राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३३९ नरः षष्टिं तस्य सूनुस्तावतोऽब्दांश्च तत्सुतः । नृपनिभृद्दिभ्रुग्रामं योऽक्षवालमकारयत् ॥ ३३८॥ नर, अक्ष— ३३८. उसके पुत्र नर अक्ष२ ने साठ वर्ष शासन किया । उतने ही वर्ष ( साठ वर्ष ) उसके पुत्र अक्ष ने शासन किया । जिसने अक्षवाल३ ग्राम निर्माण कराया था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३८ में 'ग्रामं' का पाठभेद 'ग्रामो' तथा ,ग्रामं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३८ (१) आइने अकबरी में नाम 'नर' तथा उसका राज्य काल ६० वर्ष दिया गया है। श्री स्टीन के अनुसार राजा का अभिषेक लौकिक संवत् २६८७ वर्ष छठवा मास तेरहवें दिन हुआ था । श्री एम. पी. पण्डित ने यह काल ईसा पूर्व ४९१ वर्ष माना है। हसन लिखता है—'राजा नर बाप की वफात के बाद क० २५४४ में ताजशाही सर पर रखा । कुल साठ बरस हकूमत में बसर करके दुनिया से रवाना हुआ ।' (२) आइने अकबरी में अक्ष का नाम 'उज' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। श्री स्टीन के अनुसार लौकिक संवत् २६४७ वर्ष छठवाँ महीना तेरहवें दिन राज्यसिंहासन पर बैठा था । श्री एस. पी. पण्डित वह काल ईसा पूर्व ४३१ वर्ष मानते हैं । हसन लिखता है—राजा अच्छ राजा नर का बेटा था । साठ साल तक हकूमत किया । दुलहिन बगल में रखी और दुनिया से रुखसत हो गया । अच्छवल इसी राजा को यादगारों में से है। उसका राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २६४७ में हुआ था । यहाँ कुछ गणना में त्रुटियाँ मालूम होती हैं। उसके पिता ने ६० वर्ष राज्य किया। उसने भी साठ वर्ष राज्य किया । पिता-पुत्र को मिलाकर १२० वर्ष हो जाता है । (३) अक्षवल : अक्ष का अर्थ, आँख, पासा, गाड़ी, धुरा, रुद्राक्ष, सर्प तथा आत्मा होता है। कल्हण के वर्णन से ज्ञात होता है कि राजा अक्ष के समय में प्रथम बार ग्राम रूप में यह स्थान बसाया गया था । इसका वर्तमान रूप हजारों वर्षों के विकास का फल है । यह नगर वर्तमान अचवल है । अनन्त नाग से दक्षिण-पूर्व ६ मील पर स्थित है। कुथर परगना में है। सुन्दर जलस्रोतो के लिए प्रसिद्ध है । बर्नियर ने अपनी यात्रा (पृष्ठ ४१३ ) में तथा बाइन ( १:३४७) ने भी इसका वर्णन किया है। नीलमत पुराण में इस जलस्रोत का नाम अक्षिपाल नाग दिया गया है। तथा च नागो व्यसरो नागो नीलमयो ब्रिहा । अशुलाक्षोऽक्षिपालश्च च प्रह्लादो यमकस्तथा ॥ मैं यहाँ १९५५ तथा १९५९ में आ चुका हूँ। अन्तिम बार १४-९-६३ में आया था । अचवल का झरना सुन्दर, शीतल तथा वेगशील है । सन् १६२० ई० में नूरजहाँ ने जलस्रोत को नियन्त्रित कर मुगल शैली का बाग निर्माण कराया है। गाथा है कि त्रिघी नदी की धारा जो थानो दिवल गाय ब्रिग परगना में लोप हो गयी है। वही अक्षवल में पुनः प्रकट हुई है। यदि थानोदिवल ग्राम में कोई टुकड़ा धारा में छोड़ दिया जाय तो वही पुनः अचवल में निकल आता है। अतएव अचवल जलस्रोत को त्रिघी की लुप्त धारा का पुनः यहाँ प्रकट होना मानते हैं। अक्षवल के पर्वत मूल में जहाँ जल निकलता है यदि उसे देखा जाय तो मालूम पड़ता है जैसे जल स्तर पर अक्ष अर्थात् नेत्र बनते और बिगड़ते रहते