राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ राजतरंगिणी देव्या कुलतरोः कन्दः क्षितिनन्दोऽवशेषितः । ततस्तस्य सुतस्त्रिंशद्वत्सरानन्वशान्महीम् ॥ ३३६ ॥ क्षितिनन्द— ३३६. देवी की कृपा से वंश वृक्ष का मूल क्षितिनन्द बच गया था । उस के पुत्र ने तीस वर्ष तक भूमि का शासन किया । द्वापञ्चाशतमब्दान्क्ष्मां द्वौ च मासौ तदात्मजः । अपासीद्वसुनन्दाख्यः प्रख्यातस्मरशास्त्रकृत् ॥ ३३७ ॥ वसुनन्द— ३३७. प्रसिद्ध कामशास्त्र² प्रणेता उसके पुत्र वसुनन्द ने बावन वर्ष दो मास³ धरती की रक्षा की ।
३३६ (१) आइने अकबरी में 'कुलनुन्द' नाम तथा उसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया गया है । हसन लिखता है—'राजा शितोनन्द क० २४८२ में अराकीन हुकूमत मुत्तफिक मशविरा से तख्त पर बैठा और तीस साल हुकूमत किया ।' (२) क्षितिनन्द : श्री स्टीन के अनुसार लौकिक संवत् २५०५ वर्ष ४ माह १३ वें दिन राज्य सिंहासन पर बैठा था । श्री एस० पी० पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व ५७४ वर्ष दिया है । वक का पुत्र नहीं था । सम्भव है राजा वक का सम्बन्धी रहा हो । क्योंकि राजा के पुत्र तथा पौत्र सभी भट्टा द्वारा बलि चढ़ा दिये गये थे । ३३७ (१) आइने अकबरी में 'विशनुन्द' नाम तथा उसका राज्यकाल ५२ वर्ष दो मास दिया गया है । श्री स्टीन के अनुसार लौकिक २५३५ वर्ष ४ मास १३ वें दिन राजा ने राज्यरोहण किया था । श्री एस० पी० पण्डित ने वह समय ईसा पूर्व ५४४ वर्ष दिया है । हसन—राजा वसुनन्द क० २५०२ में बाप के कायम मुकाम रौनक बख्श तख्त बादशाही हुआ । इन्तहाई राजा था । अक्लमन्द और बाहोश आदमी था । अक्लमन्द और आलिमों की कदर व मन्जिलत हद से ज्यादा करता था । किताबों से उस राजा का इश्क था । बावन बरस हुक्मरान रहकर आलम मे हमेशा के लिये रुख़सत हो गया । पृष्ठ ४० । (२) काम किंवा स्मरशास्त्र : वसुनन्द के इस प्रख्यात ग्रन्थ का अभी तक पता नहीं चला है । उसका उल्लेख अन्य ग्रन्थों में अवश्य मिलता है । स्मर का अर्थ, स्मृति, स्मरण, प्रेम, प्रणय तथा कामदेव होता है । स्मर एक राग भी है । स्मरशास्त्र का अर्थ कामशास्त्र होता है । मरीचि तथा उर्णा के पुत्रों में से वह एक था । किन्तु यहाँ पर अर्थ कामशास्त्र ही है । 'दशकुमार चरितम्' में दण्डी ने कामशास्त्र के लिये 'अनङ्ग विद्या का प्रयोग किया है । २ : ६ (३) राज्यकाल : श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अपने राजतरंगिणी के अनुवाद के पृष्ठ ५८१ पर श्री एस०पी० पण्डित के लेख को उद्धृत किया है । उनके अनुसार राज्यकाल केवल बावन वर्ष दिया गया है । दो मास और अधिक नहीं जोड़ा गया है । परन्तु श्री स्टीन तथा सीताराम पण्डित दोनों ने अनुवाद में ५२ वर्ष २ मास राज्यकाल का अनुवाद किया है । अतएव यहाँ भी मूल का अनुवाद जो ५२ वर्ष दो मास आता है दिया गया है ।