भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

३४० राजतरंगिणी

हैं। इसके कारण भी सम्भव है पूर्व काल में इसका नाम 'अक्ष' रूप जल के कारण 'अक्ष' रख दिया गया था। कालान्तर में राजा अक्ष ने अपने नाम का स्थान होने के कारण यहाँ का और विकास किया अथवा 'अक्ष' नाम रखकर अपने स्मारक तथा स्रोत के नामकरण दोनों की कल्पना की। जलस्रोत के पृष्ठ में हरित देवदारु पादप पूर्ण पर्वत है। पर्वत ऊँचा है। वह बाग के लिए सुन्दर पृष्ठभूमि उपस्थित करता है। सितम्बर मास में मैं इस बाग में कुछ दिन रह चुका हूँ। बाग में फूल खूब हैं। धारा का नियन्त्रित कर एक स्रोत दक्षिण पश्चिम दिशा तथा मुख्य स्रोत के बाग के नहरों में लाया गया है। चिनार के वृक्ष पुराने अत्यधिक और काफी संख्या में लगाये गये हैं। बाग सड़क के किनारे पर है। डाक बंगला बाग से सटा बना है। बाग के दक्षिण पार्श्व में एक सरोवर तथा बाम भाग में राजकीय मत्स्य विभाग है। मछली यहाँ अत्यधिक मिलती है। नूरजहाँ ने अक्षवल किंवा अचवल का नाम बेगमाबाद रखा था। इसे साहिबाबाद भी कहते हैं यह बाग ४६७ फीट लम्बा है। बाग पत्थर की दीवारों से घिरा है। यहाँ मुगलकालीन समय का ध्वंसावशेष मिलेगा। मध्यवर्ती नहर १६ फीट तथा उसके दोनों तरफों की नहरें ८ फीट चौड़ी हैं। मध्यवर्ती नहर क्रमशः तीन चौकोर कुण्डों को भरती चलती है। आयताकार प्रत्येक सरोवर में फुहारे लगे हैं। दो सरोवरों के प्रत्येक मध्यवर्ती नहर में ५ फुहारे हैं। अन्तिम भाग में ६ फुहारे हैं। वर्नियर ने सन् १६६३ ई० में इस स्थान पर एक रात्रि विश्राम किया था। वह स्पष्ट कहता है "यह बाग तथा स्थान कश्मीर के प्राचीन राजाओं का था। बाग इस समय मुगलों के पास है। यहाँ फलदार वृक्ष खूब लगे हैं। सरोवर में मछलियाँ बहुत मिलती हैं। इस स्थान की सुन्दरता वेग पूर्वक भूमि से निकलने जलस्रोतों के कारण बढ़ जाती है। उसे फुहारा कहने के स्थान पर मांसपिण्डी उद्गम कहना अच्छा होगा। जल इतने वेग से निकलता है कि मालूम होता है—किसी कूप के अन्दर से पम्प करके ऊपर निकाला जा रहा है। सब उद्यान के नहरों में यह पानी फैला दिया है। इसका जल निर्मल एवं हिम सदृश शीतल है। उद्यान बहुत सुन्दर है। उसमें सेब, गुमानी, नाशपाती, आलूचा तथा शाहदाना अर्थात् चेरी के फलदार वृक्ष लगे हैं। यहाँ ऊँची जल की चादर गिरती है। वह बीस या पच्चीस फीट चौड़ी होगी। पानी की चादर की तरह दिखाई पड़ती है। रात्रि के समय चादर के पीछे दिवाल में बने चरागों में जब अनेक दीप जला दिये जाते हैं सो ये प्रभावोत्पादक बड़ा सुन्दर बाह्य- निक प्रभाव उत्पन्न करते हैं, (पृष्ठ ४१८) बादशाह जहाँगीर यहाँ पर आ चुका है। उसने अपने पन्द्रहवें जलूसी वर्ष में यहाँ का वर्णन अपनी आत्म-कथा में किया है। 'मंगल को अक्षवल के जलाशय के समीप शिविर पड़ा। पहले की अपेक्षा इसमें जल अधिक है। इसमें एक सुन्दर जलप्रपात है। इसके चारों ओर ऊंचे मीनार और सर्वेश के वृक्षों के समूह ऊपर जाकर ऐसी मिल गये हैं कि इनके नीचे बैठने के लिये जैसे कुंज बन गया है। जहाँतक देखा जा सकता है वहाँ तक जाफरी फूलों का खिला हुआ उद्यान सुन्दर दिखायी देता है। जैसे यह स्वर्ग का एक दुपट्टा है।' (पृष्ठ ६८२) जहाँगीर ने अपने जलूसी वर्ष १७ में ७ शव्वाल को पुनः कश्मीर की यात्रा की थी। वह अचवल पहुँचा। उसने एकम शहरिवर को अचवल की यात्रा प्रथम यात्रा के दो वर्ष बाद की थी। इस अवसर पर उसने केवल इतना ही लिखा है—'अचवल के जलाशय के समीप ठहरे। और गुरुवार को महोत्सव वही मनाया गया।' (पृष्ठ ७५१)