो पर पंचगह्वर नाम से दी गयी है ।... खशालय का भी वर्णन कल्हण ने (रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २९०, २९९) किया है। यहाँ भी खश जाति रहती थी। खशालय ही खैशाल की उपत्यका है। इसे कशेर भो कहते है। वह दक्षिण- पूर्व में मारवल पास से काश्मीर के एक कोने से होती किश्तवार तक चली जाती हैं। खशालय का पुराना नाम खशाली श्रीवर के अनुसार मालूम होता है (रा० त० ७:३९९ ) राज्यं नश्यति हप्यति याह्या खशालीनका । लोकः क्लिश्यति लुण्टिदाहकरणैश्चौरैः स्पकं पश्यति ॥ ४ : ४५२ ॥ मुद्राराक्षस नाटक में 'खश' को एक सैनिक जाति के रूप में चित्रित किया गया है। मलयकेतु ने चन्द्रसेन पर आक्रमण करने की जो योजना बनायी थी उनमें खस सेना को अग्रिम पंक्ति में रखा था । प्रस्थातव्यं पुरस्तात् खसमगधगणैर्गार्णमुव्यूह्य सैन्यै र्गान्धारैर्मध्यमाने सयवनपतिभिः संविधेयप्रपन्न । ( मुद्राराक्षस नाटक अंक ५) यहाँ महत्वपूर्ण बात मुद्राराक्षस में पांच पर्वतीय राजाओं में काश्मीर गजा का उल्लेख है। पाँचों पर्वतीय राजा मलयकेतु के पक्ष में थे। यहाँ यह विचारणीय है कि काश्मीरी सेना का नाम न देकर खस का उल्लेख किया गया है। खस काश्मीर में आवाद थे। वे बली थे। सेना में थे। युद्ध में भाग लेते थे । खस को अग्रभाग में; यवन, गान्धार, को मध्य, तथा पृष्ठ भाग में चेदि हूण एवं शक सेना रखी गयी थी। इससे प्रकट होता है । 'खस' वीर सैनिक थे । निपुण योद्धा थे । अन्यथा उन्हें अग्रिम पंक्ति में रखने का कोई अर्थ नही था । खस के सम्बन्ध में 'मृच्छकटिकम्' नाटक छठे अंक में चन्दनक के मुख से मिथ्या बात छिपाने के कारण अशुद्ध तथा स्फुट शब्द निकल जाने पर वह पकड़ा जाने लगा तो उसका स्पष्टीकरण करता कहता है- 'अरे को अप्पञ्चओ तुह ? वयं दक्खिणत्ता अव्वत्तभाषिणो खस-णत्ति खड़ो विलम्..................अणेअदेस भासाभिण्णा जहेट्ठं मत्त, आम 'दट्ठो दिट्ठा वा, अज्जौ अज्जेआ वा ।' खस, खत्ति आदि........... देश भाषा से अन- भिज्ञ होने के कारण मनमाना 'देखा गया' देखी गयी' 'आर्य या भार्या' आदि बोला करते हैं।
प्रथम तरंग । ३२९
राजपुरो से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा रा० त० ६ : ३१२ में वर्णित वृन्त मे एक व्यक्ति तुंग खस मिलता है। वह चरवाहा था। रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया। (रा० त० ७ : ७७३) प्रतीत होता है। तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् काश्मीर के राजा हुए थे। उन्हें निम्न समझा जाता था। खस लोगो की भाषा परिष्कृत नही थी। वे अशुद्ध बोलते थे। इससे प्रतीत होता है वे विशेष सुसंस्कृत नही थे। वे पर्वतीय थे। नगर निवासियो के समान व्याकरण शुद्ध भाषा बोलन के आदी नही थे। खशालय काश्मीर उपत्यका के पूर्व दक्षिण वर्तमान उदिल क्षेत्र है। वह क्षेत्र भृंग तथा शाहाबाद अंचल के पूर्व दक्षिण ओर पड़ेगा। बक्री बल तथा मरबल पास इसके पश्चिम में पड़ेंगे। इसका वर्णन शुक चौथी राजतरंगिणी में करता है। 'खशालयस्थं चक्रेशं त्रिसृष्टस्तैर्महात्मभिः । लेखहारस्तमाह स्म मार्गेश मुखवाचिकम् ॥ शुक० रा० : २ : २ : ३५ वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खस रहते थे। वोराका को खसो का एक केन्द्र कहा गया है। (रा० त० ८ : ४०९) यह स्थान प्राचीन दृशद्वती के समीप था। दृशद्वती को इस समय द्वारावेशी कहते है। वितस्ता उपत्यका का यह भाग कधाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। आधुनिक खक्ख जाति और खस एक ही है। काश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय प्रायः सरदार इसी जाति के हैं। खक्ख शब्द खस का अपभ्रंश है। वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार सिख राज आगमन के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे। अपने पड़ोसी बोम्बा कबीले के साथ सख लोग काश्मीर के लिए एक समस्या हो गये थे। उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमामुद्दीन के समय में (१८४६) किया गया था, अभी तक लोगो को याद है। काश्मीर के मर्दुमशुमारी सन् १८९१ ई० के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ दी गई है। उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो का एक उपजाति लिखी गयी है। (पृष्ठ २०१) खश जाति का मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रिता जाति कहा गया है। अर्थात् यह जाति पर्वत में रहती थी। अतो देशान् प्रपश्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये। नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुमेणाः खशाः ॥
