राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३३७ कर्मेणा तेन सिद्धाया व्योमाक्रमणसूचकम् । जानुमुद्राद्वयं तस्या दृषदद्यपि दृश्यते ॥ ३३४ ॥ ३३४. उस कर्म द्वारा सिद्ध उस योगेश्वरी के व्योम गमन सूचक, दोनों जानुओं की मुद्रा, शिला पर आज भी देखी जाती है । देवः शतकपालेशो मातृचक्रं शिला च सा । खेरीमठेषु तद्वार्तास्मृतिमद्यापि यच्छति ॥ ३३५ ॥ ३३५. देव, शतकपालेश, मातृचक्र तथा वह शिला खेरी १ के मठों २ मे आज भी उस वार्ता की स्मृति दिलाती है । कल्हण देवीचक्र का उल्लेख करता है न कि मातृ- चक्र का । अतएव 'देवी' तथा 'मातृचक्र' में निश्चय उस समय अन्तर रहा होगा । अनुवादकर्ताओं ने इसका अनुवाद किया है कि देवीचक्रपर राजा को बलिदान कर दिया गया था । यहा पर बलि शब्द का प्रयोग न कर 'उप- हार' शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है । 'बलि' तथा 'उपहार' में अन्तर है । बंगाल में बलि चढ़े पशु के मांस को महाप्रसाद कहते हैं। शाक्त लोग 'प्रसाद' ही ग्रहण करते हैं । अन्य मांस उनके लिये वर्जित है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३४ में 'दृषदद्यपि का 'दृश- द्यदापि' तथा 'दृष्ट्यद्यापि' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३३५ में 'खेरीमठेषु' का 'क्षीर- मठेषु' तथा 'खैरेमठेषु' और 'यच्छति' का पाठभेद 'गच्छति' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३५ (१) खेरी : राजतरंगिणी के तरंग ८ : १२६८ श्रीवर ३ : १८७ तथा ४ : ४४८ से यह स्पष्ट हो गया है कि खेरी एक जिला का नाम था । इसे परगना खुरनार वाव कहते हैं । यह गुलाबगढ़ तथा पीर पन्तमल के मुह दर्रा की ढालुआ उपत्यका मे विसाऊ नदी तक फैला है । गाँव खुर सर्वेक्षण मानचित्र में कूरी दिखाया गया है । खुर तथा खेरी को समान उच्चारण के कारण एक नहीं कहा गया है । कल्हण ( रा० त० ४३ ८ : १२६० ) तथा श्रीवर ( ४ : ४४८ ) ने खेरी का उल्लेख परगना देबसरसा ( दिवशर ) और अर्धवान ( अदविन ) के सन्दर्भ में किया है। दोनों परगना विसाऊ नदी के उत्तर खुर नारवाव मे मिलते हैं । इसका प्रशासन विशेष रूप से किया जाता था । यह कल्हण के 'खेरी कार्य' शब्द प्रयोग मे प्रकट होता है । ( रा० त० ८.९६०, १११८, १४८२, १६२४ ) । सिख तथा डोगरा राजकाल में खुर नरवाव जागीर पुरानी प्रथा के अनुसार राजवंशियों को दी गयी थी । (२) मठ : कल्हण ने किस स्थान के लिए खेरो मठ शब्द का व्यवहार किया है कहना कठिन है । यहाँ से दरों तक पहुँचने के लिए चलता रास्ता है । सम्भव है । खेरो मठ इस भाग पर स्थित किसी धर्मशाला के लिए व्यवहृत किया गया है । श्रीवर कश्मीर के सुलतान हसन शाह के समय खेरी मे धर्मशाला स्थापित करने की बात कहता है ( ३ : १९० ) । श्रीवर के समय तक खेरी का महत्वपूर्ण स्थान था । वह स्पष्ट प्रकट हो जाता है । शाहाभिधास्य भार्यापि मठं सुकृतकर्मठम् । खेरीविषयमार्गान्तर्निर्ममे सप्रतिग्रहम् ॥ ३:१८७
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- + खैरी चार्थव्रजं राष्ट्रं भ्रातृमन्त्रिसखेव सा । अतापयन्महोष्माद्य प्रविष्टा कटकद्वयी ॥