राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३४१ जुगोप गोपादित्योऽथ क्ष्मा साद्वीपां तदात्मजः । वर्णाश्रमप्रत्यवेक्षादर्शितादियुगोदयः ॥३३६॥ गोपादित्य— उनके आत्मज गोपादित्य ने सद्वीप पृथ्वी की रक्षा की, जिसने वर्णाश्रम परिपालन द्वारा आदि युग का उदय दिखा दिया था ।
अचवल का विकास आधुनिक ढंग पर हुआ है । नगर का यथेष्ट विकास हो गया है । नगर में मस्जिदें काफी हैं । बाग के सम्मुख वाम भाग में एक शिव मन्दिर है । आधुनिक मन्दिर है । मैं मन्दिर में पूजा करने गया था । एक महिला 'जय जगदीश हरे' मधुर लय मे गा रही थी । एक प्रौढ ब्राह्मण सांगोपाग पूजन कर रहे थे । मन्दिर तथा पूजा देखकर काशी की याद आती थी । पूजा में कोई भेद नहीं था । मन्दिर के बाहर भी एक लिंग था उसकी भी पूजा की जाती है । मैं प्रातः काल घूमने निकला । सडक पर पहुँचा । चौराहे पर मुझे एक मृत्तिका पात्र कसोरा में आटा, दाल, लाल मिर्चा रखा मिला । मैं खड़ा हो गया । उत्तर भारत मे इसे 'उतारा पुतारा' कहते हैं । यह प्रथा किसी न किसी रूप में समस्त भारत में प्रचलित मिलेगी । भारत में प्रायः चौराहों पर प्रेत बाधा, महामारी तथा कष्ट निवारणार्थ श्वेत कूष्माण्ड काटकर फूल अक्षत के साथ रखा जाता है । धार अर्थात् जल में कुछ पदार्थ मिलाकर स्त्रिया रात्रि किंवा ब्राह्म मुहूर्त में चौराहा पर जल गिरा कर हाथ जोडती है । इस प्रकार का संस्कार प्रायः समस्त भारत मे मिलेगा । यह एक ही जन जीवन एवं संस्कृति का परिचायक है । यहाँ से कुछ दूर पर उमा देवी का मन्दिर है । अचवल से लगभग १ मील दूर एक स्वामी जी का आश्रम है । स्वामी जी बंगाली हैं । आश्रम का नाम रामकृष्ण सम्मेलन आश्रम है । स्वामी जी ने अपने हाथों सब कुछ बनाया है । उनकी कुटी के ऊपर एक सुन्दर मन्दिर बना है । उसमे श्री रामकृष्ण परमहंस देव की तस्वीर गर्भगृह में पूजा निमित्त रखी है । अचवल में हिन्दू धर्म की एक छाया तथा आश्रम यही देखने को मिला । प्रसन्नता हुई । यहाँ कभी वेद की ऋचाओं का उद्घोष होता था । यज्ञ की वेदियों से पवित्र धूम्र ज्योति उद्भूत होती गगन को ओर बढती, मानव मे आध्यात्मिकता का संचार करती थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३९ में "प्रत्यवेक्षा" का पाठभेद 'प्रत्यवीक्षा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३९ (१) : आइने अकबरी में नाम 'कुवोत' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष ६ दिन दिया है । राजा ने बुद्धिमानीपूर्वक न्याय पूर्ण राज्य किया था । उसने विजय भी बहुत की थी । उसके राज्य में जीव-हत्या वर्जित थी । राजादेश के अनुसार मास भक्षण निषेध था । सुलेमान ( शंकराचार्य ) पर्वत पर जो मन्दिर खड़ा है, वह इसी राजा के वजीर का निर्माण कराया है । श्री स्टीन राजा गोपादित्य का राज्याभिषेक लौकिक संवत् २७०७ वर्ष छठवा मास तेरहवें दिन देते हैं । श्री एस० पं० पण्डित वह समय ईसा पूर्व ३७१ वर्ष मानते हैं । हसन : 'राजा गोपादित्य बाप की वफात के बाद क० २६७४ में मुल्क हाकिम होकर कश्मीर की तमाम सरहदें अपने कब्जा एकदार में ले आया । रैयत परवरी और इन्साफ से काम लेने में लासानी था । मौजा खुली नार व उद में बाग बेरह में हाथ गाम करधन में इस्कूरूह पुर बागल और दागिस में