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- + गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् समान् ॥ ॥ ५७ : ५६ ॥ महाभारत सभा पर्व में भी खस जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शको तथा दरद जातियो तुल्य अर्ध सभ्य जाति में शामिल किया गया है। महाभारत सभा पर्व : (५१६ : १८४९) तथा (द्रोण पर्व ११ : ७९९ : १२१, ७)। सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर उल्लेख आता है । वे मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलदा नदी की उपत्यका में रहते थे। (सभा पर्व ५१ : १८४८; ५१ : १८४९)। शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकली है और पश्चिम सागर में गिरती है। (मत्स्य पुराण : १२० : ३३)। मनु ने उन्हें क्षत्री माना है। परन्तु ब्राह्मणो के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये। (मनुस्मृति १० : ४३ : ४)। उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं। मार्कण्डेय पुराण (३४६ : ३५०) के अनुसार उन्हें शल्य, नीप, शक और शूरसेन आदि जातियों के साथ रखा गया है। सेन तथा पालवंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है।
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३३० राजतरंगिणी [स्तम्भ १] बृहद् संहिता में—कुलूत, तंगण, खश, काश्मीरा उल्लेख किया गया है। (१० : १२)। ऋग्वेद सहिता (१ : ११७) में खस जाति का उल्लेख मिलता है। खसा : प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी। कश्यप प्रजापति को दी गयी थी। उससे यक्ष राक्षसादि हुए। मार्कण्डेय पुराण में ‘कुरवो गुर्गणा खसा:,’ ‘वायु पुराण में ‘क्षुपणास्त- ङ्गण खसा:’ ‘कुणपास्तगणा: खसा:,‘ ‘धुपनास्तङ्ग- णास्त्वसा:’ ‘क्षुपनास्तङ्कणा स्वसा:’। ब्रह्माण्ड पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा: खसा:,’ मत्स्यपुराण मे ‘कुपथा अपयास्तया’ वामन पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा खसा.’ कुपय किंवा अपथ हिमालय मे कोई स्थान था। खस देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है। मत्स्य पुराण में बर्बर तथा यवनों के साथ खसों का उल्लेख किया गया है। ‘बर्बरान् यवनान् खसान्’। वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में ‘पारदान, सौगनान्खसान्’ ‘पारदास्ताङ्गणान्खसान्’, ‘किम्पुरुषान् खसान्’ का उल्लेख पारद तङ्गण तथा किम्पुरुष के साथ आया है। द्रोण पर्व महाभारत में खस जाति का उल्लेख दरद आदि के साथ किया गया है। तैस्तु पुनर्व्याप्तमुखास्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः । अयोहस्ताः शूलहस्ता दरदास्तङ्गणाः खसाः ॥ ( १२१ । ४२ ) काशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति का नाम मगध तथा लोहित्य के साथ पूर्व दिशा मे रखा गया है। परन्तु यह काश्मीरी साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। अपितु आसाम खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो सकती है। अथवा खस जाति जिसका उल्लेख बंगाल के पाल राजाओं के शिला- लेखों में है वे ये जिनका आवागमन बंगाल, आसाम [स्तम्भ २] तक होता रहा है, अथवा कहीं यही आबाद रहे होंगे। शूद्राभीराश्च दरदाः काश्मीराःपशुभिः सह ।।६७।। खाशीराश्चान्तचाराश्च पद्गया गिरिगह्वराः । आत्रेयाः सभरद्वाजास्तथैव स्तनपोषिकाः ।। (भीष्मपर्व ९ : ६८ ) दरद और काश्मीर के साथ ही खस का उल्लेख किया गया है। खाशीर, खसा, खश एवं खस शब्द एक ही जाति के लिए प्रयुक्त किये गये हैं। (भीष्म पर्व ९ : ६८)। भागवत पुराण ( २ : ४ : १३ ) के अनुसार खस जाति पतित हो गयी थी परन्तु भागवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण ( २ : २६ : १४५ तथा ३ : ६९ १२० ) में उल्लेख आता है। विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। और वे म्लेच्छ माने गये। हरिवंश पुराण ( १४ ० ७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमे होकर चक्षु नदी बहती है। ( ब्रह्माण्ड पुराण २ : १६ : ४६ तथा मत्स्य पुराण १२१ : ४३, १४४ : ५७ ) वायु पुराण मे एक पर्वतीय जनपद कहा गया है। यहाँ खस के स्थान पर खश शब्द का प्रयोग किया गया है। वायुपुराण ( ४५ : ३१५ तथा ४७ : ४७,) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिला- लेख मे हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। हरिवंश पुराण ( १३ : २३-३४ ) में उल्लेख आता है। रघुवंशी राजा बाहु को हैहय तथा ताल- जंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद
प्रथम तरंग ३३१ अवतारयतस्तस्य चन्द्रकुल्याभिधां नदीम् । अशक्योन्मूलना मध्ये शिलाऽभूद्विघ्नकारिणी ॥ ३१८ ॥ ३१८. जबकि चन्द्रकुल्या१ नाम्नी नदी को राजा अवतारत२ कर रहा था, बीच में न हटनेवाली शिला विघ्नकारक हो गयी । ततः कृततपाः स्वप्ने देवैरुक्तः स भूपतिः । यक्षः शिलायां बलवान्ब्रह्मचार्यत्र तिष्ठति ॥ ३१९ ॥ ३१९. तदनन्तर उस राजा ने तपस्या की। स्वप्न में देवताओं ने उससे कहा—'बलवान् एवं ब्रह्मचारी यक्ष शिला पर आसीन है।' साध्वी स्पृशति चेदेनां निरोद्धुं न स शक्नुयात् । ततोऽपरेद्युः स्वप्नोक्तं शिलायां तेन कारितम् ॥ ३२० ॥ ३२०. 'यदि साध्वी स्त्री इस शिला का स्पर्श करे, तो वह यक्ष कार्य निरोध में असमर्थ होगा।' दूसरे दिन उसने स्वप्नोक्त क्रिया शिला पर करायी । तथा पल्लव की सहायता से बाहु तथा उसके राज्य को नष्ट कर दिया । ( १४ : ४ ) यवन, पारद, काम्बोज, पल्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं के विजय निमित्त पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि खसों की राज्य-व्यवस्था गणतन्त्रीय थी । खसो ने बाहू राजा तथा उसके राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नही लिया था क्योंकि ( १३ : ३० ) खस का उल्लेख नहीं आता । हैहय तथा तालजंघ राजो के साथ शको का उल्लेख है । उसने बाहू के राज्य को छीन लिया था। वही पर ( १४ : ४ ) केवल यह उल्लेख आता है कि पाचगण राज्य जिनमें खस भी एक गणराज्य था, हैहयों के लिए पराक्रम किया था । खस लोग शकों की तरह बाहु के राज्य को लेते हुए दिखाई नही देते । पादटिप्पणियाँ : ३१८ (१) चन्द्रकुल्या : मुहम्मद आजिम कहता है कि राजा मिहिरकुल ने चन्द्रकुल्या नहर बनवायी थी । उसके समय तक वह नहर वर्तमान थी । (२) अवतारित : श्री स्तीन तथा सीताराम पण्डित ने यहाँ जल प्रवाह को डाइवर्ट अर्थात् जल प्रवाह को मोडने का अर्थ किया है। अन्य अनु- वादकों ने भी विभिन्न अर्थ किये है । अतएव मैने यहाँ मूल 'अवतारित' शब्द दे दिया है। 'गंगावतरण' शब्द अत्यन्त प्रचलित है । भगीरथ ने गंगा का अवतरण किया था । कल्हण के मस्तिष्क में 'गंगावतरण' की बात रही होगी । भगीरथ की 'गंगा' के समान 'चन्द्र- कुल्या' को राजा मिहिरकुल अवतारित करा रहा था । यही भाव यहाँ प्रदर्शित किया है। कुल्या शब्द का अर्थ नहर, नाला एवं नाली होता है। कुल्या का मार्गावरोध शिला के कारण ( रा० त० १ : ३२० ३२१ ) हो गया था। जलावतरण नही हो रहा था। इससे प्रकट होता है कि चन्द्रकुल्याका राजा निर्माण करा रहा था । कुल्या शब्द का प्रयोग कल्हण ने ( रा० त० १ : ९७ ) सुवर्णमयी कुल्या के संदर्भ में किया है। कुल्या शब्द पर विशेष पृष्ठ १३० द्रष्टव्य है । २. ... : श्लोक संख्या ३१९ में 'यक्ष.' का पाठभेद 'यक्षा' तथा 'यक्षाः' मिलता है । श्लोकसंख्या ३२० में 'चेदेनां' का 'चेदेनं' तथा 'न स' का पाठभेद 'न च' मिलता है ।
३३२: राजतरंगिणी तासु तासु कुलस्त्रीषु व्यर्थयत्नास्वथाचलत् । चन्द्रवत्याख्यया स्पृष्टा कुलान्या सा महाशिला ॥ ३२१ ॥ ३२१. उन उन कुलीन स्त्रियों के यत्न व्यर्थ हो जाने पर, चन्द्रावती नाम्नी स्त्री के स्पर्श से वह महा शिला सचल हो गयी, १ । कोटित्रयं नरपतिः क्रुद्धस्तेनागसा ततः । सपतित्रातृपुत्राणामवधीत्कुलयोषिताम् ॥ ३२२ ॥ ३२२. इस अपराध के कारण क्रुद्ध नरपति ने तीन करोड़१ पति, भ्राता पुत्र सहित कुल योषिताओं का वध कर दिया। इत्थं चान्यमते ख्यातिः प्रथते तथ्यतः पुनः । अभव्या सनिमित्ताऽपि प्राणहिंसा गरीयसी ॥ ३२३ ॥ ३२३. अन्य लोगों के मत में यह ख्याति उपयुक्त है, किन्तु तथ्यतः सकारण भी इतनी बड़ी संख्या में प्राण हिंसा शोभनीय नही है। श्लोकसंख्या ३२१ में 'सा महा' का पाठभेद | शिला स्पर्श किया। आश्चर्यजनक घटना घटी। 'स महा' मिलता है। | पत्थर हट गया। राजा बीमार पड़ा। उसने स्वयं | अग्नि प्रवेश कर प्राणोत्सर्ग किया।' पादटिप्पणियाँ : | राजा मिहिरकुल की मृत्यु सन् ५३० ई० में | हुई। ३२१ (१) आइने अकबरी मे शिला उठाने की | कहानी का निम्नलिखित वर्णन किया गया है- | ३२२ (१) त्रिकोटि हून : मिहिरकुल का नाम "काश्मीर की एक नदी में एक बड़ा पत्थर उभड़ | (रा० त० १ : ३१०) त्रिकोटिहन दिया गया आया था। उससे नदी की धारा का अवरोध हो | है। उसने ३ करोड़ मानव का संहार किया था। गया था। दिन में पत्थर जितना काटा जाता था, | कल्हण के कथनानुसार मिहिरकुल का नाम तीन रात में उतना ही बढ़ जाता था। उसी समय आकाश- | कोटि लोगों के वध करने के कारण त्रिकोटिहन पड़ वाणी सुनाई दी-यदि कोई सती स्त्री पत्थर का | गया था। स्पर्श करे, तो शिला का लोप हो जायेगा। स्त्रियों | यूनानी इतिहासकार हिरोडटस ने भी फरोहा को शिला स्पर्श करने के लिए, आदेश प्रचारित | के सम्बन्ध में इसी प्रकार की एक कहानी का वर्णन किया गया। राज्य कर्मचारियों ने बहुत स्त्रियो को | किया है। शिला स्पर्श कराया। परन्तु शिला टस से मस न | ह्वेनसांग कहता है- 'तब ६ सौ हजार हुई। राजा मिहिरकुल बिगड़ा। उसने असती | उच्च कुल के लोगों को राजा मिहिरकुल ने शिन्त- स्त्री तथा उनके पति को असती स्त्री रखने के अप- | नदी के तट पर वध करवा दिया था। मध्यम राध में मृत्यु दण्ड दे दिया। उनके संतानों को वर्ण- | श्रेणी के लोगों को नदी में डुबवा दिया था '(१: संकर घोषित कर दिया। इस प्रकार तीस लाख | १७२ ग्यूकी)। लोग मार डाले गये। एक कुम्भकार की स्त्री ने |
प्रथम तरंग. ३३३ एवं क्षुद्रोऽपि यद्राजा संभूय न हतो जनैः । तत्कर्म कारयद्भिस्तद्दैवतैरथ रक्षितः ॥ ३२४ ॥ ३२४. क्षुद्र होते हुए भी उस राजा की प्रजा ने विप्लव द्वारा हत्या नहीं की क्योंकि वह उन्हीं देवताओं द्वारा रक्षित था, जिनकी प्रेरणा से उसने उन कर्मों को किया था। प्रजापुण्योदयैस्तीव्रैश्चिरात्तस्मिन्द्ययं गते । बकस्तत्प्रभवः पौरैः सदाचारोऽभ्यषिच्यत ॥ ३२५ ॥ बकः ३२५. प्रजा के तीव्र पुण्योदय के कारण उसके मरने पर, उसके पुत्र सदाचारी बक का पौर जनों ने अभिषेक किया । ३२४ (१) देवता : कल्हण यहाँ दैव सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। भाग्यवादी दैव में विश्वास करते हैं। उनका विश्वास है। सब कुछ दैवी प्रेरणा से होता है। मनुष्य केवल निमित्त मात्र है। साधन है। उसकी गतिविधियां पूर्व से ही सुनिश्चित रहती हैं। फलित ज्योतिष सिद्धान्त इसका सबसे बड़ा समर्थक है। यदि बातें पूर्व से ही सुनिश्चित न होतीं तो पचासों वर्ष पूर्व जन्म- कुण्डली में लिखी अथवा वर्षफल, जन्मफल की कही फलगणना और भविष्य की घटनायें किस प्रकार सत्य उतरतीं ? भाग्य एवं कर्म का विवाद बहुत पुराना है। आगे न बढ़कर यहाँ इतना ही लिखना अलम् होगा कि कल्हण ने मिहिरकुल के क्रूर कर्मों का प्रेरक दैव को ही माना है। जिसकी प्रेरणा से उसने क्रूर कर्मों को किया था उन्हींकी प्रेरणा से उसकी रक्षा भी हुई। जनता उसकी नृशंसताओं तथा उत्पीड़न से त्रस्त होने पर भी राजविद्रोह नहीं कर सकी। वह अछूता बच गया। उसकी हत्या करने का किसी ने प्रयास नहीं किया। कारण एकमात्र कल्हण यही देता है। जो प्रेरक शक्ति उसकी नृशंसताओं के लिए उत्तरदायी थी, उसी ने उसकी रक्षा की। जनता में विद्रोह, विप्लव की भावना एवं विचार उत्पन्न नहीं होने दिया। कवि दण्डी ने राजाओं के सम्बन्ध में दैवी शक्ति के विषय में 'दशकुमारचरितम्' में कहा है—"मदीयैर्विश्वास्य- तमैः पुरुषैः प्रभूतों।" (उपसंहार : १) पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२४ में 'बकस्त' का पाठभेद 'एकस्त' मिलता है। 'ए' तथा 'व' का भ्रम शारदा लिपि के प्रयोग के कारण हो गया है। पादटिप्पणियाँ : ३२५ (१) आइने अकबरी ने नाम बेक तथा उसका राज्यकाल ६३ वर्ष १३ दिन दिया है। श्री स्टीन के अनुसार लौकिक वर्ष २४४२ के चौथे मास में उसने राज्यारोहण किया था। श्री एस० वी० पण्डित ने यह समय ईशा पूर्व ६३७ वर्ष रखा है। हसन कहता है—'राजा बकने बाप के मरने के बाद क० २४०९ मे हुकूमत की। दुलहिन अदब व इन्साफ के जेवर से जैव व जीनत देनेवाला बना। बकाशुर के मुकाम पर अपने नाम पर एक स्वामी का मन्दिर निहायत उमदगी से तामीर किया। इसी तरह एक नहर अपने नाम खर्च कसीर से खुदवायी। शहर पूंछ उसीका आबाद किया हुआ है। चारो तरफ इसके इर्दगिर्द ऊंचे- ऊंचे पहाड़ हैं। इसके जमाने में एक जोगी औरत भटका नाम को पैदा हो गयी। उसके हुस्न व- जमाल को देखकर राजा का दिल बेकाबू हो गया। वह जादूगरनी एक दिन राजा को कुरबानी की रस्म
३३४ राजतरंगिणी तत्रापि पूर्वसंस्कारादुक्तत्रासं दधे जनः। श्मशानविहिते लोलावेश्मनीय नृपास्पदे ॥ ३२६ ॥ ३२६. श्मशान में बने लोलावेश्म सदृश पूर्व संस्कार के कारण उसके सिंहासन के सम्मुख भी लोग उक्त त्रास की आशंका से भय त्रस्त रहते थे। अतिसंतापदाज्जातं स जनाह्लादकोऽभवत् । जलौघा जलदश्यामाच्चापात्ययदिनादिव ॥ ३२७ ॥ ३२७. अति संतापदायी से उत्पन्न१ यह जन आल्हादक, उसी प्रकार हुआ, जैसे जलद द्वारा श्याम ग्रीष्मान्त दिन से उत्पन्न वृष्टि।
पर इसके आशनाओ और क़रीबी रिश्तेदारों समेत जय़ाफ़त पर ले गयी थी। इस औरत ने जादू के ज़ोर से उन तमाम को मार डाला। सिर्फ़ एक लड़का खिसो नन्द नाम का ज़िन्दा रहा। मुद्दत हुकूमत बासठ बरस ९ महीने।' (पृष्ठ ४९)। (२) पौरों द्वारा राज्याभिषेक : कल्हण इस स्थान पर नागरिकों द्वारा राजा चुनने की बात करता है। मालूम होता है कि मिहिरकुल के पुत्रों से किसी सदाचारी पुत्र को लोगों ने राजा बनाने का निश्चय कर उसे राजा बनाया। अन्यथा कल्हण यहाँ पर केवल यही लिखता कि मिहिरकुल का पुत्र उसके पश्चात् राजा हुआ। काश्मीर में प्रायः राजा का निर्वाचन प्राचीन काल में होता रहा है। राजतरंगिणी में वर्णन आता है कि यशस्कर ब्राह्मण को काश्मीर की परिषद् ने राजा चुना था। (रा० त० ५ : ४६९, ४७७)। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२६ में 'दुरुन्त्रासं' का 'मुक्तत्रास' 'दुक्ता त्रास' 'मुक्ता सन्द', मुक्त लासं', 'दुत्त्रांसं स' तथा दुरुन्त्रात्रासं' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२६ (१) नृपास्पद : यहाँ कल्हण ने सिंहा- सन नहीं 'नृपास्पद' शब्द का प्रयोग किया है। श्री स्तोम तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित आदि ने सिंहासन ही 'नृपास्पद' का अर्थ लगाया है। नृप+आस्पद मिलकर नृपास्पद शब्द बना है। नृप का अर्थ राजा और आस्पद का अर्थ स्थान, अधिष्ठान, इत्यादि होता है। यहाँ राजस्थान तथा राजा के बैठने की जगह अर्थात् अधिष्ठान भी हो सकता है। यहाँ पर सिंहासन की अपेक्षा राजा के स्थान करना अथवा उनके बैठकों के आसपास अर्थ अधिक कल्हण के समीप होगा। नृपास्पद शब्द का भावार्थ सिंहासन में आ जाता है। किन्तु यह शाब्दिक अर्थ के अधिक समीप नहीं है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२७ में 'अति' का 'अवि'; 'जातः' का 'जाताः', 'जनाह्लादको' का 'जनाः ह्लादको' तथा 'मात्तपा' का 'मोत्तापा', 'मातापा' और 'भात्तापा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२७ (१) संतापदायी : कल्हण यहाँ पर दूसरा उदाहरण संतापदायी राजा से उत्पन्न उत्तम तथा जन आह्लादक पुत्र का देता है। पहला उदा- हरण उसने नृशंस नर के पुत्र सिद्ध का दिया है, यहाँ दूसरा का उदाहरण भूलोकभैरव मिहिरकुल के पुत्र बक का देता है।
प्रथम तरंग ३३५ लोकान्तरादिवायातं मेने धर्मं तदा जनः । अभयं च परावृत्तं प्रवासाद्गहनादिव ॥ ३२८ ॥ ३२८. उस समय लोग धर्म १ को लोकान्तर से आया तथा अभय २ को चिर प्रवास से परावृत्त मानते थे । स वकेशं वकश्वभ्रे वकवत्यापगां तथा । कृत्वा पुरं परार्थ्यश्रीर्लवणोत्साभिधं व्यधात् ॥ ३२६ ॥ ३२६. उस अतुल श्री सम्पन्न राजा ने वकश्वभ्र में वकेश १ तथा वकावती आपगा २ का निर्माण करके लवणोत्स ३ नगर बनवाया । तत्र त्रिषष्टिर्वर्षाणां सत्रयोदशवासरा । अत्यवाह्यत भूपेन तेन पृथ्वीं प्रशासता ॥ ३३० ॥ ३३०. उस राजा ने वहां पृथ्वी का शासन करते' तिरसठ वर्ष तेरह दिन व्यतीत किया । २ ३२८ (१) धर्म का अर्थ यहाँ राज्य के विधि से है । जिसका आज कल प्रचलित शब्द कानून है । (२) अभय : शासन का फल अभय है । अभय उस समय जनता में होता है, जब शासन सुव्यवस्थित होता है । राज्यदण्ड का भय अवां- च्छनीय तत्त्वों को नियन्त्रण में रखता है । जनता में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार के भय का अभाव हो जाता है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२९ में 'वकेशं' का 'वकेशे' तथा 'कवश्वभ्रे' का पाठभेद 'वकः श्वभ्रे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२९ (१) वकेश तथा वकश्वभ्र : इन दोनो स्थानों का पता अभी तक नहीं चला है । कुछ स्थान मुझे बताये गये किन्तु वे भ्रामक हैं । ३२९ (२) वकावती आपगा : कल्हण न आपगा शब्द का यहाँ प्रयोग किया है। जिसका अर्थ नदी, सरित्, तरंगिणी, शैवालिनी, तटिनी, किंवा सरिता होता है । आपगेय का अर्थ नदी से उत्पन्न नहरादि होता है । यहाँ आपगा का अर्थ नहर माना जा सकता है । (३) लवणोत्स : श्रीनगर से भारत आने वाले मार्ग पर यह स्थान स्थित है । ( रा० त० ६:४६, ५७; ७:७६२, ७:१५३७, १६५८) । श्रीनगर से पूर्व काल में एक ही पड़ाव में लवणोत्स पहुँचा जा सकता था । पामपुर या पद्मपुर मार्ग में पड़ता था । विजये- श्वर के घेरा के सन्दर्भ में ( रा० त० ७-१५६७ तथा १६५८ ) लवणोत्स का वर्णन कल्हण ने किया है । उसमे प्रतीत होता है । विजयेश्वर तथा लवणोत्स में अधिक फासला नहीं था । श्रीनगर में बाहर से आने वाली एक सड़क पर लवणोत्स के होने का उल्लेख है । (रा० त० ५६,५७) । लवणोत्स वास्तव में किस स्थान पर था, अभी तक निश्चय नहीं हो सका है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'वासरा' का 'वासराम्' 'अत्यवाह्यत' का 'अभ्यवाह्यत' तथा 'अव्यग्राह्यत' और 'प्रशासता' का पाठभेद 'प्रशासता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३० (१) राज्यकाल : राजतरंगिणी राज्य काल ६३ वर्ष तेरह दिन स्पष्ट देती है । श्री रणजोत
३३४ राजतरंगिणी तत्रापि पूर्वसंस्कारादुक्तत्रासं दधे जनः । श्मशानविहिते लीलावेश्मनीव नृपास्पदे ॥ ३२६ ॥ ३२६. श्मशान में बने लीलावेश्म सदृश पूर्व संस्कार के कारण उसके सिंहासन के सम्मुख भी लोग उक्त त्रास की आशंका से भयभीत रहते थे । अतिसंतापदाज्जातं स जनाह्लादकोऽभवत् । जलौघा जलदश्यामात्तपात्ययदिनादिव ॥ ३२७ ॥ ३२७. अति संतापदायी से उत्पन्न' वह जन आह्लादक, उसी प्रकार हुआ, जैसे जलद द्वारा श्याम ग्रीष्मान्त दिन से उत्पन्न वृष्टि ।
पर इसके आशनाओ और क़रीबी रिश्तेदारो समेत जियाफ़त पर ले गयी थी । इस औरत ने जादू के जोरसे उन तमाम को मार डाला । सिर्फ एक लड़का खितो नन्द नाम का ज़िन्दा रहा । मुद्दत हुकूमत बासठ बरस ९ महीने ।' (पृष्ठ ४९ ) । (२) पौरों द्वारा राज्याभिषेक : कल्हण इस स्थानपर नागरिको द्वारा राजा चुनने की बात करता है । मालूम होता है कि मिहिरकुल के पुत्रो से किसी सदाचारी पुत्र को लोगो ने राजा बनाने का निश्चय कर उसे राजा बनाया । अन्यथा कल्हण यहाँ पर केवल यही लिखता कि मिहिरकुल का पुत्र उसके पश्चात् राजा हुआ । काश्मीर में प्रायः राजा का निर्वाचन प्राचीन काल में होता रहा है । राजतरंगिणी में वर्णन आता है कि यशस्कर ब्राह्मण को काश्मीर की परिषद् ने राजा चुना था । (रा० त० ५ : ४६९, ४७७ ) । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२६ में 'दुक्तत्रासं' का 'मुक्तत्रास' 'दुब्ता त्रास' 'मुक्ता सन्द', मुक्त तासं', 'दुत्त्रांसं स' तथा दुक्त्रात्रामं' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२६ (१) नृपास्पद: यहाँ कल्हण ने सिंहा- सन नहीं 'नृपास्पद' शब्द का प्रयोग किया है । श्री
स्तीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित आदि ने सिंहासन ही 'नृपास्पद' का अर्थ लगाया है । नृप + आस्पद मिलकर नृपास्पद शब्द बना है । नृप का अर्थ राजा और आस्पद का अर्थ स्थान, अधिष्ठान, इत्यादि होता है । यहाँ राजस्थान तथा राजा के बैठने की जगह अर्थात् अधिष्ठान भी हो सकता है । यहाँ पर सिंहासन की अपेक्षा राजा के स्थान करना अथवा उनके बैठकों के आसपास अर्थ अधिक कल्हण के समीप होगा । नृपास्पद शब्द का भावार्थ सिंहासन मे आ जाता है । किन्तु यह शाब्दिक अर्थ के अधिक समीप नही है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२७ में 'अति' का 'अपि'; 'जातः' का 'जाताः', 'जनाह्लादको' का 'जनाः ह्लादको' तथा 'मात्तपा' का 'मोत्तपा', 'मातापा' और 'मात्तापा' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२७ (१) संतापदायी : कल्हण यहाँ पर दूसरा उदाहरण संतापदायी राजा से उत्पन्न उत्तम तथा जन आह्लादक पुत्र का देता है । पहला उदा- हरण उसने नृशंस नर के पुत्र सिद्ध का दिया है । यहाँ दूसरा उदाहरण भूलोकभैरव मिहिरकुल के पुत्र बक का देता है ।
प्रथम तरंग ३३५ लोकान्तरादिवायातं मेने धर्मं तदा जनः । अभयं च परावृत्तं प्रवासाद्गहनादिव ॥ ३२८ ॥ ३२८. उस समय लोग धर्म १ को लोकान्तर से आया तथा अभय २ को चिर प्रवास से परावृत्त मानते थे । स वकेशं वकश्वभ्रे वकवत्यापगां तथा । कृत्या पुरं परार्ध्यश्रीर्लवणोत्साभिधं व्यधात् ॥ ३२६ ॥ ३२६. उस अतुल श्री सम्पन्न राजा ने वकश्वभ्र में वकेश १ तथा वकावती आपगा २ का निर्माण करके लवणोत्स ३ नगर बनवाया । तत्र त्रिषष्टिर्वर्षाणां सत्रयोदशवासरा । अत्यवाह्यत भूपेन तेन पृथ्वीं प्रशासता ॥३३० ॥ ३३०. उस राजा ने वहाँ पृथ्वी का शासन करते १ तिरसठ वर्ष तेरह दिन व्यतीत किया । १ ३२८ (१) धर्म का अर्थ यहाँ राज्य के विधि से है । जिसका आज कल प्रचलित शब्द कानून है । (२) अभय : शासन का फल अभय है । अभय उस समय जनता मे होता है, जब शासन सुव्यवस्थित होता है। राजदण्ड का भय अवां- च्छनीय तत्त्वो को नियन्त्रण में रखता है । जनता में आन्तरिक तथा बाह्य दोनो प्रकार के भय का अभाव हो जाता है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२९ में 'वकेशं' का 'वकेशे' तथा 'कवश्वभ्रे' का पाठभेद 'वकः श्वभ्रे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२९ (१) वकेश तथा वकश्वभ्र : इन दोनों स्थानों का पता अभी तक नहीं चला है। कुछ स्थान मुझे बताये गये किन्तु वे भ्रामक है । ३२९ (२) वकावती आपगा : कल्हण न आपगा शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । जिसका अर्थ नदी, सरित्, तरंगिणी, शैवालिनी, तटिनी, किंवा सरिता होता है। आपगेय का अर्थ नदी से उत्पन्न नहरादि होता है। यहाँ आपगा का अर्थ नहर माना जा सकता है । (३) लवणोत्स : श्रीनगर से भारत आने वाले मार्ग पर यह स्थान स्थित है । ( रा० त० ६:४६, ५७; ७:७६२, ७:१५३७, १६५८) । श्रीनगर से पूर्व काल में एक ही पड़ाव में लवणोत्स पहुँचा जा सकता था । पामपुर या पद्मपुर मार्ग में पड़ता था। विजये- श्वर के घेरा के सन्दर्भ में ( रा० त० ७:१५६७ तथा १६५८ ) लवणोत्स का वर्णन कल्हण ने किया है । उससे प्रतीत होता है । विजयेश्वर तथा लवणोत्स में अधिक फासला नहीं था । श्रीनगर में बाहर से आने वाली एक सड़क पर लवणोत्स के होने का उल्लेख है । (रा० त० ५६,५७) । लवणोत्स वास्तव में किस स्थान पर था, अभी तक निश्चय नहीं हो सका है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'वासरा' का 'वासराम्' 'अत्यवाह्यत' का 'अभ्यवाह्यत' तथा 'अभ्यनाह्यत' और 'प्रशासता' का पाठभेद 'प्रशासता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३० (१) राज्यकाल : राजतरंगिणी राज्य काल ६३ वर्ष तेरह दिन स्पष्ट देती है । श्री रणजोत
३३६ राजतरंगिणी अथ योगेश्वरी काचिद्भट्टाख्या रजनीमुखे । कृत्वा कान्ताकृतिं काम्यामुपतस्थे विशां पतिम् ॥ ३३१॥ ३३१. किसी समय रजनी मुख¹ काल मे कोई भट्टा नाम्नी योगेश्वरी² कमनीय कान्त आकृति धारण कर विशांपति (राजा)³ के समीप पहुँची। तया मनोहरैस्तैस्तैर्वचनैर्लपितस्मृतिः । स यागोत्सवमाहात्म्यं द्रष्टुं हृष्टो न्यमन्त्रयत ॥ ३३२ ॥ ३३२. अपने मनोहर तन्-तन् वचनों द्वारा नष्ट स्मृति एवं प्रसन्न राजा को यागोत्सव माहात्म्य देखने के लिये, उसने निमन्त्रित किया। पुत्रपौत्रशतोपेतः प्रातस्तत्र ततो गतः । चक्रवर्ती तया निन्ये देवीचक्रोपहारताम् ॥ ३३३ ॥ ३३३. तदुपरान्त, अपने शत पुत्र-पौत्रों सहित प्रातः काल वहाँ गये, चक्रवर्ती को उसने देवी चक्र¹ पर उपहार चढ़ा दिया।
सीताराम पण्डित अनुवाद में ६३ वर्ष १३ दिन देते हैं। किन्तु श्री एस. पी. पण्डित के लेख को ओरनजीत ने परिशिष्ट 'ए' पृष्ठ ५८१ पर उद्धृत किया है। उसके अनुसार राज्य काल केवल ६३ वर्ष आता है। तेरह दिन कम दिया है। कल्हण के पाठ का अनुवाद ही मैने यहाँ दिया है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३३१ में 'दृब्भट्टा' का पाठभेद 'दृट्ठा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३१ (१) रजनीमुख—यहाँ पर रजनीमुख शब्द का प्रयोग कल्हण ने सायंकाल अर्थात् रात्रि के प्रारम्भ काल के लिये किया है। (२) योगेश्वरी : इसका शाब्दिक अर्थ दुर्गा होता है। योग विद्या में प्रवीण मह्या के विशेषण रूप में योगेश्वरी शब्द का यहाँ प्रयोग किया गया है। साधारण योग सम्पन्न स्त्रियों को योगिनी कहते हैं उनमें श्रेष्ठ के लिये विशेषण योगेश्वरी लगाया जाता है—आठ विशेष देवियाँ योगिनी कही गयीं हैं— ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, नारायणी, वाराही, इन्द्राणी चामुंडा तथा महालक्ष्मी। (३) विशांपति : काश्मीर के राज्य संगठन का प्रकार समय समय पर बदलता रहा है। प्रथम इकाई देश थी। उसके पश्चात्, राज्य तत्पश्चात् विश्व का सबसे छोटा इकाई ग्राम था। राजा को यहाँ विशांपति कहा गया है। उसके नीच कर्मों के कारण कल्हण ने उसे राजा किंवा नृपति न कहकर विश्व का स्वामी कहा है। वह उससे बड़ा स्थान उसे नहीं देना चाहता है। विश्र्व तथा विषय का पदलालित्य के कारण यहाँ पर कल्हण ने अनुप्रास स्वरूप प्रयोग किया है। राजा को विषयपति न कहकर विश्वपति कहा है। दोनों क्रमशः मूर्धन्य ष तथा तालव्य श हैं इसके उच्चारण में भेद है। यदि शीघ्रता से कहा जाय तो उनका भेद समझना कठिन हो जाता है। विषय काश्मीर में परगना को कहते हैं। विश्: राज्य का एक प्रकार है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३३२ में 'र्लंपति' का 'ग्लपित' तथा 'म्यमन्त्रयत का' न्यमन्त्रयत् तथा 'न्यसंतयन' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३३ (१) देवीचक्र : मातृ चक्र का उल्लेख टिप्पणी १ : १२२ पृष्ठ पर किया गया है। यहाँ पर
प्रथम तरंग ३३७ कर्मेणा तेन सिद्धाया व्योमाक्रमणसूचकम् । जानुमुद्राद्वयं तस्या दृषदद्यपि दृश्यते ॥ ३३४ ॥ ३३४. उस कर्म द्वारा सिद्ध उस योगेश्वरी के व्योम गमन सूचक, दोनों जानुओं की मुद्रा, शिला पर आज भी देखी जाती है । देवः शतकपालेशो मातृचक्रं शिला च सा । खेरीमठेषु तद्वार्तास्मृतिमद्यापि यच्छति ॥ ३३५ ॥ ३३५. देव, शतकपालेश, मातृचक्र तथा वह शिला खेरी १ के मठों २ मे आज भी उस वार्ता की स्मृति दिलाती है । कल्हण देवीचक्र का उल्लेख करता है न कि मातृ- चक्र का । अतएव 'देवी' तथा 'मातृचक्र' में निश्चय उस समय अन्तर रहा होगा । अनुवादकर्ताओं ने इसका अनुवाद किया है कि देवीचक्रपर राजा को बलिदान कर दिया गया था । यहा पर बलि शब्द का प्रयोग न कर 'उप- हार' शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है । 'बलि' तथा 'उपहार' में अन्तर है । बंगाल में बलि चढ़े पशु के मांस को महाप्रसाद कहते हैं। शाक्त लोग 'प्रसाद' ही ग्रहण करते हैं । अन्य मांस उनके लिये वर्जित है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३४ में 'दृषदद्यपि का 'दृश- द्यदापि' तथा 'दृष्ट्यद्यापि' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३३५ में 'खेरीमठेषु' का 'क्षीर- मठेषु' तथा 'खैरेमठेषु' और 'यच्छति' का पाठभेद 'गच्छति' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३५ (१) खेरी : राजतरंगिणी के तरंग ८ : १२६८ श्रीवर ३ : १८७ तथा ४ : ४४८ से यह स्पष्ट हो गया है कि खेरी एक जिला का नाम था । इसे परगना खुरनार वाव कहते हैं । यह गुलाबगढ़ तथा पीर पन्तमल के मुह दर्रा की ढालुआ उपत्यका मे विसाऊ नदी तक फैला है । गाँव खुर सर्वेक्षण मानचित्र में कूरी दिखाया गया है । खुर तथा खेरी को समान उच्चारण के कारण एक नहीं कहा गया है । कल्हण ( रा० त० ४३ ८ : १२६० ) तथा श्रीवर ( ४ : ४४८ ) ने खेरी का उल्लेख परगना देबसरसा ( दिवशर ) और अर्धवान ( अदविन ) के सन्दर्भ में किया है। दोनों परगना विसाऊ नदी के उत्तर खुर नारवाव मे मिलते हैं । इसका प्रशासन विशेष रूप से किया जाता था । यह कल्हण के 'खेरी कार्य' शब्द प्रयोग मे प्रकट होता है । ( रा० त० ८.९६०, १११८, १४८२, १६२४ ) । सिख तथा डोगरा राजकाल में खुर नरवाव जागीर पुरानी प्रथा के अनुसार राजवंशियों को दी गयी थी । (२) मठ : कल्हण ने किस स्थान के लिए खेरो मठ शब्द का व्यवहार किया है कहना कठिन है । यहाँ से दरों तक पहुँचने के लिए चलता रास्ता है । सम्भव है । खेरो मठ इस भाग पर स्थित किसी धर्मशाला के लिए व्यवहृत किया गया है । श्रीवर कश्मीर के सुलतान हसन शाह के समय खेरी मे धर्मशाला स्थापित करने की बात कहता है ( ३ : १९० ) । श्रीवर के समय तक खेरी का महत्वपूर्ण स्थान था । वह स्पष्ट प्रकट हो जाता है । शाहाभिधास्य भार्यापि मठं सुकृतकर्मठम् । खेरीविषयमार्गान्तर्निर्ममे सप्रतिग्रहम् ॥ ३:१८७
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- + खैरी चार्थव्रजं राष्ट्रं भ्रातृमन्त्रिसखेव सा । अतापयन्महोष्माद्य प्रविष्टा कटकद्वयी ॥